Editorial of Hindustan Hindi Newspaper 7th of November 2019 Edition by Sushant Sareen - पहले राउंड में पिछड़े इमरान DA Image
23 नवंबर, 2019|1:31|IST

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पहले राउंड में पिछड़े इमरान

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पाकिस्तान की राजनीति या उसकी जम्हूरियत की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि वहां खेल के नियम-कायदे आज भी तय नहीं हैं। हमारे देश में एक चुनाव होता है, तो वह सभी के लिए स्वीकार्य होता है। नेता एक-दूसरे का विरोध करते हैं, तीखी से तीखी आलोचनाएं करते हैं, मगर वे तंत्र को गिराने का काम कभी नहीं करते। चुनावों के हिसाब से सरकारें बनती हैं और वे अपना कार्यकाल पूरा करके चली जाती हैं। सत्ता का हस्तांतरण सुचारु रूप से होता है और सियासत के बाहर की कोई ताकत उसमें दखल नहीं देती। पाकिस्तान में ये नियम तय नहीं हैं, इसलिए वहां सरकार गठन के चंद महीने बाद ही बड़े-बड़े धरने-प्रदर्शनों से दबाव बनाने और उस दबाव के जरिए सरकार को अस्थिर करने या उसे गिराने की प्रथा-सी बन गई है। 

नब्बे के दशक में हमने देखा था कि नवाज शरीफ की सरकार को गिराने के लिए बेनजीर भुट्टो ने ‘लॉन्ग मार्च’ किया था और जब वह हुकूमत में आईं, जो नवाज शरीफ ने भी यही किया। दोनों बार सरकार गिरी। पांच साल पहले, अगस्त 2014 में नवाज शरीफ की सरकार को अपदस्थ करने के लिए इमरान खान ने भी एक विशाल मार्च निकाला था। उसी सिलसिले को जारी रखते हुए अब एक अहम विरोधी पार्टी और मजहबी संगठन जमीयत-उल-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ‘आजादी मार्च’ के जरिए अपने लाखों मुरीदों व समर्थकों के साथ इस्लामाबाद में डेरा डाले बैठे हैं। उनकी मांग है कि इमरान खान वजीर-ए-आजम का ओहदा छोडें़ और मुल्क में नए सिरे से चुनाव कराए जाएं। जाहिर है, मौलाना के धरने ने पाकिस्तानी सियासत की बुनियादी ढांचागत समस्या को फिर से उजागर किया हैै।

फजलुर रहमान एक बहुत जहीन सियासतदान हैं। वैसे तो वह एक मौलवी हैं, मगर काफी व्यावहारिक और समझदार शख्स भी हैं। वह मजहबी राजनीति का प्रतिनिधित्व तो करते हैं, मगर उन्हें आप कट्टरपंथी नहीं ठहरा सकते। पिछले करीब 20 वर्षों से वह लगभग हरेक हुकूमत का किसी न किसी रूप में हिस्सा रहे हैं। वह बेनजीर भुट्टो के साथ थे, नवाज शरीफ के साथ थे, जनरल मुशर्रफ की जब सरकार थी, उसमें भी थे, और फिर आसिफ अली जरदारी की सरकार बनी, तो उसमें भी उनकी हिस्सेदारी थी। यह पहली बार है, जब वह हुकूमत से बिल्कुल बाहर हो गए हैं।

इमरान खान और फजलुर रहमान के दरम्यान सियासी और निजी, दोनों तरह की अदावतें हैं। इमरान ने मौलाना के सियासी किलों में सेंध लगाई है। खासकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में मौलाना का राजनीतिक दबदबा रहा है, वहां पर इमरान की पार्टी पीटीआई ने उन्हें जबर्दस्त झटका दिया है, यहां तक कि मौलाना पहली बार खुद अपनी सीट भी बचा नहीं सके। इमरान किसी सूरत मौलाना को बर्दाश्त करने को राजी नहीं हैं। मौलाना की राजनीति की खूबी यह है कि उनके पास बहुत बड़ा वोटबैंक भले न हो, मगर ‘स्ट्रीट पावर’ है। हालांकि यह खूबी पाकिस्तान की तमाम मजहबी जमातों में है। पाकिस्तान की दोनों मुख्य विरोधी पार्टियां, यानी ‘पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज)’ और ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ वोट तो काफी हासिल कर लेती हैं, मगर वे अपने समर्थकों को सड़क पर उतारने में कामयाब नहीं हो पातीं।

साल 2018 के आम चुनाव को मौलाना पहले दिन से ही खारिज करते आए हैं। वह फौज पर तंज कसते रहे हैं कि इमरान खान हम पर थोपे गए वजीर-ए-आजम हैं। तभी से वह पूरे पाकिस्तान में जगह-जगह मौजूदा हुकूमत के खिलाफ जलसे करते रहे हैं। मीडिया ने उन जलसे-जुलूसों को बहुत महत्व नहीं दिया, मगर बड़ी तादाद में लोग उन मार्चों में निकलकर आए थे। मौलाना की तैयारियां उसी समय से शुरू हो गई थीं। उन्होंने आजादी मार्च के लिए अभी का वक्त इसलिए चुना कि पाकिस्तान के लोग त्रस्त हैं। मुल्क की माली हालत बेहद खराब है, नौकरियां नहीं हैं, महंगाई काफी तेजी से बढ़ी है, लोगों के बिजली, पेट्रोल-डीजल के खर्चे काफी बढ़ गए हैं। कुल मिलाकर, आम पाकिस्तानी इस वक्त कई सारी दुश्वारियों से जूझ रहा है। अवाम के इसी रोष को मौलाना अपने पक्ष में भुना रहे हैं।

दूसरी तरफ, मुल्क की दोनों मुख्य विपक्षी पार्टियां- पीएमएल(एन) और पीपीपी एक तरह से सरकार के शिकंजे में फंसी हैं। दोनों के शीर्ष नेतृत्व इन दिनों सलाखों के पीछे हैं या फिर जमानत के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। कुछ को तो अभी-अभी जमानत मिली है। इमरान सरकार ने पीएमएल(एन) के एक दर्जन बड़े नेताओं को फर्जी मामलों में अंदर कर रखा है, तो पीपीपी सिंध सूबे में अपनी सरकार गंवा देने के खौफ से इमरान के विरोध की महज रस्म अदायगी करती रही है। ऐसे में, मौलाना फजलुर रहमान ने इस मार्च के जरिए विपक्ष की खाली जगह पर कब्जा कर लिया है। यह ठीक है कि पीएमएल(एन) और पीपीपी के बहुत लोग उनके साथ नहीं जुड़े हैं, मगर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के काफी सारे छोटे-छोटे दल उनके पीछे आ गए हैं।

मौलाना ने एक जोखिम भरी चाल फौज और इमरान खान के बीच दरार पैदा करने की भी चली है। नतीजतन, फौज को बाकायदा कहना पड़ा है कि वह मुल्क के कानून के साथ है, किसी के हक में या खिलाफ नहीं। इमरान खान दरअसल सोचते हैं कि फौज उन्हें लेकर आई है, तो वह उन्हें बचाती भी रहेगी। फौज इमरान के नौसिखियापने से चिंतित है। एक तरफ, तो वह हालात संभाल नहीं पा रहे, ऊपर से अपने बचकाने बयानों और बदले की कार्रवाइयों से उन्होंने सभी विरोधी जमातों को दुश्मन बना लिया है।इसमें कोई दोराय नहीं कि मौलाना को इस बडे़ मार्च के लिए कहीं न कहीं से इशारा हुआ है। वह इशारा फौज के भीतर के ही किसी ऊंचे गुट का हो सकता है। लेकिन पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक-सुरक्षा हालात को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि इमरान खान इस्तीफा देंगे या निकट भविष्य में वहां मध्यावधि चुनाव होगा। फिलहाल वहां असमंजस की स्थिति है। मौलाना के इस धरने के अंजाम पर सबकी निगाह टिकी है। पर इतना तो तय है कि उन्होंने अपनी रैली के जरिए इमरान हुकूमत को कमजोर जरूर कर दिया है। सरकार न सिर्फ बचाव की मुद्रा अख्तियार करने को विवश है, बल्कि फौज और इमरान के बीच जो एक मजबूत बॉन्डिंग दिख रही थी, उसमें भी दरार चौड़ी हुई है। फजलुर रहमान इस राउंड में आगे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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