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27 जनवरी, 2020|11:45|IST

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हमें जवाब की शैली बदलनी होगी

भारतीय जवानों के साथ बर्बरता की हदें पार कर लेना पाकिस्तानी फौज की फितरत हो चली है। पाकिस्तानी बॉर्डर एक्शन टीम ने अभी जिस तरह से दो भारतीय जवानों को मारा और उनके अंग-भंग किए, उससे यह साफ जाहिर होता है कि बर्बरता अब उनकी कार्यशैली का हिस्सा बन चुकी है और हमें इस सच को कबूल करके अपनी जवाबी रणनीति तलाशनी होगी। पाकिस्तानी फौज का रवैया ऊपर से तो ब्रिटिश आर्मी या किसी आधुनिक सेना जैसा दिखता है, मगर दिमागी स्तर पर वह आज भी मध्ययुगीन इस्लामी फौजों की तरह काम करती है। बलूचिस्तान में अपने हक के लिए आवाज उठाने वाले भी इसी बर्बरता के शिकार बन रहे हैं। हमारी मुश्किल यह है कि हम अब तक ‘पृथ्वीराज चौहान सिंड्रोम’ से पीड़ित हैं कि दुश्मन को हराने के बावजूद उसके साथ बाइज्जत पेश आएं। हमें यह समझना होगा कि जब दुश्मन बर्बर हो, तो उसे उसकी जबान में जवाब देना ही उचित है।

भारतीय जवानों पर हुए इस हमले की कई वजहें हो सकती हैं। एक वजह रणनीतिक हो सकती है। तनावग्रस्त इलाकों में इस तरह की घटनाओं का लेन-देन होता रहता है। हमने अक्सर यह देखा है कि जब भी पाकिस्तान की ओर से इस तरह की बर्बर कार्रवाई होती है, भारत उसका माकूल जवाब देता है। अभी भारतीय हुकूमत से उसी जवाब का इंतजार पूरा मुल्क कर रहा है।

इस हमले की एक अन्य वजह सामरिक भी हो सकती है। असल में, पाकिस्तान की तरफ से जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसला बनाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। आतंकी बुरहान वानी को मारे जाने के बाद से इसमें तेजी जरूर आई, मगर पाकिस्तान को अब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मनमाफिक साथ नहीं मिल सका है। चूंकि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने अपनी भारत-यात्रा के दौरान कश्मीर पर बहुपक्षीय बातचीत का सुझाव दिया था (जिसका कोई मतलब नहीं है), इसलिए मुमकिन है कि पाकिस्तान की मंशा सीमा पर तनाव बढ़ाकर कश्मीर को सुर्खियों में लाने की हो।

यह घटना पाकिस्तानी सेना प्रमुख के पिछले दिनों नियंत्रण रेखा के दौरे के दरम्यान दिए गए भड़काऊ भाषण का असर भी हो सकता है कि उनके सैनिकों ने उत्तेजना में यह कृत्य कर डाला। वैसे, पिछले कुछ समय से पाकिस्तान में नागरिक सरकार और सेना के बीच एक कशमकश की स्थिति भी बनी हुई है। पाकिस्तानी अखबार डॉन  के हालिया खुलासे बताते हैं कि बीते साल के अंत में नागरिक सरकार और फौज के नुमाइंदों के बीच एक मुलाकात हुई थी। उसमें राजनीतिक पक्ष का कहना था कि दहशतगर्दों को लेकर सेना के दोहरे रवैये का खामियाजा सरकार भुगत रही है और कश्मीर मसले पर उसकी कोई नहीं सुन रहा। कहा यह भी गया कि जब हुकूमत दहशतगर्दों पर कार्रवाई करती है, तो फौज आतंकियों को बचा ले जाती है। इस खुलासे से स्वाभाविक तौर पर पाकिस्तान में हंगामा मचा है और फौज व हुकूमत के बीच दरार दिख रही है। फौजी हुक्मरान इसलिए भी नाराज हैं, क्योंकि इस खुलासे से उनके दामन दागदार हुए हैं। लिहाजा मुमकिन है कि पाकिस्तान की जनभावना का फायदा उठाने की कोशिश के तहत कश्मीर में तनाव बढ़ाया गया हो, ताकि लोग सेना के पक्ष में फिर से खड़े हों। इससे संदेश यही जाएगा कि नागरिक हुकूमत अगर भारत के साथ बातचीत को उत्सुक भी हो, तो सेना ऐसी किसी कवायद के पक्ष में नहीं है। 

इस घटना को उन अटकलों से भी जोड़ा जा सकता है, जो पिछले हफ्ते वहां छाई रहीं। पिछले सप्ताह एक भारतीय उद्योगपति सज्जन जिंदल ने वजीर-ए-आलम नवाज शरीफ से मुलाकात की थी, जिससे यही संदेश निकला कि सरकार भारतीय हुक्मरान के साथ परदे के पीछे से बातचीत को इच्छुक है। भारत की तरफ से इस पर कोई खंडन नहीं आया और पाकिस्तानी हुकूमत ने भी इस पर कोई खास बात नहीं कही। चूंकि सज्जन पहले भी नवाज शरीफ और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके हैं, लिहाजा फौज से जुड़े पत्रकारों ने इस मुलाकात पर काफी बवाल मचाया और अंदरखाने सांठगांठ के आरोप लगाए। ऐसे में, सीमा पर अचानक तनाव बढ़ाकर बातचीत की छोटी-सी पहल को भी ध्वस्त करने की साजिश रची गई होगी।
वजह जो भी हो, अब सवाल यह है कि हम आगे क्या रुख अपनाएं? एक विकल्प यह है कि फौज अपने तईं जवाब दे। मसलन, एक ही पोजीशन के ऊपर फायर करना, उन तकनीक या हथियार का प्रयोग करना, जो किसी खास इलाके को नेस्तानाबूद करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं या फिर सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई करना। हालांकि यह सच है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाइयों के बाद भी हम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। आगे भी पाकिस्तान अपनी नापाक हरकत दोहराता रहेगा। सीमा पर हालात थोड़े से भी सामान्य होंगे, तो पाकिस्तानी फौज हमारे जवानों को निशाना बनाकर संयम की हमारी हदों को जानने की कोशिश करती रहेगी। मगर इसका यह मतलब नहीं है कि हम सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई न करें। यह उसे उसी की भाषा में जवाब देने का तरीका भी है।

जरूरत कूटनीतिक स्तर पर भी प्रयास करने की है। यह हमारी गलती रही है कि पाकिस्तान को दहशतगर्द मुल्क घोषित करने संबंधी विधेयक को हमने पारित नहीं किया। जिस तरह, अमेरिका अपने तईं ऐसी घोषणाएं करता है और तमाम तरह के प्रतिबंध लगाता है, ठीक यही कदम हमें भी पाकिस्तान के संदर्भ में उठाना चाहिए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस पर सरकार ने संसद में बहस तक नहीं होने दी। 

एक प्रयास यह भी हो कि दूसरे तमाम देशों को पाकिस्तानी फौज की असलियत के सुबूत दिए जाएं। कारोबारी स्तर पर भी ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए हम वहां अपने उच्चायोग को सीमित कर दें और अपने उच्चायुक्त को वापस बुला लें। हमें समझना होगा कि सीमा पार से होने वाली बर्बर कार्रवाइयों का एक जवाब कूटनीतिक रिश्ते को कमतर करना भी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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