Budhhinath Mishra article on Eighth Schedule of Indian Constitution in Hindustan Hindi Newspaper 14th of September - आठवीं अनुसूची की भाषायी राजनीति DA Image
20 फरवरी, 2020|10:38|IST

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आठवीं अनुसूची की भाषायी राजनीति

बुद्धिनाथ मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार और राजभाषा विशेषज्ञ

आज सरकारी लोगों के लिए राजभाषा दिवस है, क्योंकि सन 1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने ‘संघ की राजभाषा’ संबंधी अनुच्छेद पारित किए थे। धार्मिक क्षेत्र में आज पितृपक्ष की मातृनवमी का श्राद्ध है। पितृपक्ष में   लोग पितरों का तर्पण उनकी मृत्यु की तिथि के अनुसार करते हैं। संयोग से, कल जीमूतवाहन पर्व था, जब माताएं इंद्र को प्रसन्न करने के लिए निर्जल उपवास रखती हैं। जीमूत मेघ का नाम है। इंद्र का वाहन मेघ भी है, इसलिए अतिवृष्टि और अनावृष्टि, दोनों स्थितियों में लोग इंद्र को प्रसन्न करते हैं। देखें, तो राजभाषा दिवस भी एक प्रकार से जीमूतवाहन पर्व ही है, जब सरकारी कार्यालयों के इंद्रों को प्रसन्न करने के लिए राजभाषा सजाई जाती है। सरकारी मदों से करोड़ों रुपये बड़े पुरस्कारों, स्मृति-चिह्नों आदि पर बहाए जाते हैं। 

सरकारी कार्यालयों में राजभाषा का काम एक ऐसा महाभारत है, जिसमें पांडवों को कौरवों से निहत्था लड़ना है। पिछली आजादी ‘बिना खड्ग-बिना ढाल’ भले जीत ली गई हो, मगर भाषा की आजादी की लड़ाई जीतना उतना आसान नहीं। हमारी प्रारंभिक से उच्च शिक्षा तक आज भी अंग्रेजी की मुहताज है या बना दी गई है। बल्कि धीरे-धीरे पूरी शिक्षा-पद्धति अंग्रेजी के मकड़जाल में और फंसती जा रही है। गांव-गांव में इंग्लिश मीडियम में बच्चों को  पढ़ाने का चलन बढ़ा है। ‘स्कूल’ नाम को कलंकित करने वाली सुविधाविहीन उन झोपड़पट्टियों में ‘ए माने सेब, बी माने बैल, सी माने बिल्ली और डी माने कुत्ता’ पढ़ते-पढ़ाते सुना गया है। यह हुआ अंग्रेजी का भारतीयकरण! 

यह विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में अपनी बात रखने में देश की शान समझते हों, मगर डिजिटल इंडिया हो या स्टार्टअप इंडिया, सरकार की सारी योजनाएं अंग्रेजी की ओर ही जा रही हैं, क्योंकि बिना अंग्रेजी जाने आम आदमी के लिए यह सब दूर की कौड़ी है। ‘डिजिटल इंडिया’ के फेर में फिर सारे काम अंग्रेजी में होने लगे हैं। जब संघ की राजभाषा हिंदी ही उपेक्षित है, तो अन्य भारतीय भाषाओं की स्थिति क्या होगी! 

भारत सरकार के कार्यालयों, अनुसूचित बैंकों और सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदी के कार्यान्वयन का दायित्व जिस गृह मंत्रालय का है, उसके राजभाषा विभाग के सारे अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। समझा जा सकता है कि खुद तदर्थ पद पर आसीन अधिकारी क्या स्थाई नीति बनाएंगे? राजभाषा का काम विशेषज्ञता की अपेक्षा करता है, इसीलिए पहले रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकारों को इसका प्रधान पद सौंपा गया था और इस विभाग में जो भी रचनात्मक कार्य हुए, वे उसी दौरान हुए। इसी को ध्यान में रखते हुए संसदीय राजभाषा समिति ने राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के शीर्ष पद पर पुन: किसी वरिष्ठ साहित्यकार-सह-राजभाषाविद् को नियुक्त करने की संस्तुति की थी, पर चतुर अधिकारियों ने वह संस्तुति ही गायब करा दी। बाद में संसदीय समिति को भी अपनी ही वे महत्वपूर्ण संस्तुतियां याद नहीं रहीं। 

संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में प्रावधान किया गया था कि (15 वर्ष बाद) देवनागरी में लिखित हिंदी संघ की राजभाषा होगी और शासकीय प्रयोजनों के लिए ‘भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप’ का प्रयोग होगा। इसे अंग्रेजीदां ‘अरबिक’ और अरब के लोग ‘हिंदस:’ यानी भारत से आई अंक विद्या कहते हैं। स्वाधीनता संग्राम की माध्यम भाषा के रूप में हिंदी 1949 तक सारे देश की केंद्रीय भाषा तो बन गई थी, मगर प्रशासन की भाषा के रूप में उसे और विकसित होना था। इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 351 में केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया गया कि वह हिंदी का विकास इस तरह करे कि वह भारत की ‘सामासिक संस्कृति’ (कंपोजिट कल्चर) की अभिव्यक्ति का माध्यम बने। इसके लिए वह मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: ‘आठवीं अनुसूची’ में उल्लिखित ‘राष्ट्रीय भाषाओं’ से शब्द ग्रहण करे। 

पूरे संविधान में ‘आठवीं अनुसूची’ का संदर्भ केवल दो बार आया है। एक अनुच्छेद 351 में, जहां उसमें सम्मिलित भाषाओं से आवश्यकतानुसार पदावली, शैली आदि ग्रहण करने का निर्देश है। दूसरा संदर्भ अनुच्छेद 344 का है, जिसमें संविधान लागू होने के तत्काल बाद राजभाषा आयोग गठित करते समय आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भाषाओं के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने का प्रावधान है, ताकि हिंदीतरभाषियों की कठिनाइयों का ध्यान रखा जा सके। मेरी समझ से ‘आठवीं अनुसूची’ तात्कालिक जरूरत थी, जिससे अन्य प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं के प्रतिनिधियों को यह अनुभव हो कि उनकी मातृभाषा को भी उचित सम्मान दिया जा रहा है। 1950 में जब संविधान लागू हुआ, तब आठवीं अनुसूची में 14 भाषाएं थीं, जो आज बढ़कर 22 हो गई हैं। 

राजनीतिक तुष्टीकरण के कारण इस अनुसूची में ऐसी भाषाएं भी शामिल की गईं, जिनकी आबादी कुछ लाख मात्र हैं। परिणाम यह हुआ कि सरकारी संरक्षण पाने के लिए दर्जनों लोकभाषाएं, जिनका प्रशासनिक भाषा के रूप में अनुभव नहीं है, आठवीं अनुसूची में घुसने की कोशिशें करने लगी हैं। यदि ऐसा हुआ, जो वोट की राजनीति में असंभव नहीं, तो यह प्रशासनिक कामों में भाषिक अराजकता पैदा करने वाला होगा। इसका लाभ अंग्रेजी को मिलेगा और हानि सभी भारतीय भाषाओं की होगी। 

भारतीय संविधान में वर्णित उपरोक्त दो प्रयोजनों पर गौर किया जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि आज के भारत में इस ‘आठवीं अनुसूची’ की जरूरत नहीं है, बल्कि इसको हटाकर सभी भारतीय भाषाओं के विकास के लिए नए सिरे से विचार किया जाए और अनुसूचित राष्ट्रीय भाषाओं को अब तक मिली सुविधाएं जारी रखते हुए हर अल्प विकसित भाषा को अपने विकास का समुचित अवसर दिया जाए। इसके लिए राजभाषा विशेषज्ञों की एक समिति बने और उसके निर्णयों को बिना किसी हस्तक्षेप के कार्यान्वित किया जाए। 40 वर्षों की राजभाषा सेवा के बाद मेरा निष्कर्ष है कि जिस भाषा का समाज राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से सबल नहीं है, वह आठवीं अनुसूची में शामिल होकर भी उपेक्षित ही है।

इस संबंध में दस साल पहले मैंने मनाली की एक राजभाषा संगोष्ठी में विस्तार से अपना अध्ययन निष्कर्ष रखा था, जिसे वहां उपस्थित डॉ नामवर सिंह जैसे विद्वानों, राजनेताओं व राजभाषा विशेषज्ञों ने समर्थन किया था। जनबल के दबाव में विभिन्न लोक भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से बेहतर होगा कि आठवीं अनुसूची ही हटा दी जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो पूरे देश में भाषाई आंदोलन उग्र होगा और देश को कमजोर बनाने वाले तत्वों के हाथ अनायास एक और घातक अस्त्र लग जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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