hindustan mansa vacha karmana column 15th August - एक अनवरत खोज DA Image

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एक अनवरत खोज

मनुष्य मूलत: एक स्वतंत्र चेतना है, इसलिए उसके रोम-रोम में स्वतंत्र होने की अदम्य प्यास है। वह किसी का भी गुलाम होना पसंद नहीं करता, हालांकि इतिहास कुछ और ही बयां करता है। हजारों बरसों से सत्तालोलुप राजनेता लोगों को गुलाम बनाते रहे हैं। उसका विद्रोह करने के लिए लोग स्वतंत्रता संग्राम करते रहे।

लेकिन स्वतंत्र होने के बाद उस स्वतंत्रता का क्या करें, इसकी योजना और समझ बहुत कम लोगों के पास होती है। स्वतंत्रता दो तरह की होती है, नकारात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक स्वतंत्रता है, अन्याय और गुलामी से छुटकारा पाना। और इसके बाद शुरू होती है सकारात्मक स्वतंत्रता, जो बहुत कठिन होती है। दूसरों से संघर्ष करके जो स्वतंत्रता पाई है, उसे संभालना, उसका रक्षण और संवद्र्धन करना एक रचनात्मक कार्य है। इसके लिए जो आत्मबल और विकासशील दृष्टि जरूरी होती है, नए बदलाव करने के लिए जो निर्भीकता चाहिए, वह सभी के पास नहीं होती।

यह दूसरी स्वतंत्रता आंतरिक है, जो अपनी धारणाओं, अपने अंधविश्वासों और अपनी संकीर्ण दृष्टि को त्यागने से मिलती है। राजनीतिक या सामाजिक गुलामी तो दिखाई देती है, लेकिन अपने ही भीतर बसी हुई गुलामी की परतें देखनी मुश्किल होती हैं। शारीरिक, सामाजिक, भावनात्मक, बौद्धिक, सभी तलों पर लोग गुलाम हैं। सदियों की गुलामी के बावजूद देश की असली खोज परम मुक्ति की रही है। ध्यानियों ने देखा कि मनुष्य आध्यात्मिक रूप से बंधन में है, जब तक हम मन के पार उठकर स्वयं को नहीं पा लेते, तब तक सही अर्थों में स्वतंत्र नहीं होंगे। इसलिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करके संतुष्ट नहीं होना है। 

 

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