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अपने ही समझौते से भाग निकला अमेरिका

CHANDRA BHUSHAN

जब डोनाल्ड ट्रंप पेरिस समझौते से बाहर निकलने के अपने फैसले का एलान कर रहे थे, तो वह असल में, अपनी उन्हीं जलवायु-विरोधी नीतियों को मूर्त रूप दे रहे थे, जिन्हें अमेरिका का राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से वह प्रोत्साहित करते रहे हैं। इस वर्ष मार्च में ही उन्होंने जीवाश्म ईंधन के समर्थन में एक आदेश जारी किया था। यह आदेश न सिर्फ कोयला खनन को बढ़ावा देता है, बल्कि जीवाश्म ईंधन के घरेलू संसाधनों के दोहन को कुंद करने वाले नियमों को प्रभावहीन करने, संशोधित करने या फिर रद्द करने का अधिकार देता है। इतना ही नहीं, यह आदेश ऊर्जा क्षेत्र में कार्बन-प्रदूषण मानकों को रद्द करता है और उन स्वच्छ ऊर्जा योजनाओं को लागू करने से रोकता है, जिनका उद्देश्य ऊर्जा संयंत्रों से कार्बन डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करना है।

देखा जाए, तो ताजा घोषणा से पहले ही ट्रंप ने अमेरिका में जीवाश्म ईंधन की खपत और ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने की ओबामा प्रशासन की ‘मामूली’ पहल को खत्म कर दिया था।

इस आदेश से पहले पेश अपने संघीय बजट में भी ट्रंप प्रशासन ने ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने से जुड़े ज्यादातर कार्यक्रमों का बजट खत्म कर दिया था और जलवायु अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक अभियानों के पर कतर दिए थे। उल्लेखनीय बात तो यह है कि ट्रंप ने ग्रीन क्लाइमेट फंड (जीसीएफ) के साथ ही यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) को भी फंड देने से मना कर दिया था। जबकि जीसीएफ इसलिए बनाया गया है, ताकि विकासशील देश जलवायु परिवर्तन से लड़ सकें और निम्न-कार्बन तकनीक की तरफ बढ़ सकें। साफ है कि जीसीएफ और जलवायु परिवर्तन से जुड़े दूसरे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को फंड देने से इनकार करके ट्रंप यूएनएफसीसीसी और पेरिस समझौते के अपने वादे से पहले ही मुकर चुके थे।
लिहाजा ट्रंप का हालिया फैसला बाकायदा पेरिस समझौते के औपचारिक अंत का एलान था। ऐसा करके ट्रंप ने पेरिस समझौते को बुनियादी तौर पर कमजोर कर दिया है। इससे स्वाभाविक तौर पर उसकी प्रकृति भी बदल गई है।

यहां यह समझना जरूरी है कि पेरिस समझौता अमेरिका के लिए और उसकी सुविधा को देखते हुए तैयार किया गया था। चूंकि यह देश अपनी पूरी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था और जलवायु समस्या के हल में अपने हिस्से का काम नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने पेरिस समझौते के रूप में एक ऐसे करार को आगे बढ़ाया, जिसमें उसके हिस्से कम से कम जिम्मेदारी हो। समझौते के तहत अमेरिका ने उत्सर्जन में कमी का कम से कम वायदा किया। उसने साल 2025 तक 2005 के स्तर से 26-28 फीसदी कमी का वायदा किया था। मगर यदि हम 1990 को आधार बनाएं, तो अमेरिका 2025 तक महज 13-15 फीसदी ही कमी करेगा और साल 2030 तक 23-27 फीसदी। इसकी तुलना अगर यूरोपीय संघ से करें, तो 28 देशों का यह कुनबा साल 2030 तक 1990 के स्तर से 40 फीसदी तक कमी करेगा। चूंकि ओबामा प्रशासन अमेरिकी सीनेट से पेरिस समझौते की मंजूरी नहीं चाहता था, इसलिए इस समझौते को स्वैच्छिक, कानूनी तौर पर गैर-बाध्यकारी और गैर-दंडात्मक बनाया गया।

कुल मिलाकर कहें, तो पेरिस समझौता ‘अमेरिका द्वारा, अमेरिका के लिए’ था। इसीलिए इस समझौते पर ‘अनुचित’ होने की तोहमत लगाकर अमेरिका का इससे बाहर आना बाकी के 194 देशों को जड़ा गया एक थप्पड़ है, जिन्होंने अमेरिकी मरजी और सनक के आगे इसलिए घुटने टेके थे कि वह पेरिस समझौते में अपनी पूरी भागीदारी निभाएगा।

साफ है कि अमेरिका की पूरी हिस्सेदारी के बिना पेरिस समझौता अपने उद्देश्य को नहीं पा सकता। आबोहवा बिगाड़ने में अमेरिका का सबसे बड़ा योगदान रहा है। पर्यावरण में कुल कार्बन के 21 फीसदी का जिम्मेदार वह है। अभी वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रदूषक देश है और प्रति-व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में पहला। उसने अपने ‘कार्बन बजट’ पहले ही खत्म कर रखे हैं। इसीलिए जब तक अमेरिका उत्सर्जन थामने के लिए अपने हिस्से की जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, बाकी मुल्क पेरिस समझौते के मूल उद्देश्य को नहीं पा सकेंगे।

पेरिस समझौता दरअसल इस बुनियाद पर आधारित है कि ज्यों-ज्यों यह करार आगे बढ़ेगा, उत्सर्जन कम करने का देशों का लक्ष्य भी ‘परवान’ चढ़ेगा। ट्रंप अब इसमें अमेरिका की जिम्मेदारी को ‘कम करना’ चाहते हैं, जो समझौते की बुनियाद के खिलाफ है। अगर लक्ष्य को बार-बार नहीं आगे बढ़ाया जाएगा, तो पेरिस समझौता धरती के तापमान को मानव जीवन के लिए सुरक्षित बनाने में नाकाम रहेगा। इसी तरह, इस समझौते के तहत विकसित देशों को विकासशील व अल्प-विकसित देशों को आर्थिक व तकनीकी मदद करनी थी। उन्हें साल 2020 से कम से कम 100 अरब डॉलर का अनुदान देना था। स्पष्ट है कि अमेरिका के पांव खींचने से जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जरूरी इस आर्थिक मदद में कमी आएगी। विकासशील देशों ने तो इसी मदद की आस में पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 

बहरहाल, अब जबकि शेष 194 देश पेरिस समझौते के साथ बहादुरी से खड़े हैं, तो वे जरूर जानते होंगे कि यह उनके लिए एक बुरा वक्त है। अब उनके पास दो रास्ते बचे हैं- पहला, डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद से उतरने का इंतजार करें और यह उम्मीद पालें कि नया राष्ट्रपति ‘जलवायु-हितैषी’ होगा। मगर सच यह भी है कि इस तरह की रणनीति इतिहास में सफल होती नहीं दिखी है। मसलन, क्लिंटन ने क्योटो प्रोटोकॉल पर सहमति जताई थी, मगर बुश जूनियर ने उसे कांग्रेस की मंजूरी नहीं दिलाई। ओबामा ने पेरिस समझौते को मंजूरी दिलाई, तो ट्रंप ने इसे नकार दिया। इसीलिए अमेरिका के प्रति अनुराग रखने और ‘मुक्तिदाता’ का इंतजार करने का कोई मतलब नहीं। दूसरा रास्ता यह है कि तमाम देश पेरिस समझौते में संशोधन करें और इसे खूब मजबूत बनाएं। इसमें यह सुनिश्चित करने के लिए दंडात्मक उपाय किए जाने चाहिए कि अमेरिका जैसे देश अपनी ‘निष्पक्ष व न्यायसंगत’ जिम्मेदारियों से बचकर न निकल भागें। 

मैं यही मानता हूं कि अमेरिका पूरी दुनिया को बंधक नहीं रख सकता। दुनिया की महज पांच फीसदी आबादी वाले इस मुल्क को बाकी देशों के 95 फीसदी लोगों के जीवन के साथ खेलने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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  • Web Title:US back out of own promise