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अभी नहीं रुकेगी नाम की राजनीति

बद्री नारायण निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

महान कवि विलियम शेक्सपियर भले ही मानते हों कि नाम में क्या रखा है, लेकिन राजनीति के लिए नाम में ही बहुत कुछ रखा है। पिछले दिनों जब इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया गया, तो लगा कि नामों की या नाम बदलने की राजनीति अभी रुकने वाली नहीं है। सरकार भले ही इस पर मौन हो, लेकिन कई शहरों-कस्बों के नाम बदलने के अभियान शुरू हो गए हैं।

नाम अस्मिता और इतिहास के परिक्षेत्र में घुसने का प्रवेश द्वार है। नाम हमें हमारे इतिहास से जोड़ता है, वह इतिहास चाहे व्यक्ति का इतिहास हो, समूह या समाज का इतिहास हो या धर्म का इतिहास हो। कई बार विभिन्न कारणों से धार्मिक इतिहास सामाजिक या समूह के इतिहास को अपने में समेट लेता है। फिर समूह या समाज के अन्य लोग भी अपने इतिहास को अपने धार्मिक इतिहास से जोड़कर देखने लगते हैं।

नाम हमें हमारी स्मृतियों से जोड़ता है, साथ ही नई स्मृतियां सृजित भी करता है। यह हमारे मन मस्तिष्क में बार-बार आवृृत हो दीर्घकालिक स्मृतियां सृजित करता है। दुनिया के दो अत्यन्त महत्वपूर्ण इतिहासकारों एरिक हॉब्स बॉम और ट्रांस रेंजर ने नई स्मृतियों के निर्माण की प्रक्रिया को समझते हुए इन्वेशंन ऑफ ट्रेडिशन (परंपरा के आविष्करण) की चर्चा की है। उनका मानना है कि हम कई बार समकालीन और आधुनिक उत्पत्तियों को भी अपनी प्राचीन परंपरा से जोड़कर अपने लिए वैधता प्राप्त करते हैं। इसी वैधता या लेजिटिमेसी से नई स्मृतियों को दीर्घकालीन स्मृतियों में परिवर्तित भी करते जाते हैं। उन्होंने उदाहरण देकर बताया है कि जैसे भारतनाट्यम के वर्तमान रूप का आविष्करण 200-300 से ज्यादा पहले का नहीं है, पर हम उसे प्राय: सदियों पुरानी नाट्य कला बताते हैं। अनेक मंदिरों के सामने लिखा होता है ‘प्राचीन मंदिर’। ऐसा करने से इतिहास बोध, प्राचीनता, सांस्कृतियां स्मृतियों से जुड़ाव स्थान और परिघटना, को एक दीर्घकालिक स्मृति का हिस्सा बना लोकप्रियता प्रदान करता है। राजसत्ताएं अक्सर शहरों, नगरों, ऐतिहासिक धरोहरों के नामों में परिवर्तित करती हैं। ऐसा करके वे अपनी सत्ता के लिए लेजिटिमेसी सृजित तो करती ही हैं, साथ ही साथ वे अपनी वैचारिक सत्ता को भी आधार देती हैं, क्योंकि परिवर्तित नाम उनके विचार, आइडियोलॉजी के प्रतीक रूप होते हैं।

न केवल भाजपा वरन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी उत्तर प्रदेश में अपने-अपने शासनकाल में पार्कों, चौराहों व स्थानों के नाम में परिवर्तन किए हैं। मायावती ने नाम परिवर्तन से ज्यादा नए नामों से जिले बनाए। अंबेडकर नगर, संतकबीर नगर, महामाया नगर, ज्योति बा फूले नगर जैसे नामों से अनेक नए जिले या तो सृजित किए गए हैं, या पुराने जिलों का पुनर्गठन करके उन्हें नया नाम दिया गया। भदोही जिले का नाम संत रविदास नगर कर दिया गया। एकलव्य, कबीर, रविदास के नाम पर चौराहा, पार्क एवं स्मृति चिह्न सृजित किए। ये नाम प्राय: उनकी बहुजन राजनीति के विचार प्रतीक रहे हैं। अंबेडकर, कबीर, रविदास, महामाया, एकलव्य आदि बहुजन समाज के नायक हैं। मायावती ने अपने साक्षात्कार में कहा भी था कि उन्होंने अपने शासन में दलित संतों, गुरुओं और नायकों को सम्मान दिया। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती द्वारा रखे गए आठ जिलों के नामों को बदलकर उनके मूल नाम कर दिए। छत्रपति साहूजी नगर का नाम उसका मूल नाम अमेठी कर दिया गया। रामाबाई नगर का नाम कानपुर देहात कर दिया गया। भीम नगर को संभल, प्रबुद्ध नगर को शामली कर दिया गया। कांशीराम नगर का नाम हापुड़ और अमरोहा कर दिया गया। अखिलेश यादव ने बसपा द्वारा अपने विचार और उसके जुड़े प्रतीकों की प्रतीकात्मक शक्ति को खत्म करने के लिए उन्हें फिर से उनके मूल नाम में वापस कर दिया। भाजपा ने भी शहरों, नगरों और जिलों के नामों को अपने वैचारिक राजनीति से जोड़ने का अभियान आरंभ किया है। भाजपा का मानना है कि भारत में मध्यकाल में हुए मुगल आक्रमण या शाासन में अपने स्थानों, जिनके नाम हिंदू इतिहास, संस्कृति व स्मृति से जुड़े थे, उन्हें मुगलकाल में और दिल्ली सल्तनत के काल में दिए गए और वे नाम या तो मुगल शासकों के नाम पर हैं, उनके सेनापतियों के नाम पर या इस्लाम धर्म के प्रतीकों से जुड़े हैं। भारतीय जनता पार्टी के तमाम समर्थक उन सभी मुगल मुस्लिम और इस्लामिक प्रतीकों को मिटाकर हिंदू संस्कृति एवं स्मृति के प्रतीकों को रिकवर करने का दावा कर रहे हैं। कुछ वामपंथी विचार के लोग भी मानते हैं कि औपनिवेशिक प्रतीकों, नामों, पार्कों और मेमोरियल व शहर, जो अंग्रेजी लाटसाहब, अफसरों, वायसराय आदि के नाम पर रखे गए हैं, उन्हें हटाकर देसी नाम दिया जाए। इसे लेकर कुछ वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों लखनऊ में घरना-प्रदर्शन भी किया था।

फिलहाल जो कोशिश हो रही है, वह यह कि स्मृतियों का एक ऐसा इको सिस्टम या स्फेयर बने, जिसमें हिन्दुत्व की स्मृति लोगों के मन में बढ़ती रहे। हिंदू धर्म के धार्मिक प्रतीकों से जुड़े नाम देकर हिन्दुत्व की राजनीति को एक स्मृतियों का आधार दिया जा रहा है, ताकि इन्हीं स्मृतियों पर राजनीति प्रबल हो सके। यहां इसे स्मृतियों की राजनीति के रूप में समझा जा सकता है। कोई भी राजनीति जब स्मृतियों में पैठ जाती है, तो उसे निकालना कठिन होता है। स्मृतियों में बैठ जब कोई राजनीति आदमी के मन में प्रवेश कर जाती है, तो उस राजनीति का दीर्घकालिक प्रभाव निर्मित होता है।

मुगल और इस्लामिक स्मृतियों के बरक्स हिंदुत्व की स्मृति को बलवती कर राजनीति के लिए खाद-पानी तैयार करने का काम इन दिनों जोरों पर है। देखना है कि इन नामों की राजनीति के क्या राजनीतिक फायदे होते हैं? यह भी देखना है कि युवा वर्ग, जिसके लिए रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल मुंहबाए खड़े हैं, इन नाम बदलने की राजनीति को कैसे स्वीकार करती है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Editorial Hindustan column for 8 November