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ओपिनियन: डूबते पाकिस्तान का आखिरी आसरा

अपने आर्थिक संकट को लेकर पाकिस्तान एक नई मुसीबत में घिर गया है। ऐसी खबरें आने के बाद कि नवनिर्वाचित इमरान खान सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से बेल आउट पैकेज मांगने वाली है, अमेरिका ने इस पर...

ओपिनियन: डूबते पाकिस्तान का आखिरी आसरा
अशोक बेहुरिया सीनियर फेलो आईडीएसएThu, 02 Aug 2018 07:55 AM
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अपने आर्थिक संकट को लेकर पाकिस्तान एक नई मुसीबत में घिर गया है। ऐसी खबरें आने के बाद कि नवनिर्वाचित इमरान खान सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से बेल आउट पैकेज मांगने वाली है, अमेरिका ने इस पर खुलकर अपनी आपत्ति जताई है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने साफ लफ्जों में कहा है कि पाकिस्तान को इस रकम का इस्तेमाल चीन का कर्ज उतारने के लिए नहीं करने देना चाहिए। खबर है कि पाकिस्तान आईएमएफ से 12 अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज मांगने वाला है।
 

पाकिस्तान पर हद से अधिक आर्थिक बोझ है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, उसका विदेशी मुद्रा भंडार घटकर नौ अरब डॉलर पर आ गया है, जिसे दो महीने के लिए भी पर्याप्त नहीं बताया जा रहा है। पिछले एक साल में उसका आयात काफी बढ़ा है, जबकि निर्यात सिकुड़ता जा रहा है। इस वित्तीय वर्ष में उसके आयात में करीब छह अरब डॉलर की वृद्धि हुई है, जबकि निर्यात में महज दो अरब डॉलर की। उसका सार्वजनिक कर्ज भी पिछले एक साल में 12.5-13 अरब डॉलर बढ़ा है, जिसमें बाहरी कर्ज करीब आठ अरब डॉलर है। चालू खाता घाटा भी बढ़कर करीब 18 अरब डॉलर का हो गया है। 
 

अच्छी बात यह है कि वहां कृषि क्षेत्र में कुछ बेहतरी दिखी है। हमारी तरह ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसकी जीडीपी में 19-20 फीसदी की हिस्सेदारी है, जबकि इस पेशे में मुल्क का 43 फीसदी श्रम बल लगा हुआ है। टैक्स-जीडीपी अनुपात में भी सुधार दिखा है, जो 2013-14 वित्तीय वर्ष में नौ फीसदी के मुकाबले बढ़कर 11 फीसदी से पार चला गया है। लेकिन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 1.3 फीसदी घटा है। मुश्किल यह है कि इस एफडीआई का भी बड़ा हिस्सा अकेले चीन से आ रहा है। फिर रक्षा मद में खर्च लगातार बढ़ रहा है। एक उलझन पाकिस्तान की जीडीपी को लेकर भी है, जिसके बारे में तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं। आईएमएफ 3.6 फीसदी की दर से इसके बढ़ने की बात कर रहा है, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों की नजर में यह 5.4 फीसदी की दर से बढ़ रही है। 
 

साफ है, उसकी आर्थिक सेहत लगातार गंभीर बनती जा रही है। मगर क्या महज बेलआउट पैकेज पाकिस्तान को संकट से उबार सकेगा? मुश्किल इमरान खान की सियासत को ज्यादा आएगी। आईएमएफ के द्वार पर जाने का मतलब होगा, उसकी शर्तों को मानना। नतीजतन, पाकिस्तान को वह तमाम सब्सिडी कम या खत्म करनी होगी, जो अभी वह अपने अवाम को दे रहा है। बेशक यह पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है, पर पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को देखते हुए इसे अब भी बहुत ज्यादा माना जा रहा है। फिर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) यानी डूब कर्ज को देखते हुए उसे निजीकरण की राह पर तेजी से आगे बढ़ना होगा, रक्षा खर्च में कटौती करनी होगी और टैक्स-जीडीपी अनुपात सुधारने के लिए तमाम तरह के कदम उठाने होंगे।

प्रधानमंत्री बनने जा रहे इमरान खान के लिए यह सब करना आसान नहीं होगा। वह लोक-लुभावन वादों के साथ सत्ता में आए हैं। उन्होंने चुनाव प्रचार में रियायतें बढ़ाने, विकास कार्यों पर अधिक से अधिक खर्च करने, स्वास्थ्य व शिक्षा पर खास जोर देने संबंधी कई वादे पाकिस्तानी जनता से किए हैं। आईएमएफ से पैकेज लेने के लिए उन्हें अपने इन वादों से मुकरना पड़ सकता है।
 

मुमकिन है, अवाम की उम्मीदों को पूरा करने लिए नई सरकार दूसरे देशों से मदद मांगे। चीन, ब्रिटेन जैसे कई देश उसके यहां निवेश कर भी रहे हैं, जिसमें चीन से सबसे ज्यादा पैसा पाकिस्तान पहुंचता है। यह आगे भी जारी रह सकता है। मगर इसमें मुश्किल यह है कि चीन कोई खैरात नहीं देता, बल्कि ‘सॉफ्ट लोन’ देता है। यह उसका पुराना रवैया रहा है। पाकिस्तानी अर्थशास्त्री भी चिंता जताते रहे हैं कि जिस चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के तहत मुल्क में पैसा आ रहा है, उसमें से ज्यादातर कर्ज ही है।

पाकिस्तान में निवेश करने वाली चीन की कंपनियां जिस तकनीक व मशीनों का इस्तेमाल कर रही हैं, वे सभी आयात की जा रही हैं। इससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है। आशंका यह भी है कि यह गलियारा पाकिस्तान के लिए श्रीलंका की तरह का कर्ज का दुश्चक्र न बन जाए। इन्फ्रास्ट्रक्चर और विकास के नाम पर भारी-भरकम निवेश करके जिस तरह चीन ने श्रीलंका को अपने जाल में फंसा लिया है, उसी तरह पाकिस्तान भी चीन का ‘वर्चुअल कॉलोनी’ (आभासी उपनिवेश) बन जाएगा। इससे पाकिस्तान की मुश्किलें तो बढ़ेंगी ही, साथ-साथ उप-महाद्वीप की कूटनीतिक तस्वीर भी स्याह होगी।

ऐसी सूरत में, इमरान खान बतौर राजनेता नहीं, बल्कि एक खस्ताहाल मुल्क के प्रधानमंत्री के रूप में आईएमएफ के दरवाजे पर जाएंगे। अगर वह विकास का अपना एजेंडा आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें उस कटुता से ऊपर उठना होगा, जिसकी चर्चा वह चुनाव-प्रचार में करते रहे। उन्हें अमेरिका से भी हाथ मिलाना होगा और भारत से भी। अफगास्तिान-पाकिस्तान व्यापार समझौते का ही उदाहरण लें। अफगानिस्तान इसमें भारत को शामिल करने का पक्षधर रहा है। मगर फौज के दबाव में पाकिस्तानी हुक्मरान इससे कतराते रहे हैं, जबकि ऐसा करने से पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को सालाना दो अरब डॉलर का फायदा हो सकता है। इतना ही नहीं, अगर वह भारत को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (पाकिस्तान की नजर में यह ‘नॉन डिस्क्रिमिनेटरी मार्के ट एक्सेस’ है) का दर्जा देता है, तब भी उसे अगले दस वर्षों में 10 अरब डॉलर से अधिक का फायदा हो सकता है। फौज को इसके लिए दूरदर्शिता दिखानी होगी। मगर क्या वह ऐसा करेगी?


पाकिस्तान की पूंजी दूसरे देशों में काफी ज्यादा जा रही है। यह रकम अब बाहर से मुल्क में आने वाली पूंजी के बराबर हो गई है। इस ‘आउट फ्लो’ की बड़ी वजह आंतरिक अस्थिरता है। इमरान खान इन सबसे पार पाने का भरोसा चुनाव बाद के अपने पहले संबोधन में दे चुके हैं। मगर क्या वह संजीदगी से इस दिशा में आगे बढ़ेंगे? इस पर सबकी नजर बनी रहेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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