DA Image
5 जून, 2020|2:50|IST

अगली स्टोरी

संयुक्त राष्ट्र में सुधार की राजनीति

यह सितंबर का महीना है, जिसमें हर साल विश्व नेताओं की आकाशगंगा न्यूयॉर्क की धरती पर उतरती है। मौका होता है, संयुक्त राष्ट्र की सालाना महासभा का। इस साल महासभा की बैठक इसलिए भी अधिक दिलचस्प थी, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसमें पहली बार शामिल हुए थे। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि दुनिया भर के तमाम नेता ट्रंप की ‘अमेरिका फस्र्ट’ की नीति की काट ढूंढ़ने में लगे हुए हैं; साथ-साथ व्हाइट हाउस उत्तर कोरिया और ईरान के खिलाफ जंग की दुंदुभि बजाने को तैयार तो है ही, वैश्विक व्यापार व जलवायु समझौतों से बाहर निकलने की धमकी भी देता रहता है।

बहरहाल, ट्रंप प्रशासन इस साल संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर चल रहे उच्च स्तरीय प्रयासों का नेतृत्व करता हुआ दिख रहा है। ‘प्रबंधन, सुरक्षा और विकास’ पर हुई यूएन की बैठक में बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ‘हाल के वर्षों में अपनी नौकरशाही और कुप्रबंधन के कारण संयुक्त राष्ट्र वह नहीं कर सका, जो वह कर सकता था।’ हालांकि उम्मीदों के उलट ट्रंप ने यह वचन दिया कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र के ‘कार्यों में उसका सहयोगी’ बना रहेगा, ताकि यह संगठन पूरी दुनिया में और अधिक प्रभावी तरीके से शांति कायम कर सके।

ट्रंप ने महासचिव की भी सराहना की, जिन्होंने कहा है कि वह यूएन को अधिक से अधिक प्रभावी बनाने संबंधी ट्रंप के नजरिये से सहमत हैं। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर सदस्य राष्ट्रों को एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए भी कहा, और 128 से अधिक देशों ने ऐसा किया भी। साफ है, ट्रंप की बातें उम्मीद से कहीं अधिक सकारात्मक रहीं, खासतौर से इसे यदि यूएन की पूर्व में उनके द्वारा की गई आलोचना के संदर्भ में देखें। दरअसल, चुनावी अभियान के दौरान ट्रंप ने कहा था कि ‘यूएन लोकतंत्र का हिमायती नहीं है; यह स्वतंत्रता का भी पक्षधर नहीं है; यहां तक कि अमेरिका का भी हितैषी नहीं है, जहां इसका मुख्यालय है।’

संयुक्त राष्ट्र में सुधार ट्रंप प्रशासन का सबसे बड़ा एजेंडा है। यह मौटे तौर पर दो सिद्धांतों पर आधारित है- संप्रभुता और उत्तरदायित्व। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एचआर मैकमास्टर बताते हैं कि ‘बिना संप्रभुता और उत्तरदायित्व के शांति व समृद्धि संभव नहीं। य तोे इसकी बुनियाद हैं। अमेरिका दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करता है और यही वह दूसरे देशों से उम्मीद भी करता है।’ अमेरिका इसे लेकर भी उत्सुक है कि संयुक्त राष्ट्र की कार्य-प्रणाली और अधिक जवाबदेह व पारदर्शी बने। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र के बजट में आर्थिक योगदान देने वाला सबसे बड़ा देश भी है। यह यूएन के नियमित काम-काज वाले बजट में 25 फीसदी का योगदान करता है, जबकि शांति-व्यवस्था यानी पीस कीपिंग के लिए अलग से बनने वाले बजट में 28 फीसदी। अमेरिका पर यूएन की इस कदर निर्भरता के पक्ष में ट्रंप प्रशासन नहीं है और वह चाहता है कि बजट का बोझ न्यायसंगत तरीके से बंटे। इस साल यूएन ने अपने पीस कीपिंग बजट में जो 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर की कटौती की है, उसके पीछे ट्रंप प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 

जाहिर है, चुनौती कायम है कि संयुक्त राष्ट्र सुधारों को कैसे लागू किया जाए? संयुक्त राष्ट्र का ढांचा इस तरह बनाया गया है कि फैसले लेने की प्रक्रिया तमाम देशों में फैली है, जहां प्रतिस्पद्र्धात्मक और विरोधाभासी हित व विचार भी दिखते हैं। जैसे, सुधार को लेकर हुई बैठक में रूस और चीन शामिल नहीं हुए।

जहां तक भारत की बात है, तो उसने भी यह कहा है कि संयुक्त राष्ट्र का ‘व्यापक सुधार होना चाहिए, जिसमें सभी की सहभागिता सुनिश्चित हो। सचिवालय तक ही सुधार सीमित नहीं रहने चाहिए।’ संयुक्त राष्ट्र में हमारे स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने साफ कर दिया है कि यूएन में आमूल-चूल सुधार जरूरी है। इसमें उन मसलों को किनारे नहीं किया जा सकता, जो इसकी संस्थाओं के संचालन से जुड़े हैं। हालांकि भारत ने ट्रंप के प्रयासों का समर्थन किया है, पर उसका यह भी कहना है कि बदलते वक्त के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए इसमें स्थाई व अस्थाई सदस्यों के विस्तार पर गौर किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि शीत युद्ध के बाद से ही भारत संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर मुखर रहा है। हमारी कोशिश यह है कि यूएन बदलती वैश्विक तस्वीर में अधिक प्रभावी बन सके। असल में, शांति व अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां अब अधिक जटिल बन गई हैं। 21वीं सदी में वैश्विक सुरक्षा से जुड़े तमाम तरह के खतरे सामने आए हैं, जिसके कारण ‘अनिश्चितता’ का एक भाव पैदा हो गया है। संयुक्त राष्ट्र इन मसलों से निपटने में मुश्किलों में घिरती रही है और नई दिल्ली विदेश नीति के मोर्चे पर अपनी बदलती प्राथमिकताओं के आधार पर इसके साथ काम करती रही है। भारत यूएन की पीस कीपिंग मुहिम के मददगार देशों में सबसे आगे है। पिछले छह दशकों में इसके ऐसे 71 अभियानों में से करीब 50 में हमने अपने लगभग दो लाख फौजी भेजे हैं। इसीलिए, यह कोई आश्चर्य नहीं कि संयुक्त राष्ट्र के संदिग्ध ‘हस्तक्षेप करने के अधिकार’ को मिलती वैश्विक सहमति को लेकर भारत चिंतित रहा है। इतना ही नहीं, भारत उन तमाम अभियानों के खतरे की ओर भी ध्यान दिलाता रहा है, जहां यूएन के झंडे के नीचे शांति सैनिकों की सुरक्षा को गंभीर खतरा था। 

यह सही है कि शीत युद्ध के बाद से अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए गए हैं, मगर भारत और कुछ अन्य बड़े गैर-पश्चिमी मुल्क ऐसी कोशिशों को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना रहा है कि इस तरह के सुधारों से कुछ खास देशों को दखल का विशेषाधिकार मिल जाएगा, जो नैतिक रूप से सही नहीं होगा। इसीलिए माना यही जा रहा है कि ट्रंप सरकार ने जिस ‘संप्रभुता’ की बात कही है, उसका नई दिल्ली भी स्वागत करेगी। हालांकि सुरक्षा परिषद में जगह पाने के लिए भारत की कोशिश जारी है, इसलिए अच्छा यही होगा कि संयुक्त राष्ट्र को अधिक से अधिक प्रभावी बनाने के लिए वह नए रास्ते गढ़े। फिलहाल भारत को जरूरत अपने संकीर्ण राष्ट्रीय  हितों और अपनी जिम्मेदारी (वैश्विक शांति व स्थिरता को बनाए रखने में मददगार एक उभरती ताकत) के बीच संतुलन साधने की है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:harsh v pant article: Politics of reform in the United Nations