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जलवायु परिवर्तन और राष्ट्रीय सुरक्षा

ब्रिकम सिंह

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल यानी आईपीसीसी ने पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें कहा गया है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दूरगामी प्रभाव से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आपात स्तर पर तत्काल प्रयास करना चाहिए। पैनल का मानना है कि अगर मौजूदा दर से ग्लोबल वार्मिंग यानी वैश्विक तापमान बढ़ता रहा, तो साल 2030 से 2052 के बीच तापमान-वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस हो सकती है। औद्योगिक क्रांति से पहले के समय से यदि तुलना करें, तो हमारी धरती अब तक एक डिग्री सेल्सियस गरम हो चुकी है और तापमान में अब हर 0.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि मानव जाति के लिए किसी गंभीर नतीजे की आहट होगी। रिपोर्ट में भारत की खस्ता हालत पर भी रोशनी डाली गई है।

अनुमान जताया गया है कि पृथ्वी के कुछ हिस्से इतने गरम हो जाएंगे कि वहां मानव जीवन मुश्किल हो जाएगा और समुद्र का बढ़ता जल-स्तर द्वीपों व कई देशों के निचले तटीय इलाकों को निगल लेगा। समुद्री जल के इस तरह बढ़ने, सूखा पड़ने और खाने-पीने की किल्लतों के कारण लोग देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार, दोनों तरह से विस्थापित होंगे। यह दर-बदर किसी भी राष्ट्र और उसके आसपास के देशों में अस्थिरता पैदा करेगा और भविष्य के कई संघर्षों को जन्म देगा।

हालांकि व्यापक रणनीतियों के सहारे इस आसन्न मुश्किल का सामना उन तमाम देशों द्वारा किया जा रहा है, जिन्होंने पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, मगर दुनिया भर की सेनाओं को भी अपनी-अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में जलवायु परिवर्तन के खतरे के खिलाफ खुद को बदलना होगा और नई राह तलाशनी होगी। भारत के लिहाज से देखें, तो ग्लेशियरों का पिघलना, बाढ़ का अचानक आना, समुद्री जल-स्तर का बढ़ना, चक्रवाती तूफान में तेजी, रेगिस्तान व मैदानी इलाकों में तापमान का बढ़ना, जंगलों में आग लगना, नदी के तटीय इलाकों का डूबना आदि हमारे सांविधानिक दायित्वों को पूरा करने के तरीकों पर फिर से गंभीरतापूर्वक गौर करने की मांग करेंगे। इतना ही नहीं, शांति-काल में सेना के ठिकाने, सैन्य कार्रवाई के समय उनकी तैनाती, उनके माल-असबाब, संगठनात्मक ढांचा, रसद, रणनीति और युद्ध लड़ने की तकनीक आदि सभी कुछ हमें फिर से तय करने होंगे। आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन के पूरे ढांचे को भी बदलना होगा। चूंकि बड़े संगठनों का कायाकल्प यूं ही नहीं हो जाता, क्योंकि यह एक लंबी प्रक्रिया होती है, इसीलिए इस चुनौती से निपटने की दिशा में हमें सामूहिक तौर पर सोचना चाहिए।

हमारे नीति-नियंताओं को खासतौर से बंगाल की खाड़ी के तटीय इलाकों के बारे में संजीदा होना चाहिए, जो दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में एक है। यह क्षेत्रीय अस्थिरता का जनक हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अतिरिक्त ग्लोबल वार्मिंग बांग्लादेश, म्यांमार और भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आंध प्रदेश के तटीय इलाकों को डुबो देगी, जिससे भारत में बड़े पैमाने पर ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ यानी जलवायु परिवर्तन की वजह से बने शरणार्थियों की आवक बढ़ जाएगी। जलवायु परिवर्तन पर ‘ग्लोबल मिलिट्री एडवाइजरी कौंसिल’ के अध्यक्ष मुनिरुज्जमां का तो यह भी मानना है कि ऐसे शरणार्थियों की संख्या करीब दो करोड़ हो सकती है। 

जाहिर है, इन्हें जमीनी और तटीय सीमाओं से दाखिल होने से रोकने की बड़ी चुनौती हमारे सुरक्षा बलों के सामने होगी। इसके लिए हमें बटालियनों की तैनाती के साथ-साथ जमीनी और तटीय सीमा की रक्षा में जुटे संसाधनों की समीक्षा करनी होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा हितों और मानव दायित्वों के बीच संतुलन भी साधना होगा।

जलवायु परिवर्तन की राष्ट्रीय रणनीति के हिस्से के रूप में हमें क्षेत्रीय सहयोगी तंत्र को भी मजबूत बनाना चाहिए। हमें महाद्वीप की सेनाओं के बीच आपसी रक्षा सहयोग की संयुक्त कमांड संरचना बनाने पर ध्यान देना चाहिए, जो प्राकृतिक व मानव निर्मित आपदा का आपस में मिलकर सामना करे। यह तंत्र इस क्षेत्र में काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों व अन्य गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम करे। चूंकि भारत एक उभरती हुई बड़ी ताकत है, इसीलिए उसे इस दिशा में नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए।

हम इस पारिस्थितिकीय क्षेत्रीय सैन्य बटालियनों में सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों को भी शामिल कर सकते हैं, ताकि उन तमाम इलाकों में जंगल बसाने का एक निहायत जरूरी काम हो सके, जो समाज के कुछ असामाजिक तत्वों के लालच की भेंट चढ़ गए हैं और निर्जन हो गए हैं। इसके अलावा, जलवायु सुधार को लेकर हमें भू-इंजीनियरिंग के प्रयासों को भी गति देनी चाहिए और इसमें भी सेवानिवृत्त सैन्य इंजीनियरों को शामिल करना चाहिए। ये प्रयास हवा से कार्बन डाई-ऑक्साइड को हटाने और पृथ्वी तक पहुंचने वाली सूर्य की विकिरणों को सीमित करने से जुड़े होंगे। 

आईपीसीसी की रिपोर्ट निश्चित रूप से जलवायु परिवर्तन के तय नतीजों के प्रति विश्व समुदाय को जागरूक कर रही है। उम्मीद है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी इस मुद्दे पर अपने अड़ियल रवैये को छोड़ने के लिए बाध्य करेगी। संयोग से, अमेरिका उन 20 देशों की सूची में दूसरे स्थान पर है, जहां अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक कार्बन डाई-ऑक्साइड का सबसे ज्यादा उत्सर्जन होता है। यह समझना होगा कि राजनीतिक सदिच्छा ही पेरिस समझौते के सफल क्रियान्वयन की कुंजी है, जिसका उद्देश्य वैश्विक तापमान के स्तर को 1.5 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखना है। चूंकि वक्त तेजी से फिसलता जा रहा है, इसीलिए सभी देशों को जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों के प्रति अपने वादों को पूरा करने की तरफ गंभीरता से बढ़ना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 9th november