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Hindi News ओपिनियन मनसा वाचा कर्मणाहाजिरी लगाने का मतलब

हाजिरी लगाने का मतलब

बीते दिनों कलाकारों में एक खूबसूरत रिवाज था। जहां भी कोई पीर, मुर्शिद या संत का स्थान होता, वहां जाकर वे अपनी कला को समर्पित करते। तब लोग मानते थे कि कला ईश्वर की देन है, इसलिए जो उसके बंदे हैं...

हाजिरी लगाने का मतलब
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानSun, 04 Feb 2024 10:51 PM
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बीते दिनों कलाकारों में एक खूबसूरत रिवाज था। जहां भी कोई पीर, मुर्शिद या संत का स्थान होता, वहां जाकर वे अपनी कला को समर्पित करते। तब लोग मानते थे कि कला ईश्वर की देन है, इसलिए जो उसके बंदे हैं, उनके दर पर जाकर पेश करें, तो उस तक पहुंच जाएगी। यह एक ‘थैंक्स गिविंग’ जैसा था। अनुग्रह का भाव दर्ज करना था। मगर अफसोस, आज के धन-लालायित समाज में वह प्यारा रिवाज खो गया है। अब पैसे के बिना कोई कुछ काम ही नहीं करता। धन तो बहुत कमा रहे हैं, दिल का द्वार बंद हो गया। आदमी का वजूद सिकुड़ गया।
अपने मेडिटेशन रिजॉर्ट में ओशो ने यह लुप्तप्राय परंपरा फिर से शुरू की। उन्होंने कलाकारों को यहां आकर मुफ्त में गाने-बजाने का निमंत्रण देना शुरू किया। ख्याल यह था कि आप दुनिया भर में पैसों के लिए काम करते रहें, लेकिन एक जगह ऐसी हो, जहां अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दिल से जुड़ें, जहां आपकी प्रस्तुति आपकी पूजा हो। आप विनम्रता से झुक जाएं। उससे आपकी कला की ऊंचाइयां बढ़ जाएंगी। इसे गुरु के पास हाजिरी लगाना कहते हैं। यह अहंकार का भी अच्छा इलाज है। इससे अभिमान खत्म होता है। जहां पैसों का लेन-देन हो, वहां पर गणित आता है कि इतना मिला है, इतना ही देंगे। मगर कला किसी और लोक की मेहर है।
ओशो के पास कई बुलंद संगीतकार आए और संगीत पेश किया। इसी सिलसिले में किराना घराने की मशहूर गायिका प्रभा अत्रे जी यहां आई थीं। ओशो की अस्थियां जहां रखी हैं, वहां गायक गाना पसंद करते हैं। वहां का माहौल ही कुछ अलौकिक है। प्रभा जी ने तानपुरा सुर में मिलाकर गाना शुरू किया। उनके गुरु थे सुरेश बाबू माने। शायद उनका असमय निधन हो गया था, सो उनके आशीष को, उनके मार्गदर्शन को प्रभा जी मन ही मन तरसती थीं। 
जैसे ही उन्होंने गाना शुरू किया, उनकी आत्मा अपने गुरु से जुड़ गई। ओशो का स्थान तो गुरु पीठ ही है, व्यक्ति कोई भी हो, गुरु तत्व एक ही है। अपने गुरु की याद में प्रभा जी की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे। गाना असंभव हुआ, तो वह सिर्फ तानपुरा बजाती रहीं, लेकिन भावनाओं का सैलाब ऐसा था कि वह भी मुश्किल हुआ। उन्होंने तानपुरा रख दिया और आंसुओं को रास्ता दे दिया। 
पूरे कक्ष में लोग स्तब्ध बैठे भक्ति की धारा में नहा रहे थे, क्योंकि वे श्रोता नहीं, श्रावक थे। वे प्रभा जी का दर्द साझा कर रहे थे। वह मौन संगीत किसी भी मुखर संगीत से अधिक दिव्य था। पिछले दिनों प्रभा अत्रे का निधन हुआ, तो ये सारी यादें जीवित हो उठीं।
अमृत साधना 

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