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14 अगस्त, 2020|4:10|IST

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पाकिस्तानी सियासत की नई उलझनें

Sushant Sareen Expert of Pakistan Affairs

बेनजीर भुट्टो की हत्या के दस साल पुराने मामले में फैसला ऐसे वक्त पर आया है, जब पाकिस्तान की सियासत में पहले से ही उथल-पुथल मची हुई है। भ्रष्टाचार के आरोप में नवाज शरीफ की वजीर-ए-आजम पद से विदाई का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी नीतियों से पाकिस्तान को निशाने पर ले लिया। अब खबर यह है कि भारत में उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित की एक चिट्ठी ने वहां खलबची मचा दी है। यह पत्र उन्होंने अपने देश के पूर्व विदेश सचिव व अमेरिका में पाकिस्तान के मौजूदा राजदूत एजाज अहमद चौधरी को लिखा है, जिसमें उन्हें अब तक का ‘सबसे खराब विदेश सचिव’ बताया है। 
बासित की यह चिट्ठी वहां के दो शीर्ष राजनयिकों के मनमुटाव को दुनिया के सामने बेपरदा करती है। दरअसल यह आपसी रंजिश का नतीजा है। बासित जब जर्मनी के राजदूत थे, तो उन्हें विदेश सचिव बनाने की बात चली थी। ऐन वक्त पर ऐसा नहीं हो सका और यह जिम्मेदारी एजाज अहमद चौधरी को सौंप दी गई। बासित को भारत भेज दिया गया। यह पत्र उसी का गुबार है। एक बात और। बासित पाकिस्तान के ‘डीप स्टेट’ (रियासत के भीतर की रियासत) के नुमाइंदे माने जाते हैं और उनकी छवि भी कट्टर वाली है, लिहाजा यह घटनाक्रम इस बात की भी निशानदेही करता है कि पाकिस्तान का ‘डीप स्टेट’ नवाज शरीफ की नीतियों से खफा था। हालांकि बड़े फलक पर दो अधिकारियों की यह ‘जंग’ असरहीन ही दिख रही है। 
रही बात पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति की, तो इससे निपटने के लिए वहां तीन तरह की सोच दिखती है। पहली यह कि इससे पाकिस्तान खौफजदा तो है, पर उतना ज्यादा नहीं। ऐसी सोच रखने वालों का मानना है कि अमेरिका एक हद तक ही दबाव बना सकता है। मसलन, वह आर्थिक और सैन्य इमदाद बंद कर सकता है, रक्षा उत्पादों का निर्यात रोक सकता है या फिर थोड़ा-बहुत कूटनीतिक दबाव बना सकता है। इससे पाकिस्तान प्रभावित तो होगा, पर बहुत ज्यादा नहीं। वैसे भी, 1960-70 या 80 के दशक में अमेरिका पर उसकी जो निर्भरता थी, वह अब काफी कम हो चुकी है। चीन जैसे देश उसके साथ खड़े हैं। और फिर, ऐसे हालात से पाकिस्तान पहले भी किसी-न-किसी रूप में जूझ चुका है, लिहाजा अमेरिकी दबावों का वह इस बार भी सामना कर लेगा और अंत में झुकना वाशिंगटन को ही पड़ेगा। 
इस तबके का यह भी मानना है कि अमेरिका यदि कुछ ज्यादा खफा होता है, तब वह विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिलने वाली फंडिंग पर रोक लगा सकता है। चूंकि पाकिस्तान की आर्थिक हालत खस्ता हो चली है और अगले छह-आठ महीने के बाद उसे इन वैश्विक आर्थिक संस्थाओं की पनाह में जाना पड़ सकता है, लिहाजा अमेरिका की नाराजगी उसकी मुश्किलें बढ़ा देगी, पर यदि चीन हाथ थाम ले, तो फिर उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। और तय है कि बीजिंग उसका साथ देगा ही। इन्हीं अनुमानों के बल पर पाकिस्तान हेकड़ी भी दिखा रहा है। उसका यह भी मानना है कि संभवत: यही बात उसके प्रति अमेरिकी रुख में नरमी का जरिया बनेगी।
मगर दूसरे तबके की सोच अलग है। उसका सवाल है कि अगर अमेरिका इन तमाम अनुमानों से बढ़कर कुछ कार्रवाई कर जाता है, तो फिर क्या होगा? ऐसे लोगों का मानना है कि यदि अमेरिका ने आक्रामक कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान पर आर्थिक, कारोबारी या सख्त कूटनीतिक प्रतिबंध लगा दिए और इसे ‘स्टेट, स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म’ (आतंकवाद का पोषण करने वाला मुल्क) घोषित कर दिया, तो हालात काफी संजीदा हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान न तो कुछ आयात कर सकेगा और न निर्यात। उसे कहीं से फंडिंग भी नहीं मिलेगी। बेशक चीन फिर भी पाकिस्तान का समर्थन करे, पर वह अमेरिका की नाराजगी मोल लेकर खुले तौर पर ऐसा शायद ही करे। उनका सवाल है कि तब पाकिस्तान का क्या होगा? क्या वह उस हालात को संभाल पाएगा? 
तीसरी सोच यह है कि अगर अमेरिका फौजी कार्रवाई करता है, तो इस्लामाबाद उसका किस तरह जवाब दे सकेगा? ऐसे लोगों की उलझन यह है कि क्या पाकिस्तान को जंग में उतरना चाहिए? ऐसे किसी युद्ध की स्थिति में अमेरिका पाकिस्तान को काफी नुकसान पहुंचा सकता है। वैसे भी, पाकिस्तानी फौज का इतिहास अपने अवाम पर ही ‘विजय पाने’ का रहा है। यह भी हो सकता है कि अमेरिका वैश्विक मंच पर भारत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना शुरू कर दे, जो पाकिस्तान को सामरिक तौर पर काफी नुकसान पहुंचाने वाला होगा। इन तीनों सोच का लब्बोलुआब यही है कि अमेरिकी नीति को लेकर पाकिस्तान अभी काफी उलझन में है। वह असमंजस में भी है और खौफजदा भी। वैसे एक बात तय है कि अगर अमेरिका खुद को शुरुआती स्तर के प्रतिबंधों तक ही सीमित रखता है, तो यह एक तरह से पाकिस्तान की जीत होगी। मगर यदि वह इससे आगे बढ़ा, तो फिर पाकिस्तान की शामत आनी तय है।
यही सब देखते हुए पाकिस्तान में अभी अविश्वास का माहौल बन गया है। रही-सही कसर नवाज शरीफ की सत्ता से विदाई के बाद बने हालात पूरी कर रहे हैं। सियासत में उठा-पटक के अंदेशे बढ़ चले हैं। नवाज शरीफ और शहबाज शरीफ, दोनों भाइयों के बीच मतभेद की खबरें आ रही हैं। विपक्षी पार्टियां सरकार पर दबाव बना रही हैं। चूंकि मौजूदा हुकूमत पर नवाज शरीफ का असर है, 
इसलिए वह शरीफ को कानूनी उलझनों से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है या बीच का रास्ता निकालने की जुगत। इससे अवाम में उसकी साख बिगड़ रही है। 
एक सवाल यह भी है कि हुकूमत नवाज शरीफ की कितनी मदद कर पाएगी? अगले एक-दो हफ्तों में उन पर मुकदमा दायर होने वाला है और फिर कार्रवाई शुरू हो जाएगी। इस बीच उनके भ्रष्टाचार के नए खुलासे भी हो रहे हैं। मसलन, अमेरिका में हबीब बैंक (पाकिस्तान का बहुराष्ट्रीय बैंक) पर हुई कार्रवाई से जुड़ी रिपोर्ट बताती है कि नवाज शरीफ के खाते में भी काफी पैसा मनी लॉ्ड्रिरंग के जरिये जमा हुआ है। अफवाह यह भी है कि अगले आम चुनाव के मद्देनजर फौज की शह पर पूर्व सदर आसिफ अली जरदारी सियासत में फिर सक्रिय हो रहे हैं। यानी एक अलग खिचड़ी पक रही है। लिहाजा अभी कहना मुश्किल है कि पाकिस्तान किस करवट बैठने वाला है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 
 

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  • Web Title: New conflicts of Pakistani politics