DA Image
2 जुलाई, 2020|12:38|IST

अगली स्टोरी

सुरक्षा तैयारियों को मात देते आतंकी

हरिंदर सेखों, सीनियर फेलो, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन

बार्सिलोना, स्टॉकहोम, बर्लिन, लंदन, नीस और अब लोअर मैनहट्टन... इन तमाम हमलों में एक समानता यह है कि दहशत किसी हथियार से नहीं, बल्कि ट्रक या किसी अन्य वाहन से फैलाई गई। हमलावर एक वाहन लेकर भीड़ में घुसता है और कई लोगों को मौत की नींद सुला देता है। दुखद बात यह है कि आतंक फैलाने की इस नई प्रवृत्ति को थामने के लिए सुरक्षा एजेंसियां संजीदा नहीं दिख रहीं। अमेरिका में भले ही इस तरह का यह पहला वाकया हो, लेकिन यूरोप में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। और जब अमेरिका व यूरोप के बीच इंटेलीजेंस और काउंटर टेररिज्म (सुरक्षा व आतंकी हमलों से निपटने) को लेकर आपसी तालमेल है, तब अमेरिकी एजेंसियों को समय रहते सतर्क हो जाना चाहिए था। जाहिर है, यह घटना अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों में तालमेल की कमी का नतीजा है। 


मैनहट्टन हमले में हमलावर की पहचान उज्बेकिस्तान के नागरिक के रूप में हुई है। वह 2010 में अमेरिका आया था। मगर उसका पिछला रिकॉर्ड उसकी कहानी खुद बयां कर रहा है। उस पर यातायात नियमों के उल्लंघन के कई मामले अलग-अलग राज्यों में दर्ज हैं। इन आरोपों में वह पहले हिरासत में भी लिया जा चुका था और जुर्माना भी भुगत चुका है। ऐसे में, सवाल है कि इतना सब होने के बावजूद वह ट्रक भाड़े पर लेने में कैसे कामयाब हो गया? भारत जैसे देशों में तो यह कल्पना आसान है, क्योंकि यहां सुरक्षा के मोर्चे पर कई तकनीकी चूक आम बात हैं, लेकिन अमेरिका में ऐसा संभव नहीं। वहां हर शख्स को एक सामाजिक सुरक्षा कार्ड मिला हुआ है, जिसके जरिए उसका पिछला रिकॉर्ड आसानी से खंगाला जा सकता है। ऐसी स्थिति में, हमलावर का भाड़े पर ट्रक हासिल कर लेना बड़ी चूक का मामला है। मान लिया कि ट्रक मुहैया कराने वाली कंपनी ने तमाम नियम-कानूनों का पालन किया होगा, तो क्या हमलवार के पास कई दूसरे तरह के ड्राइविंग लाइसेंस भी थे? अगर ऐसी कोई बात जांच में सामने आती है, तो यह अमेरिकी  सुरक्षा-व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा मानी जाएगी। हालांकि वहां के सुरक्षा ढांचे को देखते हुए इसकी आशंका नाम मात्र की है।

इस हमले से अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों व नागरिक समाजों के लिए एक सबक यह भी है कि उन्हें अब उन उपायों पर भी ध्यान देना चाहिए, जो किसी आतंकी हमले की आशंका की सूरत में समय-पूर्व उठाए जाते हैं। दरअसल, कहीं भी हमले के बाद की योजना, जांच-पड़ताल या सुरक्षा व्यवस्था पर ही जोर दिया जाता है। अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं। पिछले महीने ही जब लास बेगास में ‘गन अटैक’ की एक बड़ी घटना हुई थी, तो देश में ‘बंदूक संस्कृति’ को खत्म करने के सपने दिखाए गए थे। मगर अब शायद ही इस पर कोई बात करता दिखता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रवासियों, खासकर कट्टरपंथियों को देश में दाखिल होने से रोकने के लिए कई दावे कर चुके हैं, पर जमीनी हकीकत जगजाहिर है। मैनहट्टन हमले के बाद व्हाइट हाउस का बयान आया है कि मध्य-पूर्व और आतंकवाद से प्रभावित अन्य जगहों के लोगों को अमेरिका के भीतर घुसने की इजाजत नहीं दी जाएगी। मगर आतंकी हमले ऐसे बयानों की सच्चाई बताने को काफी हैं। 9/11 हमले की वजह भी सुरक्षा चूक ही बताई गई थी। लिहाजा अमेरिका में निगरानी तंत्र को कहीं अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है।

देखा जाए, तो यह जरूरत अमेरिका की नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशों की है। आज आतंकवाद का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। दहशत फैलाने के लिए अब किसी साथी या हथियारों के बड़े जखीरे की जरूरत नहीं पड़ती। अकेला शख्स भी कई या तमाम लोगों की जान ले सकता है। जैसे-तैसे हमला कर देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऑनलाइन माध्यमों ने ऐसे लोगों का आतंकी जमातों से संपर्क आसान कर दिया है। ऐसे में, जरूरी है कि तमाम एजेंसियों के बीच अच्छा तालमेल हो। अमेरिका में ही मेट्रो में आने-जाने के लिए वैसी व्यवस्थाएं या चौकसी नहीं दिखती, जैसी भारत में दिखती है। वहां हमारी तरह कोई जांच-पड़ताल नहीं की जाती। जब अमेरिका आतंकी तंजीमों के निशाने पर हो, तो ऐसी खुली व्यवस्था उसकी सुरक्षा को चोट पहुंचा सकती है। अब आतंकवादी उन शहरों को निशाना बनाने लगे हैं, जो न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी एक ‘हब’ बन चुके हैं। बार्सिलोना से लेकर मैनहट्टन तक तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं। ऐसे में, सुरक्षा व्यवस्था की थोड़ी-सी अनदेखी किसी पर भी भारी पड़ सकती है। 

जरूरत उन संगठनों पर भी निगरानी रखने की है, जो संकीर्ण सोच को बढ़ावा देते हैं। उज्बेकिस्तान के शरणार्थियों के बारे में कहा जाता है कि यूरोप, खासकर स्टॉकहोम में उन्होंने ऐसी संस्थाएं बना रखी हैं, जिनका मकसद इस्लामिक आंदोलन को जिंदा रखना है। अमेरिका में ऐसी कोई संस्था काम कर रही है या नहीं, इसे लेकर फिलहाल जांच चल रही है। इसके साथ-साथ, जो लोग सुरक्षा प्रतिष्ठानों के रडार पर हैं, उनके लिएभी कानून को सख्त बनाना होगा। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि इस चक्कर में कहीं निर्दोष को ही निशाने पर लिए जाने की वारदात न बढ़ जाएं। 


बदलते संदर्भ में भारत को भी विशेष सतर्कता बरतनी होगी। यह सही है कि आईएस अब तक हमारे देश में दाखिल नहीं हो सका है, लेकिन हम उसके निशाने पर हैं। यहां स्लीपर सेल होने की बात बार-बार सामने आती रही है। सुखद है कि आंतरिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने की तरफ लगातार ध्यान दिया जा रहा है। हमने उन सोशल मंचों को भी निशाने पर लिया है, जो दहशत का बीज लोगों के दिमाग में बोते हैं। बावजूद इसके केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने की जरूरत है। हमारे पास श्रम बल की कमी नहीं। अगर अद्र्धसैनिक व पुलिस बलों को विशेष तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे कहीं ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं। जरूरत केंद्र के स्तर पर एक निगरानी तंत्र विकसित किए जाने की भी है। हमारी आबादी काफी ज्यादा है, बुनावट भी खासी अलग है, इसलिए हमारी चुनौतियां भी बड़ी हैं। आतंक विरोधी नीतियों को समग्रता से लागू करना मौजूदा वक्त की जरूरत है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:Terrorists defeating security preparedness