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5 जून, 2020|2:14|IST

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बढ़ते असंतोष में बंदूक की संस्कृति

Harinder Singh Sekhon

लास वेगास में हुई गोलीबारी की घटना अमेरिकी समाज के दो विद्रूप को दिखाती है। पहला है, वहां के समाज में बढ़ रही नस्लीय भावना। खासतौर से 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से वहां यह सोच लगातार गहराती जा रही है कि अप्रवासी न सिर्फ उनकी नौकरियां छीन रहे हैं, बल्कि उनकी संस्कृति को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। मंदी के कारण विशेषकर मध्य पश्चिम में कई कारखाने बंद हुए, जिसका दुष्प्रभाव अमेरिकी श्वेत कामगारों पर पड़ा और उनकी नौकरियां खत्म हुईं। नतीजतन, पहले उनकी तनातनी अप्रवासियों के साथ बढ़ी, फिर बाद में श्वेत व अश्वेत अमेरिकियों के बीच यह प्रवृत्ति पनपने लगी। हाल के वर्षों में जिस तरह से श्वेत अमेरिकी पुलिस अधिकारियों द्वारा अश्वेत नागरिकों के मारे जाने की खबरें आई हैं, वे इसी की कड़ी हैं।

स्पष्ट है, अमेरिकी समाज में बदलाव का पहिया तेजी से घूम रहा है। इसी बदलाव ने पिछले वर्ष डोनाल्ड ट्रंप को भी ह्वाइट हाउस में पहुंचाया। अपने चुनावी अभियान में ट्रंप ने ‘अमेरिका अमेरिकियों का’, ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ और ‘स्थानीय लोगों को नौकरी देने’ का आह्वान किया था। इसने मध्य पश्चिम अमेरिका के लोगों को खूब आकर्षित किया। ऐसे लोगों का स्पष्ट तौर पर यह मानना है कि खासकर अप्रवासी युवा व उनकी आजाद सोच अमेरिकी समाज की बुनियाद को खोखला बना रही है। उनकी नजर में ऐसे लोग उस भावना के भी खिलाफ हैं, जिससे अमेरिका के संस्थापकों ने यहां का ताना-बाना रचा है। इनकी नजर में युवा अप्रवासी अमेरिकी संस्कृति से खेल रहे हैं और उसे बदलने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। साफ है कि ऐसी मानसिकता के साथ जीने वाले लोग अत्यंत कुंठित हैं। 

लास वेगास में ही जिस शख्स ने गोलीबारी की है, उसकी पहचान 64 वर्षीय स्टीफन पैडॉक के रूप में हुई है। वह श्वेत है और अमेरिकी भी। इसीलिए संभव है कि वह उसी कट्टर ईसाइयत की भावना में जी रहा हो, जो इन दिनों अमेरिका में उदार विचारों के खिलाफ है। इसकी संभावना इसलिए भी ज्यादा दिख रही है, क्योंकि लास वेगास दुनिया भर के पसंदीदा पर्यटक स्थलों में से एक है और कई अप्रवासी यहां कैसिनो, होटलों आदि में काम करते हैं। हमला एक कन्सर्ट पर किया गया, जो पहले से ही प्रचारित-प्रसारित था। हमलावर की संभवत: यह मंशा रही होगी कि पर्यटकों व अप्रवासियों में डर का माहौल पैदा किया जाए, ताकि वे यहां पर न आएं। यह सही है कि इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है और दावा किया है कि हमलावर ने हाल ही में अपना धर्म परिवर्तन किया था, लेकिन फिलहाल अमेरिकी एजेंसी ने ऐसे किसी दावे को खारिज कर दिया है।

अमेरिकी समाज का दूसरा विद्रूप वहां की ‘बंदूक-संस्कृति’ है। हमलावर के कमरे में भी आठ बंदूकें मिली हैं। वहां की ‘गन लॉबी’, खासकर कैलिफोर्निया जैसे  राज्यों में ‘राइट टु वेपन’ (हथियार रखने का अधिकार) की पुरजोर वकालत करती है। वह इसे अपना मौलिक अधिकार मानती है। स्थिति यह है कि जैसे भारत में हम बाजार में आलू-टमाटर खरीदते हैं, ठीक वैसे ही अमेरिका में किसी दुकान पर जाकर बंदूकें खरीदी जा सकती हैं। बस इसके लिए आपके पास कोई अधिकृत पहचान पत्र होना चाहिए। मगर सच्चाई यह भी है कि पिछले आठ-दस वर्षों में वहां नस्ल के बहाने या किसी और कारण से ऐसी गोलीबारी की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं। 
इसके खिलाफ पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बहस जरूर शुरू की थी, पर उसका नतीजा सिफर रहा। उन दिनों वहां अश्वेत युवाओं को निशाना बनाने की घटनाएं इसलिए भी बढ़ गई थीं, क्योंकि यह माना गया था कि पहली बार वोट दे रहे अश्वेत युवाओं ने ही अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के ओबामा को सर्वोच्च पद तक पहुंचाया। अब डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद ‘श्वेत सर्वोपरि है’ की भावना अमेरिकी समाज में तेजी से गहराने लगी है। नतीजतन, उदारवाद पर रूढ़िवादी और कट्टर ईसाइयत की सोच हावी होती दिखने लगी है। लास वेगास की गोलीबारी इसका एक बर्बर उदाहरण हो सकती है। 

इस सोच को खत्म करने का फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिख रहा। मगर इतना जरूर है कि अगर लोगों को जागरूक किया जाए, तो तस्वीर बदल सकती है। अगर इस घटना का किसी आतंकी संगठन से संबंध साबित होता है, तो यह ‘लोन वुल्फ अटैक’ माना जाएगा। और ऐसे में अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों को अपनी नीतियों पर फिर से गौर करना होगा। इससे पहले फ्लोरिडा के एक नाइट क्लब में हुई गोलीबारी में आरोपी को महज चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था। अब शायद यह संभव न हो। वहां जरूरत उस ‘गन लॉबी’ को कुंद करने की है, जो बंदूक रखना अपना मौलिक अधिकार मानती है। मुश्किल यह है कि अमेरिका के हर राज्य का अपना-अपना कानून है, इसलिए इस मसले पर जब तक राजनीतिक गलियारे में व्यापक विचार-विमर्श नहीं होगा और आम सहमति नहीं बनाई जाएगी, इस तरह की गोलीबारी का डर बना रहेगा। गन लॉबी को संवेनदशील बनाने की जरूरत है और कांग्रेसी व सीनेटरों को फेडरर व राज्य सरकारों के बीच एक कड़ी का काम करना होगा। इसके साथ-साथ वहां उस सिस्टम को भी बदलने की जरूरत है, जिसके तहत बंदूक रखने की इजाजत इतनी आसानी से मिल जाती है। साफ है, इस गोलीबारी की जांच-पड़ताल काफी हद तक ये तय करेगी कि आने वाले दिनों में अमेरिकी समाज व संस्कृति की दिशा क्या होगी?
 (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Editorial Article of Hindustan Hindi Newspaper By Harinder Singh Sekhon on Las Vegas Shooting 4th of October