Editorial Opinion of Hindustan Hindi Daily Newspaper 21st of 2019 Edition - विपक्षी धारा का आधारहीन हो जाना DA Image
12 नबम्बर, 2019|11:39|IST

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विपक्षी धारा का आधारहीन हो जाना

भारतीय राजनीति में विपक्ष लगातार कमजोर होता जा रहा है। इसे हमें राजनीतिक दलों और उनके नेतृत्व के हिसाब से ही नहीं, इन दलों के सामाजिक आधार के हिसाब से भी देखना होगा। विपक्ष में रहने की आदत और चाहत समाज के आगे बढ़े हुए तबकों में तो कमजोर हुई ही है, गरीबों और पिछड़ों आदि को भी लगातार विपक्ष में बने रहना उनके अस्तित्व के लिए मुश्किल लगता है। हम चाहें, तो इसके लिए बाजार और सुविधाभोगी संस्कृति के विस्तार को दोष दे सकते हैं, लेकिन सच यही है कि समाज के विभिन्न वर्ग और उनका नेतृत्व अब किसी भी तरह से सत्ता प्राप्ति और अपने लिए उसके उपयोग में ही भविष्य देखता है। यह सत्ता के आकांक्षी मन का विस्तार ही है, जिसने देश भर में विपक्ष को तो कमजोर किया ही है, साथ ही राजनीति के सामाजिक आधार में भी काफी उलट-पलट कर दी है। यह प्रक्रिया 90 के दशक में शुरू हुए उदारवाद के साथ ही चल निकली थी। अगर गौर से देखा जाए, तो इस दौर के बाद देश में तरह-तरह के सामाजिक आंदोलन विकसित होते हुए तो दिखाई देते हैं, लेकिन विपक्ष के  आंदोलन लगातार कमजोर हुए हैं। श्रमिकों का आंदोलन, टे्रड यूनियन आंदोलन, किसानों के आंदोलन लगातार कमजोर होते गए हैं।

श्रमिकों के बीच, कर्मचारियों के बीच से जो आंदोलन अब सामने आते हैं, वे घनघोर अर्थवाद के शिकार हैं। इसने अपने भीतर की उस आंदोलनकारी चेतना को खो दिया है, जो विपक्ष को खड़ा करती और मजबूत बनाती थी। 90 के दशक के बाद देश में टे्रड यूनियन आंदोलन कमजोर होते गए। यह ठीक है कि समय-समय पर किसानों, श्रमिकों का दिल्ली मार्च, राजधानी चलो, चक्का जाम वगैरह देखने-सुनने को मिल जाते हैं। पर ऐसे मार्च अक्सर किसी विपक्षी आंदोलन का हिस्सा नहीं होते, या कोई नई राजनीतिक धारा गढ़ने की कोशिश करते नहीं दिखते, वे कुछ मांगों को लेकर आयोजित इवेंट में तब्दील होकर रह जाते हैं। पहले देश में बहुत बड़ी रेल हड़तालें होती थीं। उनकी तो संभावना भी पूरी तरह गायब हो गई है। किसानों के आंदोलन भी आज के संदर्भ में लगभग निष्प्रभावी हैं। इन आंदोलनों का कुछ मांग विशेष तक सीमित रह जाना और विरोध की किसी व्यापक चेतना से न जुड़ पाना, विपक्ष के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण है। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि विरोध की व्यापक चेतना अब सभी के भीतर मर गई है। वह अब भी जनता के बीच मौजूद है। लेकिन वह एक संगठित धारा के रूप में एकत्र होने की शक्ति खोती जा रही है।

माना यह जाता है कि राज्य-सत्ता के प्रति असंतोष का भाव ही आखिर में विपक्ष का निर्माण करता है। यह असंतोष राज्य-सत्ता से अधिक से अधिक साधन और सुविधाएं प्राप्त कर लेने की चाहत के पूरा न होने से भी पैदा होता है। वहीं लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था हमारे भीतर राज्य-सत्ता पर निर्भरता बढ़ाती जाती है। हमारी चाहत होती है कि राज्य व्यवस्था हमारे लिए सब कुछ करे, हमारी हर समस्या का समाधान करे। जो समस्याएं हम स्वयं और सामुदायिक रूप से हल कर सकते हैं, उनके लिए भी हम राज्य की ओर देखते हैं। इस प्रकार, धीरे-धीरे हम आत्मनिर्भर से राज्य निर्भर समुदाय में तब्दील होते जा रहे हैं। लगातार बढ़ती जा रही यही राज्य निर्भरता हमारे भीतर के प्रतिपक्ष के भाव का शमन करती है। देश में जिस तरह की दलगत राजनीति चल रही है, वह भी इसकी भूमिका तैयार करती है। चुनाव में हारते ही बहुत से नेता पाला बदलकर सत्ता पक्ष से जुड़ जाते हैं। तकरीबन सभी राजनीतिक दलों के बहुत सारे नेताओं में ऐसी प्रवृत्ति कहीं भी और कभी भी देखी जा सकती है। 1990 के बाद के दशक राजनीतिक दलों में ही नहीं, उनके सामाजिक आधारों में भी सत्ता निर्भरता लगातार बढ़ी है। इसने समाज की उम्मीदों को भी कई तरह से बदला है। राजनीतिक दलों और नेताओं की राजनीति ने व उनके सामाजिक आधार की राज्य व्यवस्था पर निर्भरता ने विपक्ष का भाव कमजोर कर दिया है। इस परिदृश्य में अगर हम थोड़ा पीछे जाएं, तो राम मनोहर लोहिया याद आते हैं। वह आजादी के बाद नेहरू युग के आभामंडल, नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व को लगातार अपने भाषणों, विचारों और राजनीतिक कार्यों से खंडित करते नजर आते थे। नेहरू कालीन कांग्रेस के शासन के दौर में उन्होंने अपनी समाजवादी राजनीति से विपक्ष का सामाजिक भाव सृजित किया।

उन्होंने विपक्ष की एक ऐसी राजनीति विकसित की, जिसमें से अनेक विपक्षी नेता जैसे मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीस, राज नारायण, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता विकसित हुए। 70 के दशक में उभरे जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने विपक्ष के राजनीतिक भाव और उसकी शक्ति का प्रबल एहसास देश और उस दौर की शासन-व्यवस्था को कराया, जो बाद में आपातकाल के खिलाफ सशक्त विपक्ष में बदल गया। इस आंदोलन से लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव जैसे नेता निकले। वामपंथी राजनीति ने भी देश में विपक्ष का भाव पैदा करने की राजनीति की। वामपंथी राजनीति ने उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और केरल में सत्ता विरोधी जनतांत्रिक राजनीति की अगुवाई लंबे समय तक की। आज ये सारी राजनीतिक धाराएं कमजोर होती जा रही हैं। इसी के साथ राजनीतिक दलों के सामाजिक आधार में भी विपक्ष का भाव कमजोर होता गया है। इन सामाजिक समुदायों के एक भाग में सत्ता और सत्तावानों से जुड़ने की चाह इधर बढ़ी है। बेशक इन वर्गों में सत्ता से मनमाफिक न मिलने के असंतोष भी समय-समय पर सामने आते हैं। पर ऐसे असंतोष अनेक बार मतदान के वक्त दिखते भी नहीं और कई बार तो गुपचुप सरकार के परिवर्तन के कारण बनते हैं। ऐसे असंतोष किसी बड़े सियासी बदलाव के कारण बन सकें, ऐसा कम होता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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