Editorial of Hindustan Hindi Newspaper 15th of November 2019 Edition by Anjali Bhardwaj Senior Member NCPRI - शीर्ष अदालत में सूचना का अधिकार DA Image
15 दिसंबर, 2019|4:57|IST

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शीर्ष अदालत में सूचना का अधिकार

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करीब दस साल से यह सवाल मंडरा रहा था कि क्या प्रधान न्यायाधीश के दफ्तर को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट की सांविधानिक पीठ ने अंतत: इस पर फैसला कर लिया। 13 नवंबर को हुए फैसले में कोर्ट ने कहा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में, जो एक सार्वजनिक प्राधिकरण है, आवश्यक रूप से भारत के प्रधान न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों का कार्यालय भी शामिल है। भारत में सूचना के अधिकार की पहचान करने और उसे लोगों तक पहुंचाने में न्यायपालिका की अहम भूमिका रही है। अनेक न्यायिक फैसलों में विभिन्न अदालतों ने सूचना के अधिकार को मौलिक सांविधानिक अधिकार करार दिया है। आरटीआई अधिनियम के लिए अंतिम सहायक प्राधिकारी होने के अलावा, सुप्रीम कोर्ट स्वयं आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण है। यह कोई छिपी बात नहीं है कि पिछले चौदह वर्षों में बड़ी संख्या में नागरिकों द्वारा अदालतों से जानकारी मांगने के लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दायर किए गए हैं। कई लोगों को स्वयं न्यायिक सहयोग की जरूरत होती है, इसलिए वे अदालतों से सूचना मांगने की कोशिश करते हैं। 

तीन मामले अगस्त 2016 में एक संविधान पीठ के पास भेजे गए थे। एक मामले में न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में पूछा गया था। कुछ वरिष्ठ जजों को दरकिनार कर कुछ जजों को नियुक्ति दी गई थी। इन नियुक्तियों से संबंधित पत्राचार की प्रति मांगने के लिए वर्ष 2009 में ही आवेदन दिया गया था। दूसरे मामले में, एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से आरटीआई द्वारा एक आवेदन दाखिल किया गया था, जिसमें तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश और मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बीच हुए पत्राचार की प्रतियां मांगी गई थीं। यह शिकायत थी कि एक केंद्रीय मंत्री ने कोर्ट के फैसले को प्रभावित करने की कोशिश की है। तीसरा मामला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों द्वारा दी गई अपनी संपत्ति की सूचना से संबंधित है। इन तीनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के लोक सूचना अधिकारी ने मांगी गई सूचना देने से इनकार कर दिया था, लेकिन केंद्रीय सूचना आयोग ने सूचना देने का आदेश दिया। पहले दो मामलों में सुप्रीम कोर्ट के सूचना अधिकारी ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जबकि न्यायाधीशों की संपत्ति के मामले में सूचना अधिकारी ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने सूचना अधिकारी को निर्देश दिया कि वह प्रधान न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा दी गई संपत्ति की किसी भी सूचना को मांगे जाने पर जारी करे। सूचना अधिकारी ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। और ऐसे, ये तीनों मामले शीर्ष अदालत की संविधान पीठ के पास पहुंच गए। 

पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इन तीन मामलों पर विचार किया। इनसे जुड़े कई सवाल थे, जिनकी सांविधानिक व्याख्या सुप्रीम कोर्ट को करनी थी। क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह जरूरी है कि लोगों को सूचना देने पर रोक लगाई जाए? क्या सूचनाएं जाहिर करने से सांविधानिक इकाइयों की ईमानदार राय और स्पष्ट अभिव्यक्ति से खिलवाड़ होगा? क्या आरटीआई अधिनियम के अनुच्छेद 8(1)(जे) अर्थात गोपनीयता कायम रखने के लिए सूचना देने से छूट लेना सही रहेगा? संविधान पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। शायद फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जजों ने न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही को समानांतर माना है, और न्यायिक स्वतंत्रता कायम रखने के लिए इन्हें सुनिश्चित करने की बात कही। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता खुलेपन और पारदर्शिता की मांग कर सकती है। वैसे न्यायिक पारदर्शिता के मामले को कोर्ट और आगे ले जा सकती थी। लेकिन अदालत ने मामलों को फिर सुप्रीम कोर्ट के सूचना अधिकारी के पास भेज दिया, ताकि वह सूचना देने पर आपत्ति करने वाले तीसरे पक्ष की बात सुनकर सूचना देने या न देने का फैसला ले सके। जाहिर है, अदालत ने सार्वजनिक सच्चाई और जवाबदेही के लिए खुद को खोलने का एक अवसर गंवा दिया। 

यह विशेष रूप से सोच का विषय है, क्योंकि अनेक मामलों में सुप्रीम कोर्ट लोक सेवकों की नियुक्तियों को पारदर्शी बनाने और संपत्ति सार्वजनिक करने के संबंध में फैसले सुना चुका है। सर्वोच्च न्यायालय अपने आदेशों में पहले कह चुका है कि चुनाव के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति और देनदारियों की घोषणा करनी चाहिए। ये सूचनाएं वर्ष 2004 के बाद से वेबसाइट पर उपलब्ध हैं और सूचना के अधिकार के तहत ये सूचनाएं दी जा सकती हैं। इसे मतदाताओं और नागरिकों के मौलिक अधिकार की तरह प्रचारित किया जाता है। उम्मीदवारों को अपने जीवनसाथी की संपत्ति और देनदारियों का भी खुलासा करना पड़ता है। इसने आगे यह भी फैसला सुनाया है कि जब किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार और नागरिकों को सूचना देने के अधिकार के बीच ठन जाए, तो सूचना के अधिकार को ही तरजीह दी जाए, क्योंकि इससे एक बड़ा सार्वजनिक हित सधता है। 

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता बहाल करने के निर्देश देने में सुप्रीम कोर्ट की अनिच्छा इस बात के विपरीत है कि वह सूचना आयुक्त और केंद्रीय सतर्कता आयोग की नियुक्तियों के मामले में बहुत प्रगतिशील रुख रखता है। इसके अलावा आरटीआई अधिनियम के कुछ खंडों, विशेष रूप से अनुच्छेद 8(2), की संविधान पीठ द्वारा व्याख्या, सूचना देने में जो रियायतें दी गई हैं, वे सार्वजनिक हित से भी ऊपर हो सकती हैं। यह विशेष है, क्योंकि यह सूचनाओं तक लोगों की पहुंच को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करेगा। इन कमियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया हालिया फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसे समय में आया है, जब न्यायिक जवाबदेही और स्वतंत्रता के बारे में गंभीर सवाल न्यायपालिका को सता रहे हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति, उनके पास मौजूद संपत्ति और फैसलों में राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चा होती रहती है। वाकई न्यायिक संस्थाओं को सार्वजनिक जांच और पारदर्शिता की दिशा में जनता का भरोसा सुनिश्चित करने के लिए बहुत लंबा रास्ता तय करना है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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