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क्यों डराती है पंजाब की ताजा वारदात

Vibhuti Narain Rai

अमेरिका के राष्ट्रपति हमारे समय के सबसे विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व हैं। उनके तमाम बयान और विवाद हर रोज हमारे सामने आते रहते हैं। तमाम ऊट-पटांग बातों के बीच अगर वह कुछ समझदारी की बात भी कहते हैं, तो लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते। यह तय कर पाना हमेशा मुश्किल होता है कि उनकी बात को कितना अमेरिकी सरकार की नीतियों से जोड़कर देखा जाए और कितना राष्ट्रपति की फितरत से। पाकिस्तान के बारे में उनका ताजा बयान भी हमारे सामने इसी धर्मसंकट के साथ उपस्थित हुआ है। फॉक्स न्यूज  को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने पाकिस्तान को काफी खरी-खोटी सुनाई है। उनका कहना है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए कुछ नहीं किया, जबकि उसने पाकिस्तान को 1.3 अरब डॉलर की सालाना मदद दी है।

इस संबंध में ट्रंप ने खासकर ओसामा बिन लादेन का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दुनिया का यह मोस्ट वांटेड आतंकवादी पाकिस्तान के एक सैनिक शहर में आलीशान घर बनवाकर आराम से रह रहा था और उसने कोई कदम नहीं उठाया। ‘वह वहां मिलिट्री एकेडमी के ठीक पास में रह रहा था और सब उसके बारे में जानते थे, लेकिन कुछ नहीं हुआ’। बाद में अमेरिका के नेवी सील कमांडो ने एबटाबाद के इसी घर में जाकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। इंटरव्यू में ट्रंप से पाकिस्तान को अमेरिकी प्रशासन द्वारा बंद कर दी गई 30 करोड़ डॉलर की मदद के बारे में सवाल पूछा गया था और जवाब में उन्होंने यह सब कहा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो लोग अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों को मार रहे हैं, पाकिस्तान उन्हें सुरक्षित पनाहगाह उपलब्ध करा रहा है।

वैसे ट्रंप ने जो कहा, वह उनका निजी विचार ही नहीं है, अमेरिका के आम और खास लोग भी अक्सर ऐसी ही बात करते सुनाई दे जाते हैं। दिक्कत यह है कि यह धारणा अमेरिकी सरकार की नीतियों में कभी नहीं दिखाई देती। अब जब खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ही यह कह रहे हैं, तो इसे क्या माना जाए? यह सच है कि अमेरिका अब पाकिस्तान के प्रति उतना उदार नहीं रहा, जितना कि कभी पहले हुआ करता था।

लेकिन अमेरिका की दिक्कत यह है कि उसकी अफगान रणनीति में पाकिस्तान की केंद्रीय भूमिका शुरू से ही रही है, और यह अभी भी बनी हुई है। इसका एक सीधा सा अर्थ यह है कि जब तक अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में हैं, अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत पड़ती रहेगी। एक दूसरी संभावना यह हो सकती है कि अमेरिका कोई वैकल्पिक अफगान रणनीति बनाए, फिलहाल तो यह होता दिख नहीं रहा।


पंजाब में क्या इतिहास फिर अपने को दोहराने जा रहा है? आतंकवादी खूंरेजी के उन काले दशकों की शुरुआत निरंकारियों के खिलाफ आंदोलनों और हिंसा से हुई और यह अपने निर्णायक दौर में 1980 में निरंकारी प्रमुख बाबा गुरुबचन सिंह की हत्या के बाद ही दाखिल हुई थी। एक बार फिर 18 नवंबर को अमृतसर के ग्रामीण इलाके में निरंकारी गुरुद्वारे पर हमला हुआ है। निरंकारियों को निशाना बनाकर धार्मिक भावनाएं आसानी से भड़काई जा सकती हैं, क्योंकि मुख्यधारा के सिखों से वे कुछ भिन्न हैं। इसी भिन्नता का उपयोग भिंडरांवाले ने अस्सी के दशक में पृथकतावादी खालिस्तान आंदोलन की जड़ें मजबूत करने के लिए किया था। निरंकारियों के धर्मस्थल पूरे देश में फैले हुए हैं, जहां नियमित रूप से उनके छोटे-बड़े जमावड़े होते रहते हैं। आमतौर से इनमें सुरक्षा के लिए संगठन के ही निहत्थे स्वयंसेवक नियुक्त होते हैं, अंत: ये हमेशा हमले के आसान लक्ष्य हो सकते हैं।

पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने इसके आतंकी वारदात होने की पुष्टि कर दी है। तफ्तीश से ही स्पष्ट होगा कि इसमें किस आतंकी संगठन का हाथ है, पर इतना तो तय हो गया है कि पंजाब को फिर से आतंकवाद की अंधी भूल-भुलैया में धकेलने की कोशिश की जा रही है। 


धार्मिक प्रतीकों को उभारकर अलग पहचान का आंदोलन खड़ा करना तो आसान है, पर राज्य के समर्थन के बिना इसे लंबे समय तक चला पाना मुश्किल होता है। खालिस्तान आंदोलन के जनक को भी राज्य के विभिन्न अंगों द्वारा प्रारंभ में खुला, फिर ढका समर्थन और बाद में असहाय किस्म का प्रतिरोध मिला। नतीजतन अपने बनाए भस्मासुर को नष्ट करने के लिए भारतीय राज्य को ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी भयानक कार्रवाई करनी पड़ी और उसके दु:स्वप्नों से हम आज तक उबर नहीं पाए हैं। सौभाग्य से अभी तक राज्य के किसी अंग या राजनीतिक दल द्वारा हाल के समय-समय पर खालिस्तानी आंदोलन को खड़ा करने के किसी प्रयास को समर्थन मिलने का कोई सुबूत नहीं है, फिर भी संवेदनशीलता और निरंतर सतर्कता की जरूरत है।

गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे और जनता द्वारा पूरी तरह नकार दिए गए अकालियों की फिलहाल वापसी के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में, आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वे एक बार फिर चरमपंथियों के आगे समर्पण कर दें और उनकी बैसाखी पकड़ वैतरणी पार करने की कोशिश करें। पिछली बार उनका शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) पर नियंत्रण था और बिना किसी गंभीर प्रतिरोध के सिखों के पवित्रतम स्थल स्वर्ण मंदिर पर खालिस्तानियों का कब्जा हो गया था। अब भी एसजीपीसी पर अकालियों का ही नियंत्रण है और उम्मीद करनी चाहिए कि वे पिछली गलती से सीखेंगे और अपने तात्कालिक स्वार्थ साधने के लिए चरमपंथियों को तश्तरी में रखकर गुरुद्वारे नहीं सौंपेंगे। 


जनता की याददाश्त कमजोर होती है, पर उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार खालिस्तानी हिंसा से निपटते समय की गई पिछली गलतियों को नहीं भूली होगी। तब सरकार ने सही समय पर फैसला न कर पाने की अपनी आदत के कारण स्थितियों को बिगड़ने का मौका दिया था। अंतिम मौका 1983 में मिला, जब स्वर्ण मंदिर के बाहर डीआईजी अटवाल की हत्या से उबाल खाई पंजाब पुलिस को सरकार ने गुरुद्वारे में घुसकर कार्रवाई करने से रोक दिया और एक ही वर्ष में वहां फौज भेजनी पड़ी। खालिस्तानियों को अब भी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद हासिल होगी, मगर इस बार सीमा पर तारबंदी और बेहतर नियंत्रण के कारण उसका काम मुश्किल हो गया है। इसका भी कानून का पालन कराने वाली एजेेंसियों को लाभ होगा।


पंजाब के पिछले अनुभवों के साथ हमें पाकिस्तान के अनुभवों से भी सबक लेना चाहिए, जहां धार्मिक कट्टरपंथियों के सामने राज्य द्वारा नियमित रूप से समर्पण करते-करते अब एक ऐसी स्थिति आ गई है, जब वे गाहे-बगाहे पूरी राज्य मशीनरी को ठप करने लगे हैं। पिछले दिनों 72 घंटों तक बंद रहने के बाद पाकिस्तान में जिंदगी बमुश्किल लंगड़ाती हुई सामान्य हो पाई। 31 अक्तूबर की दोपहर सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद ईश निंदा कानून के तहत पिछले नौ वर्षों से फांसी का इंतजार कर रही ईसाई महिला आसिया बीबी को रिहा कर दिया और जैसी कि आशंका थी, इस्लामी कट्टरपंथियों ने पूरे पाकिस्तान को बंधक बना लिया।

इस मुकदमे के दौरान अदालत में जो सवाल-जवाब हुए, उनसे पूरी उम्मीद थी कि आसिया रिहा हो जाएगी और तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान जैसी कट्टरपंथी जमातों ने अपने इरादे पहले से ही साफ कर दिए थे। उन्होंने सुनवाई करने वाले तीनों जजों को खुलेआम चेतावनी देनी शुरू कर दी थी कि आसिया को रिहा करने पर उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ेगा और फैसला आते ही उन्होंने पूरे देश को बंधक बना दिया।


बंद के दौरान तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के नेताओं ने टीवी पर प्रसारित हो रहे भाषणों में कहा था कि फैसला सुनाने वाले जज वाजिबुल कत्ल या हत्या किए जाने योग्य हैं। उन्होंने सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा के सहयोगियों से भी उन्हें मार डालने की अपील की। पहले तो प्रधानमंत्री इमरान खान ने उन्हें देख लेने की धमकी दी और बाद में पूरी तरह समर्पण करते हुए उनके साथ समझौता कर लिया। नेशनल असेंबली में विरोधी पक्ष के एक सदस्य ने व्यंग्य करते हुए उनकी इस दुर्दशा को दैवीय न्याय कहा। आखिर पिछले साल तहरीक-ए-लब्बैक के ऐसे ही आंदोलन को इमरान का खुला समर्थन हासिल था, जनरल बाजवा की तरफ से आंदोलनकारियों को नोट बांटते फौजी अफसरों के विजुअल वायरल हुए थे। सरकारी समर्पण का नतीजा है कि रिहाई के बावजूद आसिया बीबी की जान बचाने के लिए कनाडा में शरण लेने की कोशिश अब तक सफल नहीं हो सकी है।  


यह एक उदाहरण ही इस समझ को मजबूत करने के लिए काफी होगा कि धार्मिक कट्टरपंथी बहुत दिनों तक अपने आकाओं के नियंत्रण में नहीं रहते। पंजाब में भी शुरू में अकालियों के मुकाबले जिन लोगों ने भिंडरांवाले को खड़ा किया था, जल्द ही वह उनके काबू से बाहर हो गया। इस बार हमें पुरानी गलती से बचना चाहिए। न सिर्फ पंजाब में, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में धार्मिक आंदोलनों से निपटते समय भी सरकार को पाकिस्तानी अनुभव से सीखना चाहिए।    
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 20 november