Sushant Sarin Article in Hindustan Hindi Newspaper on Pakistan politics 21st of September - दोराहे पर खड़ी पाकिस्तानी राजनीति DA Image
21 फरवरी, 2020|11:41|IST

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दोराहे पर खड़ी पाकिस्तानी राजनीति

Sushant Sarin, Expert Pakistan Affairs

पनामा पेपर्स मामले में अयोग्य ठहरा दिए गए फैसले के खिलाफ नवाज शरीफ की पुनर्विचार याचिका को खारिज होना ही था। इसका इल्म उन्हें भी था। मगर अटपटी बात यह रही कि यह फैसला जल्दबाजी में, महज दो-तीन दिनों के भीतर लिया गया। लाहौर उप-चुनाव से ठीक दो दिन पहले ही, जहां नवाज शरीफ की खाली सीट पर मतदान होने जा रहा था। पूरी बिसात बिछाकर चाल चली गई थी, क्योंकि किसी भी चुनाव या उप-चुनाव के ऐन पहले इस तरह के फैसले से उस दल या नेता के परंपरागत वोटर अमूमन हताश हो जाते हैं। वोटिंग में इसका पैटर्न भी दिखा। भले ही नवाज शरीफ की बेगम कुलसुम शरीफ विजयी हुई हैं, पर पीएमएल-एन का वोट प्रतिशत गिरा है।

इस फैसले में सबसे अखरने वाली दूसरी बात जजों की टिप्पणी है। कोई भी अदालत सुबूतों के आधार पर फैसला सुनाती है, पर इस मामले में जजों ने मियां शरीफ के वकीलों को यह तक हिदायत दे डाली कि वे उनका मुंह न खुलवाएं, वे कई ऐसी टिप्पणियां कर सकते हैं, जो उनके मुवक्किल के लिए परेशानी की बात होगी। यह चौंकाने वाली तस्वीर है। अगर नवाज शरीफ के खिलाफ इतना ही बड़ा कोई मामला था, तो उन्हें उस आधार पर क्यों अयोग्य ठहराया गया, जिसकी बात जमाने में अमूमन हो ही नहीं रही थी। उन पर दोष यह साबित हुआ था कि दुबई स्थित बेटे की कंपनी से हुई कमाई का उन्होंने खुलासा नहीं किया, जबकि नवाज शरीफ का कहना है कि उन्होंने वहां से कोई वेतन लिया ही नहीं, तो खुलासा कैसा? स्पष्ट है, हालिया अदालती फैसला कानूनी नहीं, राजनीतिक है। खबर यह भी है कि पनामा पेपर्स के साथ ही उस हुदेबिया पेपर मिल्स केस को भी दोबारा खोला जा रहा है, जो मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। इससे शरीफ परिवार बरी हो चुका है। मगर कहते हैं कि जो जज भ्रष्टाचार के मामले को देख रहे हैं, उन्हीं के दबाव में नेशनल अकाउंटिबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) ने इस केस को दोबारा खोलने की गुजारिश सुप्रीम कोर्ट से की है। इसमें नवाज शरीफ तो फंस ही रहे हैं, उनके भाई शहबाज शरीफ भी नप जाएंगे।

मैं हुदेबिया मामले का जिक्र यहां इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि इसका असर पाकिस्तान की सियासत पर दूर तक पड़ने वाला है। दरअसल, नवाज शरीफ और शहबाज शरीफ के बीच दरार की खबरें आम हो चली हैं। अभी भले ही नवाज का सियासी करियर खत्म होता दिख रहा हो, पर उनकी राजनीति पर विराम नहीं लग रहा। उनकी पार्टी अब भी ताकतवर है, जिसका मौजूं उदाहरण तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उप-चुनाव में मिली जीत है। लेकिन उनकी यह सियासत इस बात पर निर्भर करेगी कि परिवार कितना एक रह पाता है। अभी दोनों शरीफ भाइयों में जो मतभेद दिख रहे हैं, उसकी कुछ वजहें हैं। नवाज चाहते हैं कि जो ताकतें उनके खिलाफ काम कर रही हैं, उनसे मुकाबला किया जाए, मगर शहबाज इसको लेकर उदासीन हैं। दूसरा कारण यह कि शहबाज शुरू से ही फौजी सत्ता-प्रतिष्ठानों के करीब दिखने की कोशिश करते रहे हैं और चाहते हैं कि उनके साथ रिश्ते नरम रखें जाएं, लेकिन नवाज शरीफ जम्हूरीयत का नुमाइंदा होने के नाते तमाम ताकत निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में चाहते हैं। इस लिहाज से शहबाज स्वाभाविक तौर पर फौजी प्रतिष्ठानों के लिए अधिक स्वीकार्य हैं। 

नवाज का डर यही है। उन्हें लगता है कि अगर पार्टी की बागडोर शहबाज के हाथों में आ गई, तो उनके लिए तमाम दरवाजे बंद हो जाएंगे। हालांकि एक सच यह भी है कि शहबाज लोकप्रियता के मामले में नवाज के समाने कहीं नहीं ठहरते। लाहौर उप-चुनाव में भी शहबाज कुनबे को किनारे करके नवाज ने फतह हासिल की है। जाहिर है, नवाज के साथ रहना शहबाज की मजबूरी है। मगर मुश्किल यह है कि शहबाज की महत्वाकांक्षा रह-रहकर उभरती रही है। उनके पास पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री का लंबा अनुभव है, लेकिन जब केंद्र में पीएमएल-एन सत्ता में आई, तो वह केंद्रीय मामलों में दखल देने लगे। नवाज शरीफ के अयोग्य घोषित हो जाने के बाद यह माना गया था कि शहबाज केंद्र सरकार के मुखिया बनेंगे और उनका बेटा हमजा पंजाब की गद्दी संभालेगा। मगर ऐसा नहीं हो सका। अब तो शहबाज के पार्टी अध्यक्ष बनने का मसला भी अधर में लटकता दिख रहा है, क्योंकि कुलसुम को यह पद दिए जाने की चर्चा जोरों पर है। पार्टी में एक सोच यह भी काम कर रही है कि बेटी मरियम को नवाज अपना उत्तराधिकारी बनाएंगे और केंद्र व राज्य में पुरानी व्यवस्था काम करती रहेगी, जो अभी नवाज और शहबाज के बीच है। यानी मरियम केंद्र में सक्रिय रहेंगी और हमजा पंजाब में। मगर ऐसा वाकई होगा, इस पर फिलहाल संदेह है।

इन्हीं तस्वीरों के साथ हुदेबिया मामले को देखना उचित होगा। चूंकि इसमें शहबाज पर भी तलवार लटक रही है, इसलिए अनुमान है कि फौज उनका इस्तेमाल करके नवाज को सियासत से पूरी तरह बेदखल कर सकती है। पाकिस्तान में अगले साल आम चुनाव होने वाले हैं। फौज जानती है कि अगर शरीफ घराना एक रहा, तो सत्ता में उसकी वापसी संभव है। ऐसे में, वह उसे तोड़ने का हरसंभव प्रयास कर रही है। पीएमएल-एन के बंटने पर न सिर्फ पार्टी का तंत्र तहस-नहस हो जाएगा, बल्कि उसके पक्ष में बह रही हवा का रुख भी बदलेगा। शरीफ परिवार के लिए मुश्किल यह भी है आम चुनाव से पहले भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में फैसला आना है। लिहाजा यदि नवाज शरीफ को जेल हुई, तो पार्टी तितर-बितर हो सकती है, जिसका असर चुनावी नतीजों पर होगा। 

जाहिर है, पाकिस्तान में आने वाला वक्त काफी मुश्किलों भरा है। पीएमएल-एन की हार जहां नवाज शरीफ की सियासत को पूरी तरह खत्म कर सकती है, वहीं गठबंधन या कठपुतली सरकार का बनना फौज को हुकूमत पर हावी होने का मौका देगा। इसका असर भारत-पाक संबंध पर भी पड़ेगा। यह जगजाहिर है कि पाकिस्तानी फौज की सोच भारत के खिलाफ है। ऐसे में, वहां की जम्हूरी हुकूमत भी उसी सोच के तहत काम करेगी। चिंता इसकी भी है कि ऐसी सूरत में वहां ऐसा कोई भरोसेमंद नेतृत्व नहीं होगा, जो विवादित मसलों को सुलझाने की कोशिश कर सके। वैसे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में पाकिस्तानी फौज हिन्दुस्तान के खिलाफ कोई हिमाकत शायद ही करे, पर पाकिस्तान का स्वरूप बदलना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भारत को उन्हीं हालात से टकराते रहना पड़ेगा, जो पिछले कई वर्षों से उसके सामने मौजूद हैं।
      (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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