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23 सितम्बर, 2020|10:03|IST

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आसान नहीं सीता होना

सीता या जानकी का नाम लेते ही मैं उदास होने लगता हूं। हमेशा यह कचोट होती है कि हम जानकी को ठीक से समझ नहीं पाए? न तब और न अब। कैसी छवि बना दी है हमने। मानो कोई निरीह सी गुड़िया हो। पति को समर्पित एक पत्नी। जैसे उनकी अपनी कोई पहचान नहीं, कोई शख्सीयत नहीं। 
लेकिन यह सीता की गलत छवि है। वह अपने फैसले ले रही हैं। अगर उनके राम को वनवास मिला है, तो वह भी वन जाएंगी। आज हम आधुनिकता का कितना ही दावा करें। लेकिन बेहद कठिन समय में कितनी औरतें अपने पति के साथ या पति अपनी पार्टनर के साथ कहीं भी जाने को तैयार होते हैं। राम उन्हें कितना मनाते हैं, समझाते हैं। लेकिन वह कहां मानती हैं? हर हाल में अपने पति के साथ रहने की जिद क्या मामूली घटना है? 
सब कुछ मान लेने वाली नहीं हैं वह। सीता ने कहां सब कुछ माना? अगर वह मान लेतीं, तो वन नहीं जातीं। इस सिलसिले में एक प्रसंग याद कीजिए। अशोक वाटिका में हनुमान जानकी से कहते हैं कि आपको बिठाकर राम के पास ले चलता हूं। लेकिन जानकी तैयार नहीं होतीं। वह गलत तौर-तरीके से लाई गई थीं, लेकिन गलत ढंग से वापसी नहीं चाहतीं। एक मर्यादा के तहत वह अपने राम के पास जाना चाहती हैं। उनके राम जब लंका को जीतते हैं, तभी वह वापस जाती हैं। उस वापसी में भी क्या-क्या नहीं झेलतीं। जरा सीता का अंत तो याद कीजिए। सीता को वनवास मिलता है। एक दौर बीत जाने के बाद राम उन्हें लेने जाते हैं। तब सीता लौटती नहीं। अपने राम के पास भी नहीं। धरती में समा जाती हैं वह। कितनी स्वाभिमानी हैं सीता!
 

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column 2 may 2020