Vibhuti Narayan Rai article in Hindustan on 20 december - लमहों का गुस्सा, सदियों का विमर्श DA Image
18 फरवरी, 2020|11:08|IST

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लमहों का गुस्सा, सदियों का विमर्श

विभूति नारायण राय

आज से पांच साल पहले पूरे देश की आत्मा को झकझोरने वाले निर्भया कांड ने एक ऐसे विमर्श को जन्म दिया है, जिसके कई पहलुओं पर अभी तक पूरी बहस होनी बाकी है। सारे देश का गुस्सा 23 वर्षीया निर्भया के साथ हुई र्दंरदगी पर फूट पड़ा और दिल्ली के अलावा छोटे-बड़े तमाम शहरों-कस्बों में लोग सड़कों पर निकल आए। यह स्वाभाविक भी था कि यदि सुरक्षा के सारे ताम-झाम के बावजूद राजधानी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, तो शेष देश में उनकी स्थिति कैसी होगी? पूरा विमर्श स्त्री पक्ष को केंद्र में रखकर हुआ था और इसके कई दूरगामी परिणाम भी निकले। इस एक मामले ने यौन उत्पीड़ित स्त्री की झिझक, शर्मिंदगी और भय पर सबसे निर्णायक प्रहार किया और पहली बार अधिकाधिक परिवारों ने पीड़िता को ही दोषी ठहराने की जगह उसके साथ खड़ा होना शुरू किया है। अब ज्यादा महिलाएं अपने साथ हुई ज्यादतियों के खिलाफ खुलकर बोल रही हैं, पुलिस और मीडिया इन मुद्दों पर अधिक संवेदनशील हुए हैं तथा समुदाय की सहानुभूति पीड़िता के साथ पहले के मुकाबले बढ़ी है। निर्भया की वजह से कानूनों में परिवर्तन हुए और कामकाजी महिलाओं के लिए कार्य-स्थल अधिक सुरक्षित बने हैं। यह स्वातंत्र्योत्तर भारत के बड़े मूल्यगत परिवर्तनों में से एक है, पर मुझे लगता है कि निर्भया विमर्श के शोर-शराबे में दो महत्वपूर्ण बिंदु हमारी नजरों से ओझल हो गए।

सभ्य बनने की प्रक्रिया में मनुष्य ने मानवाधिकारों के कई सोपान चढ़ते हुए अपराधियों को दंड देने के तौर-तरीकों में भी क्रमश: बड़े बदलाव किए हैं। अमेरिका, चीन और इस्लामी देशों के कुछ अपवादों को छोड़कर विश्व के अधिकांश देशों ने अपराधियों को कोड़े लगाने या अंग भंग जैसी सजाएं खत्म कर दी हैं और लगभग आधी दुनिया ने मृत्युदंड समाप्त कर दिया है। भारत में कानून की किताबों में अभी भी फांसी मौजूद है और हर साल देश भर में अदालतें सौ से अधिक व्यक्तियों को मृत्युदंड सुनाती हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 1998 से 2013 के बीच 2,000 से ज्यादा अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी, यह अलग बात है कि इन वर्षों में सचमुच सिर्फ तीन ही फंदे से लटकाए गए। इनमें से कुछ तो अभी भी काल कोठरियों में बंद अपनी अपीलों के निस्तारण का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अधिकतर की सजाएं उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय या राष्ट्रपति के स्तर से संशोधित हो चुकी हैं। यह एक आम भारतीय अनुभव है कि किसी जघन्य अपराध के फौरन बाद एक गुस्से की लहर आती है और सड़कों पर लोग मांग करते हैं कि अपराधियों को सरे राह फंदे से लटका दिया जाए। प्रकरण के मीडिया ट्रायल में भी यही मांग की जाती है और निचली अदालतें भी जन-भावनाओं से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पातीं। कुछ वर्षों के अंतराल के बाद जब गुस्सा ठंडा पड़ चुका होता है, तब यही प्रक्रिया भिन्न हो जाती है। सबसे दिलचस्प तो वे मामले होते हैं, जहां अदालती उलझावों में ही लंबा समय बीत जाता है और कोई अपीली अदालत ही यह कहकर सजा कम कर देती है कि वर्षों से मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाले दोषी को फांसी चढ़ाना क्रूरता होगी। कुल मिलाकर, कह सकते हें कि भारतीय मानस राज्य द्वारा मृत्यु दिए जाने का ठंडे विवेक से समर्थन नहीं करता। पिछले कुछ वर्षों से मानवाधिकार एक्टिविस्ट, न्यायविद और राजनीतिक समुदाय दंड के इस बर्बर तरीके को समाप्त करने की मांग करते रहे हैं, पर निर्भया कांड ने समय के चक्र को उल्टा घुमा दिया। हत्या और बलात्कार के बाद हर मामले में फांसी देने की आवाजें उठने लगी हैं। 

निर्भया विमर्श का दूसरा दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष किशोरों से जुड़ा है। इस मामले के छह अभियुक्तों में से एक किशोर था और केवल वही मृत्युदंड से बच सका, पर उसके बहाने देश में किशोरों को भी फांसी देने के पक्ष में जबर्दस्त बहस हुई। कोई शक नहीं कि जिस नृशंसता से निर्भया की हत्या हुई थी, उससे पूरा देश दहल गया था, पर उसके एवज में जिस तरह से मारो-काटो का शोर मचा, उससे लगा कि अभी हम पूरी तरह से प्रौढ़ लोकतंत्र नहीं बने हैं। राम मनोहर लोहिया ऐसी ही स्थिति के लिए क्रूर कायरता शब्द का इस्तेमाल करते थे। इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर पीड़िता के मां-बाप की किशोर को फांसी पर लटकाने की भावुक अपील तो समझ में आ सकती है, पर शेष पैनलिस्ट का इसी में सुर मिलाकर किशोरों के लिए बने कानूनों को बदलने की बात बेचैनी पैदा करती है।

छोटे होते परिवार, कामकाजी मां-बाप के पास समय की कमी, कंक्रीट के जंगलों में खेल के मैदानों का अभाव, सफलता की अंधी दौड़ और उसके दबाव, अराजक इंटरनेट, बहुत सारी भूल-भुलैया हैं, जिनमें आज का किशोर भटक रहा है। नोएडा में पिछले दिनों एक किशोर द्वारा अपनी बहन और मां की नृशंस तरीके से हत्या और फिर निरुद्देश्य बनारस में भटकने की घटना ने लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए, पर यह तो सिर्फ रोग का लक्षण है। इस किशोर को वयस्क मानकर कठोरतम दंड देने की मांग की बजाय हमें उसके मन में झांकने का समय निकालना होगा। परिवारों, स्कूलों या पार्कों में उन्हें सहानुभूति और समझदारी से लबरेज स्पेस की जरूरत है। इस घटना के फौरन बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नरक बन चुके बाल गृहों की खबरें देखने को मिलीं। इनमें कुछ समय बिताने के बाद किशोर के पक्के अपराधी बनकर निकलने की पूरी गारंटी समाज देता है। लगभग हमारी जेलों जैसी स्थिति है, जहां का भ्रष्ट और क्रूर निजाम बंदियों को सुधारने के स्थान पर ज्यादा बड़ा अपराधी बनाकर निकालता है। 
  
किशोर न्याय के सिद्धांत पिछले कई सौ वर्षों तक चले विमर्शों का नतीजा हैं और इनमें मानव चेतना की यह समझ झलकती है कि अपने कृत्य के दुष्परिणामों को समझने में असमर्थ किशोर को कठोर दंड के स्थान पर सहानुभूति पूर्वक सुधारने की कोशिश की जानी चाहिए। इसी समझ के अंतर्गत आम अपराधियों की जेलों से अलग उनके लिए व्यवस्था की जाने लगी है। उनकी जेलों को सुधार गृह कहा जाता है। किशोरों के लिए अपराध शास्त्र की नई सैद्धांतिकी विकसित हुई है, जिसमें क्रूरता से अधिक सहानुभूति को स्थान मिला है। देर से ही सही, पर धीरे-धीरे भारतीय स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड दिए जाने के खिलाफ सहमति बनती जा रही है। ऐसे में, फांसी या सख्त सजा के पक्ष में बहस समाज को क्रूर बनाने की प्रक्रिया का ही अंग होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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