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22 नवंबर, 2020|11:36|IST

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यश-अपयश के भागी

एक ग्रामीण गृहस्थ ने अपने घर के सामने सुंदर बगीचा लगाया था। एक दिन उसमें बछड़ा घुस गया और पौधों को खाने लगा। गृहस्थ को बड़ा गुस्सा आया। उसने बछड़े को इतना मारा कि कुछ देर बाद बछड़ा मर गया। गृहस्थ ने यह कहते हुए तसल्ली कर ली कि उसका समय पूरा हो गया था, इसलिए मर गया। इसमें मेरा क्या दोष? उसे तनिक भी अफसोस नहीं हुआ कि बछड़ा उसकी मार के कारण मरा है। कुछ समय बाद दंडी स्वामी विष्णु आश्रम जी महाराज अपने शिष्यों के साथ उधर से गुजरे। गृहस्थ के सुंदर बगीचे को देखकर से बोले, ‘अहा! कितना अच्छा बगीचा है। किसने इतनी लगन और परिश्रम से इसे तैयार किया है?’ गृहस्थ लपककर आगे आया और बोला, यह बगीचा मैंने लगाया है। तभी स्वामीजी की नजर मृत बछडे़ पर पड़ गई। उन्होंने उसकी मौत का कारण उस व्यक्ति से जानना चाहा। इस पर उसने कहा, यह बछड़ा मेरे बगीचे के कई पौधे खा गया था। मैंने चंद डंडे मारे, वह मर गया। इसमें मेरा क्या दोष? इसका काल आ गया था। 
स्वामीजी बोले, ‘बगीचा इसलिए इतना सुंदर है, क्योंकि इसे तुमने बनाया। तुम्हारे प्रभाव से हुआ है। क्या यही न्याय है, दोनों कार्यों का कारण तो एक ही होना चाहिए। या तो परमात्मा कारण है अथवा तुम हो।’ स्वामीजी की बात सुनकर गृहस्थ कुछ नहीं बोल पाया। अपने अपराध के एहसास से उसका अहंकार जाता रहा। हम जो कार्य करते हैं, उसका फल हमें भोगना ही पड़ता है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिस कार्य से यश-कीर्ति मिले, उसका श्रेय तो स्वयं ले लें और जिससे अपयश या अकीर्ति मिले, उसका दोष दूसरों के सिर मढ़ दें।   
 सुभाष चंद्र शर्मा

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column 18 november 2020