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भीतर-बाहर का फर्क

संस्कृत में ‘रा’ का अर्थ है- जो प्रकाशमान है और ‘म’ का अर्थ है- मैं, यानी हमारे अंदर जो ज्योति प्रकाशमान है, वह हैं राम। सत्ता के कण-कण में जो प्रकाशमान हैं, वह हैं राम। राम दशरथ और कौशल्या के पुत्र..

भीतर-बाहर का फर्क
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 21 Feb 2024 10:13 PM
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संस्कृत में ‘रा’ का अर्थ है- जो प्रकाशमान है और ‘म’ का अर्थ है- मैं, यानी हमारे अंदर जो ज्योति प्रकाशमान है, वह हैं राम। सत्ता के कण-कण में जो प्रकाशमान हैं, वह हैं राम। राम दशरथ और कौशल्या के पुत्र हैं। संस्कृत में दशरथ का अर्थ होता है, दस रथों वाला- यह हमारी पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेंद्रियों का प्रतीक है। कौशल्या का अर्थ है- कुशलता। दस रथों का कुशल सारथी ही राम को जन्म दे सकता है। जब पांच कर्मेंद्रिय और पांच ज्ञानेंद्रिय कुशलतापूर्वक व्यवहार में लाई जाती हैं, तब अंदर से प्रकाश का उदय होता है।
राम का जन्म अयोध्या में हुआ।

संस्कृत में अयोध्या का अर्थ है- वह जगह, जहां युद्ध नहीं हो सकता। जब हमारे मन में द्वंद्व नहीं होता, तब प्रकाश उदय होता है। राम के भाई लक्ष्मण जन्मे सुमित्रा से। सुमित्रा, अर्थात अच्छी मित्र। जब तुममें पाचों कर्म की इंद्रियां और पाचों ज्ञानेंद्रियां मिलकर काम करेंगी, तो सजगता पैदा होगी, तुम प्रकाशवान होगे। प्राय: हम अपने भीतर प्रकाश खोजने की कोशिश करते हैं। जानो कि तुम प्रकाश हो।
अक्सर लोग कहते हैं, ‘बाहर भी वैसे ही रहो, जैसे अंदर हो।’ मैं पूछता हूं, यह कैसे संभव है? भीतर तुम एक अपार सागर हो, अनंत आकाश। बाहर तुम सीमित हो, एक छोटा सा सीमित आकार; सीमितताओं और दोषों के साथ एक साधारण व्यक्ति! जो सब तुम्हारे अंदर हैं- प्रेम, सौंदर्य, अनुकंपा, दिव्यता, वे बाहर से पूरी तरह दिखाई नहीं देते। जो नजर आता है, वह है सिर्फ व्यवहार की ऊपरी परत। स्वयं से पूछो, ‘क्या मैं सचमुच आचरण का प्रतिरूप हूं? क्या मैं सचमुच इस सीमित शरीर/ मन का सम्मिश्रण हूं?’ नहीं। तुम अंदर वही नहीं हो, जो तुम बाहर हो। बाहरी खोल को वह समझने की गलती न करो कि तुम भीतर भी वही हो। और अपनी अनंत प्रभुता का प्रदर्शन न करो, क्योंकि दिव्यता आसानी से समझी नहीं जाती। थोड़ा सा रहस्य रहने दो।
अपने अंदर ज्ञान को कायम रखने की चिंता न करो। जब ज्ञान विवेक बनकर तुममें समा जाएगा, वह तुम्हें कभी नहीं छोडे़गा। विवेक हृदय में समा जाता है। ईश्वर को अपना प्रियतम बना लो। जीवन का यही प्रथम कार्य है और अंतिम भी। अपने हृदय को एक सुरक्षित स्थान में रखो, यह बहुत कोमल है। घटनाएं, छोटी-छोटी बातें इस पर गहरा प्रभाव डालती हैं। हृदय को सुरक्षित व मन को स्वस्थ व पवित्र रखने के लिए तुम्हें ईश्वर से बेहतर और कोई स्थान नहीं मिलेगा। जब तुम अपना हृदय ईश्वर को दे देते हो, समय और घटनाएं तुम्हें छू नहीं सकेंगी। 
जैसे एक मूल्यवान रत्न को सोने या चंादी में जड़ा जाता है, ताकि उसे पहना जा सके और वह गिरने न पाए; उसी प्रकार हृदय वह मूल्यवान रत्न है, जिसे विवेक और ज्ञान में जड़कर ईश्वर के पास रखते हैं।
    श्री श्री रविशंकर 

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