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शाश्वत को कैसे जानें

आप जीवन के बारे में कितना जानते हैं? बहुत थोड़ा। अपनी संपत्ति से, अपने पड़ोसी से, अपनी पत्नी से, बल्कि अपनी धारणाओं से अपने संबंध को ही आप कहां जानते हैं? आप केवल सतही चीजों को जानते हैं और इन्हीं...

शाश्वत को कैसे जानें
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 13 Nov 2023 11:25 PM
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आप जीवन के बारे में कितना जानते हैं? बहुत थोड़ा। अपनी संपत्ति से, अपने पड़ोसी से, अपनी पत्नी से, बल्कि अपनी धारणाओं से अपने संबंध को ही आप कहां जानते हैं? आप केवल सतही चीजों को जानते हैं और इन्हीं की निरंतरता चाहते हैं। बाखुदा, कैसी बदहाल कर डाली है अपनी जिंदगी! निरंतरता क्या कोई अक्लमंदी की बात है? वह मूर्ख है, जो निरंतरता चाहता है। जिसने भी जीवन का सार समझ लिया है, वह निरंतरता नहीं चाहेगा। दरअसल, आप जब जीवन को समझ लेते हैं, तब आपको अज्ञात का दर्शन हो जाता है, क्योंकि जीवन ही वह अज्ञात है, और मृत्यु व जीवन एक ही हैं। जीवन और मृत्यु के बीच जिन्होंने विभाजन खड़ा किया है, वे अज्ञानी हैं। वे अपने शरीर और अपनी संकीर्ण निरंतरता से ही सरोकार रखते हैं। ऐसे ही लोग अपने भय को छिपाने के लिए, अपनी अज्ञानतापूर्ण तुच्छ निरंतरता की गारंटी के लिए पुनर्जन्म के सिद्धांत का उल्लेख करते हैं। 
यह बात तो  साफ है कि विचार निरंतर रहता है, परंतु यह भी निश्चित बात है कि जो व्यक्ति सत्य की तलाश में हो, उसका सारा सरोकार विचार के ईद-गिर्द नहीं रहता, क्योंकि विचार आपको सत्य तक नहीं ले जा सकता। पुनर्जन्म के माध्यम से ‘अपनी’ निरंतरता द्वारा सत्य की ओर जाने का सिद्धांत मिथ्या है, असत्य है। यह ‘मैं’ तो स्मृतियों का पुलिंदा है, और स्मृति समय है। अत: सिर्फ समय की निरंतरता आपको उस शाश्वतता तक नहीं ले जा सकती, जो समय से परे है। मृत्यु का भय आपके हृदय से तभी जा पाएगा, जब उसमें अज्ञात का प्रवेश हो सकेगा। जीवन अज्ञात है, जैसे मृत्यु अज्ञात है, जैसे सत्य अज्ञात है।
अक्सर लोग पूछते हैं, क्या हम अहं को छोड़ सकते हैं? मेरा उनसे कहना है, जीवन अज्ञात है, पर उसकी एक छोटी सी झांकी से हम चिपके रहते हैं, और जिससे हम सब चिपके रहते हैं, वह स्मृति है, जो एक आधा-अधूरा विचार ही है। इस प्रकार, हम जिससे चिपके रहते हैं, वह अयथार्थ है, अप्रामाणिक है। मानव मन इस स्मृति नामक खोखली चीज से चिपका रहता है और यह स्मृति है मन, अर्थात स्व! अब चाहे इस अहं या स्व को किसी भी स्तर पर बैठा दिया गया हो। ज्ञात की परिधि में स्थित इस मन में अज्ञात का कभी प्रवेश नहीं हो सकता। 
याद रखिए, भय के अवसान की अवस्था और साथ ही यथार्थ की दृष्टि तभी आ सकती है, जब अज्ञात की अवस्था आ जाए, पूर्ण अनिश्चितता की अवस्था आ जाए। आप यह भला कैसे जान पाएंगे? क्या आप किसी अन्य व्यक्ति की सूचना को सत्य के रूप में स्वीकार कर लेंगे? अथवा, आप स्वयं इसका अन्वेषण करेंगे कि ईश्वर क्या है?
जे कृष्णमूर्ति 

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