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सुख के पांच चरण

सभी प्रकार और स्वभाव के लोग बिना किसी भेद के जिस स्थिति को समान रूप से प्राप्त करना चाहते हैं, वह है सुख। बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है कि संसार के सभी लोग अपने आनंद को बढ़ाना चाहते...

सुख के पांच चरण
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 18 Feb 2024 10:57 PM
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सभी प्रकार और स्वभाव के लोग बिना किसी भेद के जिस स्थिति को समान रूप से प्राप्त करना चाहते हैं, वह है सुख। बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है कि संसार के सभी लोग अपने आनंद को बढ़ाना चाहते हैं। लोग वे ही साधन खोजते रहते हैं, जिनसे उनका सुख बढ़ सके। सुख की प्राप्ति के लिए ही कुछ लोग वैराग्य मार्ग का आश्रय लेकर काषाय वस्त्र धारण कर लेते हैं, तो दूसरी ओर लोग पापाचरण करके असाधु वृत्तियों से भी जीवन चलाते हैं। व्यक्ति को सुख का ज्ञान करवाने वाली इंद्रिय मन है। हमारा मन ही वह इंद्रिय है, जिससे सुख और दुख का ज्ञान होता है। जो अच्छा लगता है, उसके होने पर जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह सुख कहलाता है। इसके विपरीत ज्ञान को ही दुख कहते हैं। 
नीतिशास्त्र का एक प्रसिद्ध श्लोक है- विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं तत: सुखम्।। अथात् विद्या व्यक्ति को विनय (गुण) देती है। गुणों से उसमें पात्रता आती है। पात्रता से वह धनार्जन करता है। व्यक्ति जब अर्जित किए गए धन का सही उपयोग धर्म में या धर्म की राह में करता है, तो उसके परिणाम में सुख उत्पन्न होता है। यहां यह समझने की बात है कि धन सीधा सुख पैदा नहीं कर सकता, बल्कि सुख का कारण धर्म ही है। यह सही है कि धन से थोड़ा सुख प्राप्त होते संसार में देखा जाता है, लेकिन धन मनुष्य के दुखों का संपूर्ण नाश नहीं कर सकता। 
चीन में एक शासक, जो अपनी पूरी दिनचर्या को नियमित रूप से डायरी में दर्ज करवाता था। 72 वर्ष की अवस्था आने पर जब उसे यह लगा कि अब जीवन नहीं बचेगा, तो उसने  अपने सेवकों से सारी डायरियां मंगवाईं और कहा कि इनको पढ़कर यह बताओ कि मैंने अपने जीवन में कितने समय तक सुख भोगा है? सेवकों ने सारी डायरियों को खंगाला और फिर कहा- पूरे जीवन में मात्र 17 दिन ही आप सुख भोग पाए हैं। आपका शेष समय चिंता करने और दूसरे अन्य कारणों से दुख में ही बीत गया।
यह संसार दुखों का घर है। सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में इस संसार को अनेक दुखों का स्थान बताते हुए इसे दुखालय का विशेषण दिया है और दुख का मूल कारण संसार के प्रति उत्पन्न मोह का अज्ञान है, जिससे निवृत्ति का साधन ज्ञान है। जैसे प्रकाश के आते ही अंधकार समाप्त हो जाता है, ठीक उसी प्रकार ज्ञान के उदय होते ही अज्ञान का नाश होने लगता है, जिससे भगवान श्रीहरि में भक्ति उत्पन्न होती है। भक्ति में मुक्ति प्रदान करने की क्षमता है। अत: सत्य यही है कि धर्म से ही सुख प्राप्त हो सकता है, अन्य किसी साधन से नहीं।
शास्त्री कोसलेंद्रदास 

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