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मैं तो मर जाना चाहती थी

अक्काई पद्मशाली, ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता

बचपन में नाम था जगदीश। मम्मी-पापा का लाडला बेटा था वह। पर होश संभालते ही उन्हें अपने अंदर एक अजीब सा बदलाव महसूस होने लगा। उन्हें अपनी बहन की फ्रॉक और चूड़ियां पहनना अच्छा लगता था। मां ने कई बार उन्हें समझाया कि तुम लड़का हो, इसलिए तुम्हें लड़कों की तरह रहना चाहिए। मगर वह लड़कों की पोशाक में खुद को असहज महसूस करते थे। जबकि बहन की तरह सजने-संवरने में उन्हें  बहुत खुशी मिलती थी। इसलिए जब भी मौका मिलता, वह चुपके से बहन की चूड़ियां और फ्रॉक पहनकर तैयार हो जाते। एक बार मां ने उन्हें लड़की की पोशाक में देख लिया। बहुत पिटाई हुई। पापा ने भी चेतावनी दी। अगर दोबारा लड़की के कपड़े में नजर आए, तो खैर नहीं। बड़ी दुविधा थी। उन्हें लड़कियों के संग खेलना अच्छा लगता था। जबकि घरवाले दबाव बनाते थे कि वह लड़कों के संग दोस्ती करें और उनके जैसा व्यवहार करें।

पापा एयरफोर्स में थे। उनकी एक ही ख्वाहिश थी कि बेटा पढ़-लिखकर सेना में जाए। बेटे के व्यवहार से वह बहुत परेशान थे। उन्हें लगा शायद बेटे को कुछ मानसिक बीमारी है, इसलिए उसे डॉक्टर के पास लेकर गए। जब इससे भी बात नहीं बनी, तो ओझा और पंडित की मदद भी ली। पर बेटे के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। एक तरफ परिवार का दबाव था, तो दूसरी तरफ खुद की शारीरिक स्थिति। तनाव इतना बढ़ा कि जगदीश ने 12 साल की उम्र में दो बार आत्महत्या करने की कोशिश की। पर ऐन वक्त पर घरवालों ने देख लिया और जान बच गई। घरवाले उन्हें बार-बार यकीन दिला रहे थे कि तुम एक लड़का हो, जबकि उनका मन यह मानने को तैयार नहीं था। उन दिनों वह बेंगलुरु में रहते थे। एक दिन उन्होंने अपने भाई से कहा कि वह लड़का नहीं, लड़की की तरह जीना चाहते हैं। भाई ने माता-पिता को समझाने की कोशिश की कि वे जगदीश को लड़के की तरह जीने को मजबूर न करें, पर वे राजी नहीं हुए।

अब उन्हें यकीन हो चला था कि परिवार और समाज में उनके लिए कोई जगह नहीं है। उन्हें घर और स्कूल, सब तरफ अपने लिए नफरत नजर आने लगी। जहां जाते, उन्हें अपमानित किया जाता। हारकर 10वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और सेल्समैन की नौकरी करने लगे। कुछ दिनों बाद वह नौकरी भी छूट गई। इस बीच वह कुछ किन्नरों के संपर्क में आए। एक दिन वह पास की एक किन्नर बस्ती में पहुंचे। अक्काई बताती हैं, बस्ती के लोगों ने मुझसे कहा कि तुम हमारे जैसी मत बनो। हमारे पास पेट पालने के लिए दो ही विकल्प हैं- या तो भीख मांगो या सेक्स का धंधा करो। हमारे साथ रहने पर तुम्हें भी यही सब करना पड़ेगा। यह सुनकर वह घबरा गए। पर वह जानते थे कि समाज उन्हें कभी महिला के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, इसलिए वह बस्ती में रहने आ गए। जैसी कि आशंका थी, रोजी-रोटी के लिए उन्हें भी सेक्स के धंधे में उतरना पड़ा। कई बार पुलिस ने उन्हें पकड़कर प्रताड़ित किया। अक्काई बताती हैं, मेरे पास कोई काम नहीं था। चार साल तक मैं सेक्स वर्कर रही। 
  
ये चार साल बहुत महत्वपूर्ण थे उनकी जिंदगी में। यह वह दौर था, जब उन्होंने महसूस किया कि सामाजिक भेदभाव और प्रताड़ना सिर्फ उनकी समस्या नहीं है। देश में लाखों किन्नर और समलैंगिक लोग हैं, जो हर दिन प्रताड़ना सहने को मजबूर हैं। वह लोकल संगठन संगमा के साथ काम करने लगे। इस दौरान ट्रांसजेंडर और समलैंगिकों के कानूनी अधिकारों के बारे में अध्ययन किया और अंग्रेजी बोलना सीखा। जगह-जगह जाकर लोगों को ट्रांसजेंडर और समलैंगिक के मुद्दे पर जागरूक करने लगे। 2012 में उन्होंने सेक्स सर्जरी कराई और जगदीश से अक्काई पद्मशाली बन गईं। अक्काई कहती हैं, मैं कभी समाज के खिलाफ नहीं जाना चाहती थी। मैं तो बस यह चाहती थी कि समाज मुझे उस रूप में स्वीकार करे, जिस रूप में ईश्वर ने मुझे बनाया है। वह देश की पहली किन्नर हैं, जिन्हें महिला के नाम पर ड्राइविंग लाइसेंस जारी किया गया है। कर्नाटक सरकार ने उन्हें राज्योत्सव अवॉर्ड से सम्मानित किया। अक्काई ने पुरुष साथी वसु से शादी की।

कर्नाटक में अपनी शादी रजिस्टर कराने वाली वह पहली महिला किन्नर हैं। इंडियन वर्चुअल यूनिवर्सिटी की तरफ से उन्हें शांति और शिक्षा के लिए डॉक्टरेट की उपाधि दी गई। इसके बावजूद उन्हें बहुत अपमान सहना पड़ा। अक्काई बताती हैं, हमें कोई किराये का घर नहीं देता था। उन्हें लगता था कि अगर मैं मोहल्ले में रहूंगी, तो समाज में गलत असर पड़ेगा। यह भेदभाव खत्म होना चाहिए।

साल 2016 में उन्होंने दो महिला किन्नरों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 के खिलाफ याचिका दायर की। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता देते हुए इस धारा को खारिज कर दिया। अक्काई इसे अपने संघर्ष की बड़ी जीत मानती हैं। प्रस्तुति : मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:Transgender worker Akkai Padmashali article in HIndustan on 09 september