
आपकी भक्ति कैसी है
भक्ति का स्वरूप मानसिक संघर्ष और नैतिकता, दोनों से जुड़ा है। मानसिक संघर्ष से उपजी भक्ति और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित भक्ति में सूक्ष्म अंतर है। नैतिक नियमों के पालन से जन्मी भक्ति में वह भावनात्मक गहराई नहीं होती…
भक्ति का स्वरूप मानसिक संघर्ष और नैतिकता, दोनों से जुड़ा है। मानसिक संघर्ष से उपजी भक्ति और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित भक्ति में सूक्ष्म अंतर है। नैतिक नियमों के पालन से जन्मी भक्ति में वह भावनात्मक गहराई नहीं होती, जिसमें भक्ति की मिठास अनुभव की जा सके। ऐसी भक्ति लेन-देन जैसी होती है, जिसमें व्यक्ति परमात्मा से कुछ पाने की अपेक्षा करता है।
सच्ची भक्ति तो सर्वोच्च सत्ता के बारे में निरंतर चिंतन से उत्पन्न होती है। जब मनुष्य का मन क्षुद्र विचारों से मुक्त होकर महान के आकर्षण में डूब जाता है, तभी वास्तविक आध्यात्मिक शांति मिलती है। परमात्मा का आकर्षण सार्वभौमिक है। वह सबको अपनी ओर खींचते हैं। कभी यह आकर्षण सुख का रूप लेता है, कभी दुख का। भक्त दोनों ही स्थितियों को ईश्वर की कृपा मानकर स्वीकार करता है।
सच्चा साधक सुख में कहता है, ‘प्रभु, आप कितने महान हैं कि मुझ जैसे तुच्छ को याद किया। और दुख में कहता है, ‘हे प्रभु, आप कितने महान हैं कि दुख के रूप में भी मुझे अपनी उपस्थिति का अनुभव कराया।’ निर्दोष व्यक्ति के लिए न्यायालय से बरी होना ईश्वर की कृपा है, तो दोषी के लिए दंड पाना ईश्वर की चेतावनी है।
भक्ति का मार्ग विद्या की ओर ले जाता है। विद्या का अर्थ है, मुक्ति देने वाली शक्ति। जब साधक अपने मन और जीवन को विद्या के प्रवाह में समर्पित करता है, तो उसका व्यक्तिगत विद्या बल ब्रह्म की असीम विद्या शक्ति में विलीन हो जाता है। यही सगुण ब्रह्म की साधना है। इसके विपरीत, जो अविद्या के मार्ग पर चलता है, वह ब्रह्मांडीय इच्छा के विरुद्ध जाता है और उसका परिणाम विनाशकारी होता है। भावपूर्ण भक्ति में साधक मुक्ति की इच्छा रखते हुए भी ईश्वर के आकर्षण से प्रेरित होता है। रागात्मिका भक्ति में साधक की साधना केवल परम पुरुष की ओर तृष्णा बन जाती है, वह मुक्ति तक की कामना छोड़ देता है।
भक्ति का मार्ग किसी वर्ग या विद्वता तक सीमित नहीं है। अशिक्षित साधक भी अपनी गहन भक्ति से ऊंचाई प्राप्त कर सकते हैं। कई बार महान विद्वान भी साधारण जन की भक्ति देखकर विस्मित हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि भक्ति केवल ज्ञान का विषय नहीं, जीवन भर की साधना और समर्पण का परिणाम है।
अंततः, महान का आकर्षण ही भक्ति का केंद्र है। यह आकर्षण आध्यात्मिक प्रगति ही नहीं, शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक प्रगति के बीच सामंजस्य भी स्थापित करता है। जब साधक इस आकर्षण में डूबकर अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर देता है, तो उसकी साधना एक बिंदु भक्ति बन जाती है। यही केवल भक्ति है, जहां ईश्वर ही जीवन का केंद्र और लक्ष्य बन जाते हैं।
श्री श्री आनंदमूर्ति

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