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पहचान के उलझे सवाल और एनआरसी

अनेक विवादों और उतार-चढ़ाव के बीच असम में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन’ यानी एनआरसी की प्रक्रिया अपने आखिरी चरण में पहुंच गई है। इसी माह की 31 तारीख को इसे प्रकाशित किया जाएगा। पिछले साल 31 जुलाई को इसका अंतिम मसौदा प्रकाशित किया गया था और इस साल 31 जुलाई तक इसमें सभी तरह के सुधार कर लिए जाने थे। लेकिन एनआरसी अधिकारियों के अनुरोध पर और खास तौर से असम में बाढ़ की गंभीर स्थिति को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे एक माह और आगे बढ़ा दिया था। शीर्ष अदालत की सीधी निगरानी में यह प्रक्रिया चल रही है।

एनआरसी को लेकर तरह-तरह के नैरेटिव, दावे-प्रतिदावे किए जाते रहे हैं। पिछले वर्ष प्रकाशित एनआरसी मसौदे ने लगभग 40 लाख लोगों को जब इस सूची से बाहर रखा, तो काफी हंगामा खड़ा हुआ था, दलीलें दी गईं कि एक खास समुदाय के लोगों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया गया और इतनी बड़ी संख्या में बाहर रह गए लोगों का आखिर क्या होगा? राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेें एक वर्ग द्वारा एनआरसी के खिलाफ अभियान चलाया गया। इसकी प्रक्रिया को लेकर लगाए गए कुछ आरोप सही भी थे, तो कुछ बिल्कुल गलत या फिर वे आधे-अधूरे सच थे। दिलचस्प यह है कि असम के मूल निवासियों ने आखिर क्यों एनआरसी को अपडेट करने की मांग की और राज्य में अवैध रूप से आकर बसने वालों के इतिहास की इस पूरी बहस में चर्चा ही नहीं हुई। 

असम के मूल निवासियों के कुछ संगठन पिछले साल एनआरसी के मसौदे के प्रकाशन के बाद से यह मांग करते रहे हैं कि इसमें शामिल लोगों के नाम की फिर से तस्दीक की जाए, क्योंकि उनका आरोप है कि राज्य के कई इलाकों में इस प्रक्रिया में भारी गड़बड़ियां हुई हैं। केंद्र सरकार और असम सरकार ने अपील की थी कि बांग्लादेश की सरहद से लगे ऐसे जिलों के 20 फीसदी नामों और सैंपल सत्यापन के लिए अन्य जिलों के 10 प्रतिशत नामों के पुनर्सत्यापन की इजाजत दी जाए, मगर शीर्ष अदालत ने दोनों सरकारों और कुछ असमी संगठनों की ऐसी अपीलों को हाल ही में खारिज कर दिया। 

जिन लोगों को विदेशी (25 मार्च, 1971 के बाद असम आने वाले) घोषित किया गया है, उनके बच्चों की स्थिति को लेकर भी तरह-तरह की अटकलें लगाई जाती थीं। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 25 मार्च, 1971 के बाद और 1987 से पहले पैदा हुए ऐसे बच्चों के नाम, जिनके अभिभावकों को विदेशी घोषित किया गया है, फिलहाल एनआरसी में शामिल नहीं किया जाएगा। 1987 से 2004 के बीच पैदा हुए ऐसे बच्चों के नाम भी इसमें दर्ज नहीं किए जाएंगे, जिनके एक भी अभिभावक को विदेशी घोषित किया गया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस तरह के अनेक मामलों की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की पीठ अभी कर रही है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि 3 दिसंबर, 2014 के बाद पैदा हुए ऐसे अभिभावकों के बच्चों के नाम, जिन्हें विदेशी या डी-वोटर (संदिग्ध मतदाता) घोषित किया गया है, एनआरसी में शामिल नहीं किए जाएंगे। 

अब जब 31 अगस्त की तारीख बेहद करीब आ गई है, तो उत्पीड़न के आरोप भी लग रहे हैं, क्योंकि हजारों परिवारों को यह त्वरित सूचना दी गई है कि वे फौरन एनआरसी केंद्रों पर अपने पुनर्सत्यापन के लिए पहुंचें। इसके कारण राज्य के धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों से जुड़े अनेक संगठन विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। वैसे, सिटीजनशिप (रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजन्स ऐंड इशु ऑफ नेशनल आइडेेंटिटी काड्र्स) रूल्स 2003 के आधार पर एनआरसी अधिकारी ऐसा कर सकते हैं।

लेकिन इस पूरी कवायद से जुड़ा एक सवाल अब तक अनुत्तरित है कि आखिर जो लोग अंतिम रूप से एनआरसी से बाहर रह जाएंगे, उनके लिए सरकार की क्या योजना है? केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपने एक हालिया बयान में कहा है कि एनआरसी में नाम शामिल नहीं होने का यह अर्थ नहीं है कि कोई व्यक्ति विदेशी है। इसका फैसला सिर्फ ‘फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स’ द्वारा होगा। गृह मंत्रालय ने एनआरसी में नाम दर्ज कराने के दावेदारों को 120 दिनों के भीतर फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल्स में अपील करने का मौका दिया है। अब सबकी निगाह एनआरसी-प्रकाशन के बाद की स्थिति पर लगी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में ढाका का दौरा किया है और गृह मंत्री व असम के मुख्यमंत्री के बीच की कई बैठकों ने भी कई अटकलों को जन्म दिया है। 

कहा जा रहा है कि 20 लाख से अधिक लोग एनआरसी के बाहर रह जाएंगे। जाहिर है, असम के मूल निवासियों के संगठनों को यह कुल अवैध प्रवासियों की प्रोजेक्टेड संख्या के मुकाबले बहुत कम लगेगी, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यक संगठन उत्पीड़न व खुद को निशाना बनाए जाने की बात कहेंगे। गौर करने वाली बात यह है कि यदि विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक (कैब) संसद से पारित हो जाता है, तो गैर-मुस्लिम (मुख्यत: हिंदू) विदेशी भारतीय नागरिकता लेने के हकदार हो जाएंगे। भाजपा सरकार ने इस विधेयक के पक्ष में अपना स्पष्ट रुख दिखाया है, लेकिन असम और पूरे पूर्वोत्तर के मूल निवासियों के संगठन कैब का जोरदार विरोध कर रहे हैं, क्योंकि प्रस्तावित कानून एनआरसी की पूरी कवायद की अहमियत को कम कर देगा।

एनआरसी को अपडेट करने के कदम को असम में मूल समुदायों की जीवनरेखा के रूप में पेश किया जाता रहा है, जो राज्य में बड़े पैमाने पर होने वाले जन-सांख्यिकीय बदलाव से उनके राजनीतिक व सांस्कृतिक संरक्षण का मार्ग प्रशस्त करेगा। यहां के मूल निवासियों को यह लगता था कि अवैध प्रवासियों की आमद ने असम के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में दशकों से जो उबाल पैदा कर रखा है, वह हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो जाएगा। हालांकि ऐसे सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या अंतिम एनआरसी का प्रकाशन इससे जुड़े तमाम मुद्दों के खत्म होने की गारंटी दे पाएगा?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 23nd August