
आया है, वह जाएगा
यह प्रश्न किसी के मन में उठ सकता है कि जब सब कुछ परमात्मा बनाते हैं, तो हर चीज नष्ट क्यों हो जाती है? सृष्टि की मूल वस्तुएं परमात्मा से उत्पन्न होती हैं। किसी चीज की सृष्टि को हम ‘संभूति’ कहते हैं। जब मनुष्य मौलिक वस्तुओं की…
यह प्रश्न किसी के मन में उठ सकता है कि जब सब कुछ परमात्मा बनाते हैं, तो हर चीज नष्ट क्यों हो जाती है?
सृष्टि की मूल वस्तुएं परमात्मा से उत्पन्न होती हैं। किसी चीज की सृष्टि को हम ‘संभूति’ कहते हैं। जब मनुष्य मौलिक वस्तुओं की सहायता से नई वस्तुएं बनाता है, तो इसे संभूति नहीं कहा जाता। ऐसे मौलिक पदार्थ स्वयं उत्पन्न नहीं होते, लेकिन उनकी सहायता से अन्य वस्तुएं बनाई जा सकती हैं। संपूर्ण सृष्टि में जो भी वस्तु है, वह परमात्मा की संभूति का परिणाम है।
ध्वंस या विनाश को समझना भी आवश्यक है। सामान्य अर्थ में ध्वंस यानी नाश, वह होता है, जब कोई वस्तु नष्ट हो जाती है। विनाश उस अवस्था को कहते हैं, जब वस्तु रूपांतरित हो जाए और उसे अपनी मूल अवस्था में वापस न पाया जा सके। ‘प्रणाश’ वह है, जब वस्तु का ध्वंस होने के बाद वही वस्तु नई रूपरेखा में तैयार हो जाए। संभूति परमात्मा की विशेष सृष्टि है। परमात्मा ने सृष्टि को इतना व्यापक रूप दिया है कि हम हर वस्तु में उनकी छाया देख सकते हैं। सृष्टि को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है- जड़ जगत और उद्भिद जगत। चेतन और अचेतन सभी वस्तुएं कालक्रम में विभिन्न शाखाओं में विभाजित हो गई हैं। हर वस्तु, चाहे जड़ हो या चेतन, परमात्मा की सृष्टि का हिस्सा है। जब परम पुरुष स्वयं किसी जड़ वस्तु में विद्यमान होते हैं, तो उस वस्तु को परम पुरुष का अवतार कहा जाता है।
सृष्टि का वैचित्र्य अत्यंत अद्भुत है। जगत में एक जीव अत्यंत उन्नत होता है और कोई जीव कम उन्नत होता है। जीवकोटि की प्रगति सांस्कृतिक और मानसिक प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करती है। ईश्वरकोटि का अर्थ है परमदेवत्व का प्रकाश। जीवकोटि गहन साधना और अभ्यास के माध्यम से ईश्वरकोटि में उन्नति कर सकता है। इस क्रम में साधक का अंतिम लक्ष्य ब्रह्मत्व की प्राप्ति है, जिसमें पूर्ण आनन्द, ज्ञान और एकत्व का अनुभव होता है।
इस प्रकार, जीवन और सृष्टि का मार्ग चार मुख्य सत्य बताते हैं- प्रत्येक वस्तु परमात्मा की संभूति है। विनाश और प्रणाश, सृष्टि के परिवर्तन और रूपांतरण को दर्शाते हैं। जीवकोटि की उन्नति सीमित होती है, लेकिन यह अनुभव और साधना से लगातार बढ़ती है। अंतिम लक्ष्य ईश्वरकोटि और ब्रह्मत्व की प्राप्ति है, जिसमें सभी सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और मनुष्य परम आनंद के स्वरूप में विलीन हो जाता है। इस दृष्टि से हम समझ सकते हैं कि जीवन केवल भौतिक अस्तित्व नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार की यात्रा है। प्रत्येक प्रयास, प्रत्येक साधना और प्रत्येक प्रगति परमात्मा की कृपा और आशीर्वाद का परिणाम है। यही जीवन का वास्तविक उद्देश्य व साधना का मार्ग है।
श्री श्री आनंदमूर्ति

लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


