
मनुष्य और पशु में मूलभूत अंतर उनके सुख की अवधारणा में निहित है। पशुओं का सुख मुख्यत: शरीर-केंद्रित होता है। यदि उन्हें पर्याप्त भोजन व सोने के लिए सुरक्षित स्थान हो, तो वे संतुष्ट रहते हैं…

इंतजार करना अब दंड भोगने जैसा मालूम होता है। इस रवैये ने लोगों से उनकी नींद छीन ली है। नींद के लिए एक शांत दिमाग चाहिए, जो अपने आप...

यह जीवन वसंत ऋतु है और तुम सोए-सोए बिताए दे रहे हो! वसंत आ गया, फूल खिल गए हैं, पक्षी गीत गा रहे हैं, मोर नाच रहे हैं, सारा जगत उल्लास से भरा है और तुम सोए-सोए बिता दोगे? तुम मूर्च्छित ही बने रहोगे…

क्या विश्वास (आस्था) की स्वीकृति से हम स्वयं को समझ पाते हैं? होता ठीक इसके विपरीत है। विश्वास चाहे धार्मिक हो या राजनीतिक, स्वयं को समझने में बाधक बनता है। वह एक ऐसे आवरण का कार्य करता है, जिससे हम खुद को देखते हैं….

बात 1920 के आस-पास की है। प्रसिद्ध अमेरिकी उद्योगपति हेनरी फोर्ड के रिवर रूज प्लांट में एक विशाल जेनरेटर अचानक बंद हो गया। फोर्ड की अपनी इंजीनियरिंग टीम भी समस्या पकड़ नहीं पाई। तब बुलाया गया चार्ल्स स्टाइनमेट्ज को…

अपने आपको जानने की कोई पद्धति नहीं है। किसी पद्धति को खोजने का एक ही अर्थ होगा कि हम किसी परिणाम को हासिल करना चाहते हैं; और वही तो हम सभी को चाहिए। हम किसी सत्ता-प्रामाण्य का अनुसरण करते हैं…

गौतम बुद्ध ऐसे हैं, जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत भी और हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे हैं…

मनुष्य पतन के मार्ग पर कब चला जाता है? यह सवाल बहुत लोगों को मथता है। दरअसल, मनुष्य का पतन तभी आरंभ हो जाता है, जब वह अपनी आत्मा के अविनाशी स्वरूप की उपेक्षा कर भोग और भौतिक लालसाओं को जीवन का लक्ष्य बना लेता है…

एक साधक परम पुरुष के प्रति कब पूर्णत: समर्पित हो पाता है? बहुत ही गूढ़ प्रश्न है। इसका उत्तर न जाने कब से तलाशा जा रहा है। मेरी राय में यह अवस्था व्यक्ति के पूर्णतया निर्भीक होने पर ही आती है…

दुनिया में एक भी ऐसी संस्कृति नहीं है, जो छुट्टियों की सार्थकता पर सवाल उठाए। दरअसल, लोग छुट्टियों का इंतजार करते हुए काम करते हैं। आखिर वे कौन से पहलू हैं, जो रोज के कामकाज को बोरियत, तनाव, थकान से भर देते हैं…

फिर एक बार बम के धमाके, फिर एक बार मासूम लोगों की लाशें, पुलिस की भागदौड़ और लोगों का आक्रोश। राजनेताओं की धमकियां और बदले की आग का तांडव। अंतत: मुजरिमों को सजा देने के बाद सब चैन की सांस लेते हैं…

जीवन में निर्णय की आवश्यकता कब पड़ती है? यह आवश्यकता तभी होती है, जब कोई उलझन हो। जब कोई उलझन ही नहीं, तो निर्णय की भी आवश्यकता नहीं। यदि तुम्हारी मेज पर लकड़ी का कोई टुकड़ा पड़ा हो और एक मिठाई रखी हो….

यदि किसी का पिता किसी ऊंचे पद पर हो, तो उस बच्चे की बोलचाल में, बातचीत के ढंग में पिता का प्रभाव आएगा। ऐसे बच्चे को अपने पिता पर अभिमान होता है। उतने ही मान से अगर हम ईश्वर को मां-बाप जानते होते…

भविष्य में आमूल परिवर्तन चाहने वाला या उस परिवर्तन को अंतिम लक्ष्य मानने वाला मन कभी सत्य को नहीं पा सकता, क्योंकि सत्य क्षण-प्रतिक्षण पाया जाता है, हर पल नए सिरे से पाया जाता है; संचित अनुभव से कोई खोज संभव नहीं है…

सूफी लोग कहते हैं, जो दिखाई देता है, वही सच नहीं होता, जिंदगी कई तलों पर एक साथ जी जाती है। कभी-कभी हमारे मन में जो सवाल उठता है, उसका जवाब किसी और तल पर बेबूझ तरीके से मिलता है…

भाग्य ऐसी चीज है, जिसे आप अचेतन में निर्मित करते आए हैं। आप इसे सचेतन में भी निर्मित कर सकते हैं। आप अपने भाग्य को फिर से लिख सकते हैं। आप कहां जाना चाहते हैं, आप तय करें, अपना मार्ग और मंजिल खुद चुनें…

एक आदमी अपनी सुनने की क्षमता खोता जा रहा था, मगर वह अपनी इस कमजोरी को मानने को तैयार न था और ऐसा दिखावा करता, जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं है। एक दिन, उसके दोस्त ने बताया कि पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग बहुत बीमार हैं…

मनुष्य जीवन एषणा (अभिलाषा) से जुड़ा हुआ है। एषणा का अर्थ वह इच्छा है, जिसे कर्म का रूप देने का प्रयास किया जाता है। जब तक जीव है, तब तक उसमें एषणा भी रहती है। जीव अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकता…

धार्मिक व्यक्ति वास्तव में वह नहीं है, जो चोंगा या लंगोट पहनता है, दिन में एक बार भोजन करता है, जिसने विधि-निषेध के अनगिनत व्रत ले रखे हैं। धार्मिक व्यक्ति वह है, जो अपने अंतर में सरल है; जो कुछ बनने की फिराक में नहीं है…

जिंदगी के तूफान में टिके रहने के लिए बांस जैसी मानसिकता बहुत जरूरी है। जहां बड़े-बड़े पेड़ आंधियों के आधीन हो जाते हैं, वहीं बांस लचकता हुआ मजे से आंधी को जीत लेता है। बांस का पौधा लगाने के बाद वर्षों तक कोई विकास…