DA Image
21 जनवरी, 2020|10:42|IST

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

राजनीति की चौसर पर मेधा

S Srinivasan Senior Tamil Journalist

सत्तरह वर्षीया अनीता की खुदकुशी ने तमिलनाडु की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। अनीता ने डॉक्टर बनने का सपना पाल रखा था, पर पिछले हफ्ते उसने अपनी जान दे दी। राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा (नीट) में अपने छात्रों के खराब प्रदर्शन के कारण पहले से ही सदमे का शिकार तमिलनाडु इस घटना के बाद से घोर निराशा में है। अब जहां केंद्र व सूबों की सरकारें सवालों के जवाब तलाश रही हैं, तो वहीं विपक्ष ने अपने तेवर काफी तीखे कर दिए हैं। डीएमके तो शिक्षा को समवर्ती सूची से निकाल फिर  से राज्य सूची में शामिल करने की वकालत भी करने लगा है। इस किशोरी की खुदकुशी ने कई ऐसे मुद्दों को जिंदा कर दिया है, जिनसे यह सूबा  पिछले कुछ वक्त से जूझ रहा है। सबसे बुनियादी मसला तो पार्टी व सरकार में नेतृत्व की कमी का है। इसके बाद कुप्रबंधन, खराब शासन के साथ-साथ आम जनता में बढ़ रही यह धारणा है कि राज्य अपनी स्वायत्तता की रक्षा करने में नाकाम रहा है। इसकी अगली कड़ी यह पीड़ा है कि सामाजिक न्याय का अग्रदूत रहा तमिलनाडु स्टेट बोर्ड परीक्षा में प्रतिभा दिखाने वाली अपनी बेटी को नहीं बचा सका, और न ही डॉक्टर बनने का उसका सपना पूरा कर सका।

नीट सीबीएसई पाठ्यक्रम पर आधारित एक प्रवेश परीक्षा है, जो राज्यों के सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का रास्ता खोलती है। इस अखिल भारतीय परीक्षा को कमोबेश सभी राज्य अपना चुके हैं और पिछले दो वर्षों से वे इसी के माध्यम से मेडिकल छात्रों को दाखिला दे रहे हैं, लेकिन तमिलनाडु में इसका काफी विरोध हो रहा है। आखिर क्यों? इस द्वंद्व को समझने के लिए इसके कारणों की पड़ताल जरूरी है। बात अनीता से ही शुरू करते हैं। वह कोई सामान्य छात्रा नहीं थी। अत्यंत गरीब पृष्ठभूमि की यह बच्ची सुदूर गांव से आती थी। पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। सब कुछ ठीक रहता, तो अनीता अपने गांव की पहली डॉक्टर होती। वह अनुसूचित जाति की जरूर थी, मगर मेडिकल में दाखिले के लिए उसे आरक्षण नहीं चाहिए था, क्योंकि वह मेधावी थी। सामान्य कोटि में ही अपना सपना पूरा करने में सक्षम थी। उसे स्टेट बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में 98 फीसदी अंक मिले थे। गणित व भौतिकी में जहां उसे शत-प्रतिशत अंक मिले थे, तो रसायनशास्त्र में उसने 199 और जीव-विज्ञान में 194 अंक हासिल किए थे। कुल 200 अंकों में 196.75 अंक हासिल करने के बाद उसे अपनी पसंद के किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल जाना चाहिए था, मगर नीट उसकी राह में बाधक बनकर आई। पिछले साल तो तमिलनाडु को इससे छूट मिल गई थी, लेकिन इस साल ‘हां-ना’ की स्थिति बने रहने के बाद आखिरकार नीट के माध्यम से दाखिले पर बात बनी। अनीता 720 अंकों की इस परीक्षा में महज 86 अंक हासिल कर सकी और न सिर्फ दाखिले की दौड़ से बाहर हो गई, बल्कि उसका दिल भी टूट गया।

सवाल यह है कि जिस लड़की ने स्टेट बोर्ड में इतना अच्छा प्रदर्शन किया हो, वह नीट में इतनी बुरी तरह फेल कैसे हो गई? इसकी कई वजहें हैं। नीट सीबीएसई पाठ्यक्रम पर आधारित है और इसमें 45 फीसदी सवाल 11वीं से और बाकी 12वीं से पूछे जाते हैं। अनीता की पढ़ाई निजी स्कूल में हुई थी, जहां 12वीं के नतीजों पर इतना जोर दिया जाता है कि 11वीं दरकिनार हो जाती है। छात्र भी 10वीं पास करने के बाद सीधे 12वीं की तैयारी में जुट जाते हैं। हालांकि पूरे भारत में 10वीं का एक-सा पाठ्यक्रम है, पर व्यवहार में सीबीएसई और राज्य स्कूलों में पठन-पाठन का तरीका अलग-अलग है। अनीता की एक सहपाठी की मानें, तो हाल-फिलहाल तक उन्हें नीट के बारे में पता ही नहीं था और उन्हें इसकी तैयारी के लिए काफी कम वक्त मिला। सच यही है कि तमिलनाडु में तमाम छात्र नीट की तैयारी इसलिए भी नहीं कर सके, क्योंकि वे इस साल भी नीट के लागू होने के प्रति आश्वस्त नहीं थे। वे मानकर चल रहे थे कि पिछले साल की तरह इस बार भी छूट मिलेगी। इस भ्रम को बनाने में नेताओं के वादों की भी बड़ी भूमिका रही और हालात बिगडे़। अनीता ने भी सर्वोच्च अदालत में नीट से छूट की अर्जी दी थी, मगर उसकी उम्मीदें टूट गईं, जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी तरह की रियायत देने से इनकार कर दिया।

अब बात दो सरकारों- केंद्र व तमिलनाडु- की, जिसने मामले को उलझा दिया। तमिलनाडु 2006 से नीट की मुखालफत करता रहा है। उसका कहना है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए तो नीट ठीक है, मगर राज्य के कॉलेजों के लिए यह उचित नहीं, क्योंकि ग्रामीण छात्रों को इसका नुकसान हो सकता है। जयललिता और करुणानिधि, दोनों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि 12वीं बोर्ड के अंक मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए काफी हैं और किसी विशेष प्रवेश परीक्षा की जरूरत नहीं है। राज्यों का विरोध देखकर ही यूपीए-2 ने अपनी चाल धीमी कर ली थी, मगर भाजपा सरकार ने एकरूपता का हवाला देकर नीट के माध्यम से ही मेडिकल कॉलेजों में दाखिले पर जोर दिया। तर्क ये दिए गए कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होगी। नीट का पक्ष लेने वालों का कहना है कि राज्य बोर्ड गुणवत्ता से समझौता कर सकता है। जवाब में विरोधी सवाल उछालते हैं कि ‘तो क्या इसके मायने यह हैं कि तमिलनाडु पिछले तमाम वर्षों से डॉक्टरों की योग्यता से समझौता करता रहा है?’ ऐसे लोग केंद्र पर अपनी सीमा पार करने और और राज्य की स्वायत्तता में दखल देने के आरोप भी लगाते हैं।

एक भ्रम इससे भी फैला। केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगस्त में कहा था कि अगर राज्य इस साल भी नीट में छूट की मांग करता है, तो केंद्र इस मामले में उसकी मदद कर सकता है। नतीजतन, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और नौकरशाह अध्यादेश लेकर दिल्ली दौड़े। दो केंद्रीय मंत्रियों की तो सहमति भी मिल गई, पर तीसरे ने आपत्ति जता दी। उधर सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि एक राज्य को छूट देना न्याय-व्यवस्था के लिहाज से उचित नहीं होगा। तमिलनाडु के लोग इसे केंद्र के विश्वासघात और  अपने अधिकारों की रक्षा में राज्य सरकार की नाकामी के तौर पर देखते हैं। केंद्र और राज्य के इस दांव-पेच में नुकसान आखिरकार छात्रों का हो रहा है। नीट तो अब शायद ही खत्म हो। लिहाजा राज्य की सियासत में पांव जमाने की महत्वाकांक्षा पालने वाली भाजपा को इस मामले में अब एक पुख्ता समाधान के साथ सामने आना चाहिए।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:Senior Tamil Journalist N Srinivasan Article in Hindustan Hindi Daily Newspaper