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तीर्थयात्रा की तैयारी

एक संन्यासी को किसी दुकानदार ने अपने यहां नौकरी पर रख लिया। संन्यासी गेरुए वस्त्र पहनता था। दुकानदार ने कहा भी कि यहां पैसे का लेन-देन होता है, कहीं ऐसा न हो कि आप बिगड़ जाओ। संन्यासी ने कहा...

तीर्थयात्रा की तैयारी
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 20 Nov 2023 12:14 AM
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एक संन्यासी को किसी दुकानदार ने अपने यहां नौकरी पर रख लिया। संन्यासी गेरुए वस्त्र पहनता था। दुकानदार ने कहा भी कि यहां पैसे का लेन-देन होता है, कहीं ऐसा न हो कि आप बिगड़ जाओ। संन्यासी ने कहा, बिगड़ने का डर होता, तो नौकरी स्वीकार ही न करते। लेकिन आप अपना ध्यान रखना। एक खतरा है कि मेरे साथ रहते हुए आप भी बिगड़ सकते हैं। 
बहरहाल, संन्यासी दुकान पर बैठने लगा। दिन भर दुकानदार को उसके गेरुए वस्त्र दिखाई पड़ते थे। उसकी मस्ती चुभा करती। मन में होता, यह आनंद! पता नहीं क्या मिला है इसे? मैं क्यों इतना दुखी हूं? साल भर बीत गया, तो संन्यासी ने कहा कि अगले वर्ष मेरा इरादा तीर्थयात्रा पर जाने का है। आप भी चलें! दुकानदार ने पूछा, तैयारी क्या करनी होगी? संन्यासी ने कहा, कोई ज्यादा तैयारी नहीं करनी होगी। जो तैयारी करनी है, मैं करवाता रहूंगा। साल भर में संन्यासी सेठ की चालबाजियों, दुकानदारी की बेईमानियों, धोखाधड़ी से परिचित हो गया था, सो उसने उसे सावधान करना शुरू किया। जब भी सेठ कुछ कम चीजें तौलता, तभी संन्यासी बोल पड़ता, ‘राम! तीर्थयात्रा पर चलना है।’ सेठ डर जाता। जब कभी वह ग्राहक को किसी चीज के ज्यादा दाम बताने लगता, तभी संन्यासी कहता, ‘हरि ओम! तीर्थयात्रा पर चलना है।’ साल भर दुकानदार किसी किस्म की चोरी, बेईमानी नहीं कर पाया। जब तीर्थयात्रा पर जाने का समय आया, तब दुकानदार बोला, मेरा तीर्थस्नान तो हो गया। मैं तो पवित्र हो गया। तीर्थयात्रा के बहाने साल भर एक स्मृति का तीर मेरी तरफ बना रहा, जिसने मुझे जगाए रखा।
ओशो ने जब यह कहानी कही, तब उनसे पूछा गया था, संसार में रहकर ध्यान कैसे किया जाए? उन्होंने कहा कि यह युग बहिर्मुखी है। हमारे जीवन में सभी चीजें बदलती रहती हैं। हर अंतर्मुखी युग के बाद बहिर्मुखी युग होता है। इसलिए मैं जोर देता हूं कि इस युग को ऐसे ध्यानी की जरूरत है, जो कर्म से संन्यास में नहीं, बल्कि निष्काम कर्म में आस्थावान हो। काम करना छोड़ना नहीं है, काम का फल छोड़ना है। 
आज के युग को ऐसे साधक की जरूरत है, जो जीवन की प्रगाढ़ धारा के बीच खड़ा हो जाए। जो जीवन को छोड़कर न हटे, उससे न भागे। यह युग बाहर-बाहर उलझा हुआ है और उस वजह से परेशान हो रहा है। इस बहिर्मुखी युग की धारा को अगर धार्मिक बनाना है, तो धर्म को अंतर्मुखी सीमाओं को तोड़कर कर्म के बहिर्मुखी जाल पर छाना होगा। अगर हम ऐसे लोग पैदा कर सकें, जिनका चिंतन, मनन और आचरण समस्त कर्म-जगत को रूपांतरित करता हो, तब हम इस युग को धार्मिक बना पाएंगे, अन्यथा धर्म सिकुड़ जाएगा और ये बहिर्मुखी लोग अधर्म की तरफ बढ़ते चले जाएंगे।
अमृत साधना 

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