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18 सितम्बर, 2020|10:49|IST

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नवाज गए तो चलेगा फौजी एजेंडा

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‘मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया जा रहा है... भ्रष्टाचार के आरोपों में कोई दम नहीं है... फैसला अवाम की अदालत में होगा’- पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित छह सदस्यीय ज्वॉइंट इनवेस्टिगेशन टीम या जेआईटी की रिपोर्ट आने के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की यह प्रतिक्रिया बिल्कुल वैसी ही थी, जो भारत सहित दक्षिण एशिया के किसी राजनेता की हो सकती है। पाकिस्तान में आम चुनाव को अभी एक साल बाकी है और एक हालिया ओपिनियन पोल के मुताबिक लोकप्रियता के मामले में नवाज अपने प्रतिद्वंद्वियों इमरान खान और आसिफ अली जरदारी से बहुत आगे चल रहे हैं, इसलिए उनके पास जनता की अदालत में जाने से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता। पर क्या प्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट और परदे के पीछे सेना उन्हें यह मौका देने को राजी होंगे?

सारा मसला शुरू हुआ पनामा खुलासों से, जिसमें 2015 में स्वतंत्र खोजी पत्रकारों के एक संगठन ने दो लाख से अधिक आर्थिक मामलों के एक करोड़ से अधिक दस्तावेज अचानक सार्वजनिक कर दिए थे। इस खुलासे में रूस या सऊदी अरब जैसी आर्थिक महाशक्तियों के शासकों के नाम भी आए, लेकिन उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। यदि नवाज को जाना पड़ा, तो यह भी एक उदाहरण होगा, क्योंकि दक्षिण एशिया में कुछ एक अपवादों को छोड़ दें, तो भ्रष्टाचार कभी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा है। खुलासों में नवाज, उनकी बेटी और लगभग घोषित उत्तराधिकारी मरियम नवाज, बेटों हसन और हुसैन की विदेश में पंजीकृत कंपनियों की अकूत संपत्तियों का जिक्र आया और पता चला कि जब-जब शरीफ सत्ता में आए, इनमें बेतहाशा वृद्धि हुई। इन खुलासों ने नवाज के मुख्य प्रतिद्वंद्वी इमरान खान को एक नई जिंदगी दे दी। पिछले चुनाव के फौरन बाद से ही उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ धांधली का आरोप लगाते हुए जबर्दस्त आंदोलन छेड़ दिया था। एक समय तो ऐसा लगा कि इस्लामाबाद को घेरे उनके समर्थकों को कामयाबी मिल जाएगी, मगर ऐन मौके पर सेना द्वारा हाथ खींच लेने से वह असफल हो गए। निराश और हताश इमरान के लिए पनामा पेपर्स किसी संजीवनी से कम नहीं साबित हुए। इस बार न्यायपालिका के अंतर्विरोध और कश्मीर व भारत पर नवाज के रवैये से काफी हद तक असंतुष्ट फौज भी अपना किरदार अदा कर रहे हैं।

नवाज शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप कोई नए नहीं हैं। उन्हें पहली बार सेना ने स्थापित नागरिक नेतृत्व के विरुद्ध राजनीति में उतारा था। पहले वह पंजाब के वित्त मंत्री बने और बाद में सेना की मदद से प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुरसी से होते हुए प्रधानमंत्री के ओहदे तक पहुंचे। 1990 के चुनावों में जब वह एक कठमुल्ला इस्लामी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे थे, आईएसआई ने उन्हें जिताने के लिए खुलेआम पैसे खर्च किए। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, आईएसआई के अफसरों ने बाद में इसे स्वीकार भी किया, पर पाकिस्तानी परंपरा के अनुरूप किसी सैनिक अधिकारी के खिलाफ हुआ कुछ नहीं। नवाज शरीफ के राजनीतिक जीवन यात्रा का यह बड़ा रोचक पहलू है कि पूरी तरह से सेना की निर्मिति और कठमुल्लों की पहली पसंद होने के बावजूद राजनीति में प्रौढ़ होते जाने के साथ उन्होंने इन दोनों के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलकर अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाने का प्रयास किया। 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान उनकी पार्टी मुस्लिम लीग (नून) ने खुलकर भारत से संबंध सुधारने की बातें की थीं और इससे स्वाभाविक ही है कि फौज और मुल्ला, दोनों के बीच अब उन्हें पहले जैसा समर्थन हासिल नहीं है।

यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि नवाज के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी इमरान खान भी पाकिस्तानी सेना की ही निर्मिति हैं। यह एक आम जानकारी है कि रक्षा और विदेश मामलों में सेना की दखलंदाजी कम करने की कोशिश करने वाले नवाज के पर कतरने के लिए ही सेना ने इमरान को खड़ा किया था। वह तालिबान और दीगर इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों के भी लाड़ले रहे हैं। इस बार सुप्रीम कोर्ट के अंतर्विरोध भी उनके काम आ रहे हैं। कई परस्पर विरोधी निर्णयों के बाद अंत में एक मत के बहुमत से अदालत ने पनामा पेपर्स के खुलासों की जांच के लिए एक संयुक्त जांच दल यानी जेआईटी बनाने का निर्णय किया। छह सदस्यीय जेआईटी गठन के फौरन बाद से ही विवादास्पद हो गई। इसके दो सदस्य फौजी थे और उन्हें आर्थिक अपराधों की तफ्तीश का कोई अनुभव नहीं था। इन दोनों से फौजी नेतृत्व के इशारे को नजरअंदाज करने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। एक सदस्य की इमरान खान से निकटता जगजाहिर थी और एक अन्य को नवाज खानदान से पुराने हिसाब-किताब चुकाने थे। पहले दिन से ही नवाज कैंप ने इन दोनों के खिलाफ शोर मचाना शुरू कर दिया और उन्हें बदलने की मांग की, पर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ भी सुनने से इनकार कर दिया। उम्मीद के हिसाब से ही जेआईटी ने नवाज और उनके बच्चों के खिलाफ बहुत सख्त रिपोर्ट पेश की है। इसमें नवाज के खिलाफ 15 मामलों में आपराधिक तफ्तीश की सिफारिश तो की ही गई है, उनकी बेटी और उत्तराधिकारी मरियम पर एक जाली दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आरोप है और यह भविष्य में उनके राजनीति में आने के सारे रास्ते बंद कर सकता है।

नवाज शरीफ अपने जीवन के सबसे विकट संकट में फंसे हैं और इसी हफ्ते उनके भाग्य का फैसला हो जाएगा। ज्यादा आशंका उनके जाने की है। भारत के लिए यह बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। उनके जाने का मतलब फौज और जेहादियों की हैसियत में इजाफा है। अब नागरिक प्रशासन की भारत से व्यापारिक संबंध बढ़ाने और कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों पर रोक लगाने की आधी-अधूरी कोशिशें भी धरी रह जाएंगी और भारत, अफगानिस्तान और कश्मीर को लेकर फौजी एजेंडा ही पाकिस्तानी सरकार की प्राथमिकता होगा। मेरा मानना है कि दो पाकिस्तान हैं। एक, जो रावलपिंडी के सेना मुख्यालय से संचालित होता है और भारत दुश्मनी जिसकी जीवन रेखा है तथा दूसरा, इस्लामाबाद के राजनीतिक गलियारों में फलता-फूलता है। इसके साथ भारत की दोस्ती हो सकती है। यह दूसरा पाकिस्तान बीच-बीच में अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है, पर हर बार जीतता दिखता हुआ भी हार जाता है। दुर्भाग्य से लड़ाई के इस दौर में भी यही लग रहा है। हमें आने वाले दिनों मे पाकिस्तान से ज्यादा तल्ख रिश्तों की उम्मीद करनी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Nawaz Sharif Got it Army fighter agenda will run