
मानवता को खिलने दें
संक्षेप: कुछ महात्माओं या संतों ने ईश्वर से प्रेम करने की बात की है, लेकिन अब जब आपके पास एक तार्किक मन है, सोचने-समझने वाला, संदेह करने वाला और प्रश्न करने वाला मन है, तो ईश्वर से प्रेम की बात न करें, इसका कोई अर्थ नहीं है…
कुछ महात्माओं या संतों ने ईश्वर से प्रेम करने की बात की है, लेकिन अब जब आपके पास एक तार्किक मन है, सोचने-समझने वाला, संदेह करने वाला और प्रश्न करने वाला मन है, तो ईश्वर से प्रेम की बात न करें, इसका कोई अर्थ नहीं है। आप ईश्वर या स्रष्टा के बारे में सोचते हैं, तो इसका एकमात्र कारण यह है कि आपने सृष्टि का अनुभव किया है। आपके आने से पहले वह सब कुछ यहां था, जिसे आप सृष्टि कहते हैं, इसलिए आपने सहजता से यह मान लिया कि किसी ने इसे जरूर बनाया होगा, और फिर आपने उस स्रष्टा को नाम व रूप देना शुरू किया।
इसलिए स्रष्टा का विचार केवल सृष्टि के माध्यम से ही आपके पास आया। अब आप सृष्टि से घृणा करते हैं, अपनी बगल में बैठे व्यक्ति से घृणा करते हैं और फिर कहते हैं कि आप ईश्वर से प्रेम करते हैं, तो इसका सचमुच कोई अर्थ नहीं है। यह आपको कहीं नहीं ले जाएगा; क्योंकि अगर आप सृष्टि से घृणा करते हैं, तो जिसने इसे बनाया है, उससे भला आपका क्या सरोकार रह जाएगा? जब आप सृष्टि से गहरा प्रेम करते हैं, केवल तभी उसके रचयिता के साथ भी आपका कोई वास्ता हो सकता है। इसलिए ईश्वर के नाम पर अपनी मानवता न छोड़ दें। पहले अपनी मानवता को भरपूर बहने दें, फिर चैतन्य प्रकट होगा।
यह बहुत महत्वपूर्ण संदेश है कि जीसस ने कहा, ‘अपने पड़ोसी से प्रेम करें।’ उनका अर्थ यह नहीं है कि आप अपने पड़ोस की स्त्री के प्रेम में पड़ जाएं; उनके कहने का अर्थ यह है कि आप हर उस व्यक्ति से प्रेम करें, जो अभी, इस वक्त आपकी बगल में है, अब वह चाहे जो भी हो।
आप नहीं जानते कि उसके मन में कौन सी शैतानी चल रही है; यह भी मायने नहीं रखता कि वह अच्छा है या बुरा, आप उसे पसंद करते हैं या नापसंद- वह जो और जैसा भी है, बस उससे प्रेम करें। अगर आप यह करते हैं, तब आप सृष्टि में मिल जाते हैं, और एक बार जब आप सृष्टि में मिल गए, तो समझो कि आपका जीवन संवर गया, क्योंकि वही एक रास्ता है स्रष्टा के पास जाने का। स्रष्टा के पास जाने का सृष्टि एकमात्र मार्ग या एकमात्र दरवाजा है।
अगर आप सृष्टि को अस्वीकार करते हैं, तो स्रष्टा के बारे में कुछ भी नहीं जान सकेंगे। इसलिए ईश्वर से प्रेम करने की चिंता न करें। देखें कि आप अपनी हर श्वास में, हर कदम पर, किए जाने वाले हर कार्य में प्रेम ला सकें, किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति ही नहीं; अगर आप चारों तरफ की सभी चीजों के साथ एक होने की तड़प अपने अंदर पैदा कर सकें, तो सृष्टि आपको स्रष्टा तक पहुंचा देगी।
सदगुरु जग्गी वासुदेव

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