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प्रकाश की कामना

मनुष्य ने अंधकार को न कभी चाहा, और न कभी मांगा। तमसो मा ज्योतिर्गमय इसी का प्रमाण है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलने की कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य ने खोजें शुरू कीं। उसने सोचा, वह कौन सा दीप है...

प्रकाश की कामना
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानFri, 10 Nov 2023 10:31 PM
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मनुष्य ने अंधकार को न कभी चाहा, और न कभी मांगा। तमसो मा ज्योतिर्गमय इसी का प्रमाण है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलने की कामना की पूर्ति के लिए मनुष्य ने खोजें शुरू कीं। उसने सोचा, वह कौन सा दीप है, जो मंजिल तक जाने वाले पथ को आलोकित कर सकता है। अंधकार से घिरा आदमी चाहे जितनी गति करे, दिशाहीनता का शिकार होता है। जिस दिन आपको अपने भीतर के दिव्य प्रकाश की अनुभूति होगी, वास्तव में जीवन की सबसे श्रेष्ठ दीपावली वही होगी।
एक बार अंधकार ने ब्रह्माजी से शिकायत की कि सूरज मेरा पीछा करता रहता है। मुझे मिटा देना चाहता है। ब्रह्माजी ने सूरज से पूछा, तो उसने कहा, मैं अंधकार को जानता तक नहीं, मिटाना तो दूर की बात है। आप उसे मेरे सामने उपस्थित तो करें, मैं उसकी शक्ल-सूरत देखना चाहता हूं। ब्रह्माजी ने अंधेरे से सूरज के सामने आने को कहा, तो वह बोला, मैंउसके आगे कैसे आऊं प्रभु? अगर आया, तो मेरा अस्तित्व कहां बचेगा?
प्रकाश हमारी स्वाभाविक मांग है, इसलिए दिवाली आत्मा के प्रकाश का त्योहार है। हमारे तिमिराच्छादित हृदय में ज्ञान, यश, श्री, समृद्धि की अनेक दीपमालिकाएं प्रज्ज्वलित होकर हमारे अंत:करण को आलोकित करती हैं। दरअसल, प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक अखंड ज्योति जल रही है। उसकी लौ कभी-कभार मद्धिम जरूर हो जाती है, पर बुझती नहीं है। उसका प्रकाश शाश्वत है। जो भी महापुरुष उस भीतरी ज्योति तक पहुंच गए, वे स्वयं ज्योतिर्मय बन गए। जो लोग भीतरी आलोक से आलोकित हो गए, वे सबके लिए आलोकमय बन गए। जिन्होंने अपने भीतर दीपावली मनाई, लोगों ने उनके उपलक्ष्य में दीपोत्सव मनाना प्रारंभ कर दिया। दीपावली के पर्व का प्रत्येक भारतीय इसीलिए उल्लास एवं उमंग से स्वागत करता है। यह पर्व हमारी सभ्यता और संस्कृति की गौरव-गाथा है।
दीपावली की सार्थकता के लिए जरूरी है कि बाहर के ही नहीं, भीतर के दीये भी जलने चाहिए। दीया जहां भी जले, वह उजाला देता है। दीपक का यह सार्वभौमिक संदेश है कि हम जीवन से कभी पलायन न करें। उसे नया परिवर्तन दें। पलायन से मनुष्य के दामन पर कायरपन का धब्बा लगता है, जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएं सार्थक दिशाएं खोज लेती हैं। 
असल में, दीया उन तमाम लोगों के लिए एक चुनौती है, जो अकर्मण्य और चरित्रहीन बनकर सफलता की ऊंचाइयों के सपने देखते हैं, जबकि दीपक दुर्बलताओं को मिटाकर नई शुरुआत का संकल्प है। अपने आस-पास जब मोह का अंधकार गहराने लगे, तो उसे भगाने के लिए धर्म का दीपक जलाइए। जहां धर्म का सूर्य उदित हो गया, वहां अंधकार टिक ही नहीं सकता।
स्वामी अवधेशानंद गिरि 

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