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26 अक्तूबर, 2020|1:37|IST

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शास्त्री का कर्मयोग

राजनीति में सच्चा कर्मयोगी होना हम लालबहादुर शास्त्री से सीख सकते हैं। राष्ट्रीय समस्याओं के समुद्र में उन्होंने पूरे आत्म-विश्वास के साथ समाधान के रत्न खोजे थे। उदाहरण के लिए, जब भाषावाद की भभकती भट्ठी में भारत की दक्षिण और उत्तर भुजाएं झुलस रही थीं, तब उन्होंने उपचार किया। असम के भाषाई दंगों के दावानल के लिए भी शास्त्री फॉर्मूला अग्निशामक सिद्ध हुआ। पंजाब में अकालियों के धार्मिक आंदोलन के विस्फोट को रोकने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। वह जानते थे कि परावलंबन से राष्ट्र का आत्म-सम्मान आहत और मनोबल मूच्र्छित हो जाता है। परावलंबन विष है, जबकि स्वावलंबन स्वयं संपूर्णता का सुधा कलश। इसलिए उन्हें हर क्षेत्र में स्वावलंबी और स्वाभिमानी भारत का न केवल नारा दिया, अपितु उसे योजना के ढांचे और युक्ति के सांचे में ढाला। 
किसी भी व्यक्ति की क्षमता का आकलन उसके भौतिक आकार को देखकर कभी नहीं करना चाहिए। कोई विश्वास नहीं कर सकता था कि गांधीजी की अहिंसा के आस्थावान अनुयायी और शांति के श्लोक-पाठी शास्त्रीजी भारतीय सेना को यह आदेश देंगे कि वह देश पर हमला करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दे। वह अहिंसा के पुजारी थे, किंतु राष्ट्र के सम्मान की कीमत पर नहीं। कभी आपदाओं में आकुल और विपत्तियों में व्याकुल नहीं होना चाहिए। जब कभी परिवार, समाज, देश अनिश्चय के अंधकार में अचेत हो, तब चेतना के चिराग की तरह रोशन होना चाहिए। शास्त्री का व्यक्तित्व प्रजातंत्र की तुलसी के बिरवे के वर्ग में आता है। भारतीय संस्कृति में तुलसी का यह बिरवा भी पूजनीय है। 
 

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  • Web Title:Hindustan Mansa vacha karmana column 2 october 2020