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20 नवंबर, 2020|8:13|IST

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डोका ला विवाद के आगे की राह

Former Foreign Secretary Sasank

सोमवार को जब हमारे विदेश मंत्रालय की तरफ से यह बयान आया कि डोका ला से भारत व चीन, दोनों देशों की सेनाएं लौट रही हैं, तो उसके चंद घंटों पहले ही यह खबर भी आई थी कि गुरमीत राम रहीम के बहाने डोका ला विवाद को लेकर चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स  ने भारत पर तंज कसा है। ग्लोबल टाइम्स  का रुख यही बता रहा था कि चीन अंत-अंत तक भारत पर अपनी सेना वापस लौटाने का दबाव बनाता रहा, मगर भारत ने भी अपनी स्थिति साफ कर दी थी कि लौटेंगी, तो दोनों देशों की सेनाएं साथ लौटेंगी। इस लिहाज से देखें, तो डोका ला विवाद का कूटनीतिक समाधान निकलना एक उल्लेखनीय घटना है। फिलहाल इसके तमाम तरह के गुणा-भाग किए जाएंगे, मगर इतना साफ है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना किसी विवाद के चीन की अपनी आगामी यात्रा कर सकेंगे, जो ब्रिक्स सम्मेलन को लेकर होने जा रही है।

इस समाधान का दूसरा पहलू हमारे लॉन्ग टर्म, मिडिल टर्म और शार्ट टर्म यानी लंबी अवधि के हितों पर, मध्यम अवधि के और तात्कालिक हितों पर पड़ने वाला असर है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह का कूटनीतिक समाधान डोका ला का निकाला गया है? हालांकि मेरा मानना है कि फिलहाल बातचीत तात्कालिक नजरिये से ही हुई होगी, पर इसे हमें दीर्घावधि की ओर ले जाने का प्रयास करना होगा। मौजूदा परिस्थिति में उपयुक्त नजरिया यही होना चाहिए कि प्रधानमंत्री की चीन की आगामी यात्रा में उन तमाम मसलों पर भी द्विपक्षीय बातचीत हो, जिन पर पिछले दो-तीन महीनों में डोका ला विवाद के कारण चर्चा नहीं हो पाई। मसलन, उत्तर कोरिया का अपने मिसाइल विकास कार्यक्रमों को गति देना, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में घोषित अपनी अफगान व एशिया नीति, पाकिस्तान का रवैया आदि। अभी पाकिस्तान भारत को तो आंखें दिखा ही रहा है, अमेरिका को भी घुड़की दे रहा है कि चीन व रूस उसके साथ हैं और इस्लामिक मुल्कों में भी उसका खासा प्रभाव बढ़ा है। इस बदलती परिस्थिति पर हमें गौर करना चाहिए।

एक बात और समझने की है। चीन और भारत, दोनों देश खासतौर से एशिया व अफ्रीका में अपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी बढ़ाने में जुटे हैं। सवाल यह है कि ऐसे कदमों को क्या हम हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ ही देखेंगे? मेरा मानना है कि डोका ला विवाद सुलझाने में चीन ने जैसा रवैया दिखाया है और पड़ोसी देशों से जुड़े हमारे संबंध व हितों को लेकर अपनी थोड़ी परिपक्वता का परिचय दिया है, उससे भरोसा जगता है कि भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय वार्ता आगे बढ़ सकती है। हालांकि इस तथ्य से भी इनकार नहीं कि संभव है, चीन का यह रवैया ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता तक ही सीमित हो। उसकी मंशा यह हो कि येन-केन-प्रकारेण ब्रिक्स सम्मेलन को सफल बनाया जाए। उसे यह डर सता रहा हो कि जिस तरह ‘वन बेल्ट वन रोड’ बैठक से भारत ने खुद को किनारे कर लिया था, कहीं वह कहानी फिर से ब्रिक्स में न दोहराई जाए। 
ऐसे में, हमें जल्दी ही डोका ला पर एक दीर्घावधि नीति की ओर बढ़ना चाहिए।

सवाल यह भी है कि अगर चीन फिर से डोका ला विवाद खड़ा करता है, तो हम उससे किस तरह निपटेंगे? ऐसे में, जरूरत सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने की है। हालांकि यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था, मगर अब भी बहुत देर नहीं हुई है। अपनी सीमा पर विकास-कार्यों को लेकर अब भी अगर हम सक्रिय होते हैं, तो बात बन सकती है। इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि जिस तरह पाकिस्तान ने हमारे खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देकर हमारे लोकतंत्र को थोड़ा आक्रामक बना दिया है, उसी तरह डोका ला विवाद से सबक लेकर हम सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने की ओर तेजी से आगे बढ़ें और अपने तमाम पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों में गरमाहट लाएं।

कुछ बयानवीर इस विवाद के सुलझने से इतने उत्साहित हो गए हैं कि वे इतिहास का हवाला देकर इसे एक बड़ी जीत बता रहे हैं। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि विगत घटनाओं का चरित्र अलग था और इस विवाद का अलग। पहले भी भारत और चीन में गतिरोध हुए हैं और वे लंबे भी चले हैं। मगर उन मामलों का भी समाधान निकला है और इसका भी निकल आया है। अलबत्ता हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिए कि ऐसे गतिरोध भविष्य में पैदा न हों। कहा यह भी जाता रहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा परिभाषित न होने की वजह से यदा-कदा हालात बिगड़ते रहते हैं, इसीलिए कोशिश सीमा संबंधी विवाद को सुलझाने की भी होनी चाहिए। हम भले ही अपना राग अलापते रहें, मगर हकीकत यही है कि चीन के साथ वक्त-बेवक्त तनाव होता ही रहा है।

कुछ अन्य चूक भी हमारे नीति-नियंताओं की तरफ से होती रही है। हम आंतरिक मसलों में इस कदर उलझ जाते हैं कि अपने पड़ोसियों के हितों की कम ही सोच पाते हैं। जैसे, विनाशकारी भूकंप के बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास को लेकर नेपाल से हमने कुछ वादे किए थे, मगर उसे लेकर एक समझौता अभी पिछले दिनों ही हो सका। इसी तरह, म्यांमार का कहना है कि चूंकि भारत उसका हाथ अब उतनी गर्मजोशी से नहीं थाम रहा, इसलिए वह चीन के साथ आगे बढ़ना चाहता है। यही बात चाबहार बंदरगाह पर हो रहे विकास-कार्यों को लेकर भी कही जा रही है। आखिर ऐसी चूक क्यों हो रही है? हमारे लिए हकीकत से मुंह मोड़ना घातक हो सकता है। अब जबकि डोका ला विवाद सुलझ चुका है, हम पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्ते को बेहतर बनाने को लेकर गंभीरता से सोचें। यही वक्त का तकाजा है। इसमें किसी भी तरह की आक्रामक बयानबाजी हमें नुकसान पहुंचा सकती है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Former Foreign Secretary of India Sasank Article on Doka La Standoff in Hindustan Hindi Newspaper 29th of August