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Hindi News ओपिनियन मनसा वाचा कर्मणासिर्फ कानून बनाने से बात नहीं बनेगी

सिर्फ कानून बनाने से बात नहीं बनेगी

इन दिनों विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक का मुद्दा गर्माया हुआ है। सरकार ने राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षाओं में नकल और लीक रोकने केलिए  जो नकल-रोधी कानून ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की...

सिर्फ कानून बनाने से बात नहीं बनेगी
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 24 Jun 2024 11:06 PM
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इन दिनों विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक का मुद्दा गर्माया हुआ है। सरकार ने राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षाओं में नकल और लीक रोकने केलिए  जो नकल-रोधी कानून ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024’ बनाया, उसे प्रभावी कर दिया गया है। कानून का डर दिखाकर अपराध रोकने की यह कोशिश सराहनीय है, पर इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि कानून होने के भय मात्र से अपराध रुक जाएंगे। यह अपराध तभी रुकेगा, जब तंत्र पूरी तरह से ठीक होगा। मेरा मानना है कि हजारों-लाखों परीक्षार्थियों व बेरोजगारों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को सख्त सजा मिलनी चाहिए। मुमकिन हो, तो फांसी की सजा का प्रावधान हो, ताकि वे अपराध करने से पहले हजार बार सोचें। हमारी प्राथमिकता अपराध को होने से पहले रोकने की होनी चाहिए, न कि अपराध होने के बाद दंड देने की। 
जाहिर है, नकल रोकने के लिए सिर्फ कानून पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। तंत्र के सभी पक्षों की पारदर्शी जांच होनी चाहिए। नकल से प्रभावित विद्यार्थियों-अभ्यर्थियों की मानसिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यह शिक्षा तंत्र की विफलता है कि वह अपने भीतर घुसे बैठे नकल करने वालों को रोक नहीं पा रहा है। गुनहगारों का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि तमाम बंदोबस्त के बावजूद पेपर लीक हो रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमारा पूरा ध्यान इस बात पर है कि नकल-माफियाओं को सजा मिले, जबकि हमारा प्रयास ऐसे प्रावधान तय करना होना चाहिए कि नकल-माफिया अपराध को अंजाम देने का साहस ही न जुटा पाएं।
पेपर लीक रोकने के कुछ व्यावहारिक उपाय अपनाए जा सकते हैं। मसलन, पेपर ऑनलाइन पद्धति से लिए जाएं, वे इस कदर पासवर्ड से सुरक्षित किए जाएं कि अभ्यर्थी द्वारा विशेष पासवर्ड डालने पर ही परीक्षा हॉल में पेपर खुले, ऑफलाइन परीक्षा की स्थिति में संबंधित केंद्राध्यक्ष को प्रश्नपत्र उसी दिन पासवर्ड प्रोटेक्टेड फाइल के रूप में भेजा जाए, परीक्षा कराने वाली एजेंसी की जवाबदेही तय की जाए, किसी भी स्तर पर गलती/अपराध में संलिप्त पाए जाने पर कठोर सजा-जुर्माना व मान्यता रद्द करने संबंधी प्रावधान हो, केंद्र पर परीक्षा संबंधी प्रत्येक गतिविधियों की वीडियो रिकॉर्डिंग हो, अभ्यर्थियों का बायोमेट्रिक सत्यापन हो, ताकि फर्जी परीक्षार्थी परीक्षा में शामिल न हो सकें, परीक्षा होने के पूर्व तमाम एजेंसियां सतर्क रहें और सोशल मीडिया के मंचों की पूरी निगरानी हो। अगर संजीदगी से इस दिशा में काम होता है, तो हम अपने बच्चों को बेहतर माहौल दे सकेंगे। 
मोहित सोनी, टिप्पणीकार

बेईमानों को सबक सिखाने की तैयारी
मोदी सरकार ने परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले बेईमान लोगों को सबक सिखाने के लिए लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 अमल में ला दिया है। यह कानून परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने में कितना कामयाब होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन सवाल यही है कि हमारे नीति-नियंता अब तक आखिर क्यों नौजवानों के भविष्य से हो रहे खिलवाड़ पर आंखें मूंदकर बैठे थे? अगर इस तरह के प्रयास पहले किए जाते, तो संभवत: नीट और नेट के परीक्षार्थियों की जो गत हुई, वह नहीं होती। वैसे, यह भी कम अफसोस की बात नहीं कि आज देश में ज्यादातर लोग परदे के पीछे से सफलता की सीढ़ी चढ़ना चाहते हैं। वे अनुचित तरीकों का इस्तेमाल करके डिग्री हासिल करते हैं व नौकरी पाना चाहते हैं। 
यह सब व्यवस्थागत दोष का नतीजा है। परीक्षाओं का पेपर लीक होना सत-प्रतिशत भ्रष्ट व्यवस्था का नतीजा है। यह भ्रष्टाचार निर्विवाद तौर पर राजनेताओं की छत्रछाया में ही पनपा है। अगर सरकारों ने इस बीमारी का इलाज शुरू में ही करने की रुचि दिखाई होती, तो आज पेपर लीक या नकल जैसी बीमारी मेहनतकश युवाओं के लिए मुसीबत नहीं बनती या इनके सुनहरे भविष्य के सपने को ध्वस्त न करती। इसलिए हमें व्यवस्था पर चोट करनी होगी। जब तक ऐसे गलत काम करने वाले सभी सरकारी अफसरों से लेकर निचले पदों के कर्मचारियों व राजनेताओं में नैतिकता की भावना का विकास नहीं होगा, तब तक कागज पर लिखे सख्त कानून ऐसी धोखाधड़ी को नहीं रोक सकते हैं। यह समझना होगा कि कानून तभी कामयाब होता है, जब उसके रखवाले खुद उस पर अमल करें। जब बाड़ ही खेत को खाने लग जाए, तो उस खेत को तबाह होने से भला कौन रोक सकता है? इसलिए पहले व्यवस्था में सुधार होना चाहिए और यह कोई पंचवर्षीय योजना जैसी न हो, बल्कि त्वरित कार्रवाई की जाए। 
यहां मीडिया की भी उल्लेखनीय भूमिका है। वह इस मुद्दे को तब तक सुर्खियों में रखे, जब तक छात्रों को इंसाफ नहीं मिल जाता। प्रधानमंत्री दसवीं और बारहवीं की वार्षिक परीक्षा से पहले परीक्षार्थियों का हौसला बढ़ाने के लिए ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हैं। ऐसी कवायद प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए भी होनी चाहिए। प्रधानमंत्री को परीक्षार्थियों का साथ देना चाहिए और उनको इंसाफ मिलने का पूरा भरोसा देना चाहिए। इससे व्यवस्थागत दोष जल्द ही दूर होने का विश्वास जगेगा, जो अंतत: देश के लिए सुखद नतीजा लेकर आएगा। 
राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार