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रोशनी और अंधेरे के बदलते अर्थ

प्रियदर्शन, वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार

कहानी यह है कि राम के अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने जो दीपक जलाए, उनसे दिवाली शुरू हुई। एक तरह से ये सभ्यता के दीपक थे- अमावस्या के अंधेरे को काटने वाली उस रोशनी के प्रतीक, जो दिवाली का स्थाई भाव बन गई। इस रोशनी के बिना हम दिवाली की कल्पना नहीं कर पाते। रोशनी धीरे-धीरे हमारे लिए सभ्यता का पर्याय होती चली गई है। तमसो मा ज्योतिर्गमय-  अंधकार से प्रकाश की ओर चलें, का यह पौराणिक आह्वान अब तक हमें याद है, लुभाता है और हर अंधेरे के बावजूद दिवाली मनाने की प्रेरणा देता है। इस विश्वास के साथ कि यह रोशनी अंधेरा काटेगी।

अंधेरे और रोशनी के द्वंद्व की इस अपरिहार्यता पर हमारा भरोसा कुछ इतना बद्धमूल हो चुका है कि हम इस बात पर भी ध्यान नहीं देते कि अब अंधेरे के अर्थ भी बदल गए हैं और रोशनी के भी। रोशनी सिर्फ अंधेरे को नहीं काटती, वह रोशनी को भी काटती है। सूरज के प्रकाश में हमें चांद-तारे दिखाई नहीं पड़ते। बड़ा और करीब का प्रकाश दूरस्थ और छोटे प्रकाश को लील लेता है। काली और अंधेरी रात न होती, तो हम ठीक से समझ भी न पाते कि आसमान की चुनरी में कितने चांद-तारे टंके हैं। दिवाली के दीपक अमावस्या की रात धरती को आसमान का आईना बना देते हैं। छोटी-छोटी रोशनियां एक-दूसरे का हाथ थामे अंधेरे के तिलिस्म को तोड़ती चलती  हैं। दीयों से निकलती मिट्टी की खुशबू, तेल और बाती की भीनी-भीनी सुगंध इस रोशनी को जैसे एक मानवीय स्पर्श देती है। इस अवसर पर लक्ष्मी पूजी भी जाती है, जुए में दांव पर लगाई भी जाती है। इस लिहाज से दिवाली वह दुनियावी त्योहार  है, जिसमें अर्थ की महत्ता भी स्थापित होती है और उसे धूल समझने का भाव भी। 

एक पुरानी कहानी याद आती है। शिष्य ने गुरु से पूछा, प्रकाश कहां से आता है? जवाब मिला- सूरज से। शिष्य ने पूछा, रात को प्रकाश कहां से आता है? गुरु ने कहा, चांद से। अमावस्या की रात को? तारों से। मेघ घिरी काली-अंधेरी रात को? गुरु का जवाब है, ध्वनि से। हम पुकारते हैं कि कोई है? और कहीं से आवाज आती है- इस तरफ आ जाओ। यह ध्वनि प्रकाश का काम करती है। शिष्य अपनी जिज्ञासा और आगे बढ़ाता है- जब अंधेरी काली, बादलों से घिरी रात हो, हाथ को हाथ न सूझता हो, कोई आवाज देने वाला भी न हो, तब प्रकाश कहां से आता है? गुरु का जवाब है- तब प्रकाश भीतर से आता है। हम अपने भीतर टटोलते हैं- किस तरफ चलें, और चल पड़ते हैं। बुद्ध ने शायद इसे ही अप्प दीपो भव:  कहा था- अपना दीपक खुद बनो। गांधी की अंतरात्मा की आवाज यही रोशनी थी। सच तो यह है कि रोशनी भी हमारे भीतर होती है और अंधेरा भी। हमें चुनना पड़ता है। 

लेकिन हमारे समय में अंधकार और प्रकाश की विडंबनाएं कुछ और हैं। इन दिनों हम अंधेरे से नहीं, रोशनी से घिरे हैं। हमारे चारों तरफ इतनी ज्यादा रोशनी है कि हमारी आंखें चुंधिया गई हैं। हम कुछ और देखने को तैयार नहीं। विज्ञान बताता है कि बहुत ज्यादा रोशनी भी लोगों को अंधा कर देती है, वह अंधेरे में बदल जाती है। यह बाजार की रोशनी है, जो कई बार दिवाली के दिखावों में नजर आती है। यह बीमार रोशनी है, जो श्रेष्ठता के हमारे अहंकार में नजर आती है। इस रोशनी के साथ बहुत सारा शोर और धुआं जुड़ गया है। यह पांच तत्वों में तीन- धरती, जल और आकाश को इस तरह प्रदूषित कर रही है कि अब सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें दखल देना पड़ रहा है।
दूसरी ओर अंधेरा खत्म नहीं हो रहा, बढ़ता ही जा रहा है। प्रकाश का दायरा पार करते ही यह अंधेरा डराता है। प्रकाश की अट्टहासी उपस्थिति के सामने यह अंंधेरा बहुत बेबस नजर आता है। वह प्रकाश से जुड़ने की कल्पना तक नहीं कर पाता। कायदे से यह अंधेरा हमारा नहीं, हम इस अंधेरे के अपराधी हैं।

इस ढंग से देखें, तो हमारे सामने दिवाली के नए अर्थ खोजने की चुनौती है- जरूरी प्रकाश को गैर-जरूरी प्रकाश से दूर करने की चुनौती। अंधेरे को प्रकाश के करीब लाने की चुनौती है। अच्छी बात यह है कि दिवाली की प्रकाश परंपरा अभी तक इतनी कलुषित नहीं हुई है कि दिवाली अपना मर्म खो दे। इस मर्म तक हमें दोबारा पहुंचना होगा, उसका नए सिरे से मूल्यांकन करना होगा।

राम की कहानी पर लौटें। दिवाली एक तरह से राम के रूपांतरण का दिन भी है। वनवासी और योद्धा राम, दुष्टों का दलन करने वाला राम, शापितों का उद्धार करने वाला राम, गिरिजनों-पर्वतवासियों का मित्र राम इसी दिन से राजा राम बनता है, जिसे सार्वजनिक अपवाद की इतनी चिंता है कि वह अपनी मर्यादा की वेदी पर उस पत्नी को भी चढ़ाने से नहीं हिचकता, जिसके लिए उसने कई योजन का समुद्र पार कर एक पूरा युद्ध लड़ा। दिवाली पर राम के इस रूपांतरण को अक्सर अलक्षित किया जाता है, क्योंकि दिवाली हम राम के लिए नहीं, दरअसल रोशनी के लिए मनाते हैं। 

मगर दिवाली पर रोशनी का यह छल समझना होगा। इन दिनों फिर से राम की चर्चा है। हमें राजा राम नहीं, वनवासी राम चाहिए, मंदिरों में पूजा जाने वाला राम नहीं, तपस्वियों का रक्षक व ्त्रिरयों का उद्धारकर्ता राम चाहिए। जिस अंधेरे से लड़ने के लिए मनुष्य ने अपने लिए रोशनी का पर्व गढ़ा, वह अब नई शक्ल में सामने है। दिवाली भरोसा दिलाती है कि हम इस नए अंधेरे से भी लड़ लेंगे। लेकिन ध्यान रहे, यह लड़ाई उधार ली हुई, रेडिमेड रोशनियों से नहीं, अपने अनुभव और अपनी जरूरत के हिसाब से रची गई रोशनी के हथियारों से लड़ी जाएगी। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:editorial hindustan column for 7th november