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पढ़ने के जज्बे ने वर्जीनिया पहुंचाया

मुंबई के कुर्ला स्लम में रहने वाले जयकुमार वैद्य का पूरा बचपन महरूमियों और तकलीफों के बीच बीता। वह अपनी मां नलिनी वैद्य की गोद में ही थे, तभी मां और उन्हें घर से निकाल दिया गया और कुछ दिनों बाद पिता ने मां को तलाक का नोटिस भी थमा दिया। मगर मां जिंदगी से मायूस नहीं हुईं और बेटे की अच्छी परवरिश को अपने जीने का मकसद बना लिया।  

एक पैकेजिंग कंपनी में जय की मां ने क्लर्क की नौकरी कर ली, ताकि घर चला सकें। मगर किस्मत ने उन्हें फिर धोखा दिया और 2003 में नानी की बीमारी के कारण जय की मां को नौकरी छोड़नी पड़ी। वे बड़े मुश्किल भरे दिन थे। फाकाकशी की हालत में तलाक की प्रक्रिया के लिए अदालत में बार-बार हाजिरी लगाने की मजबूरी रही। नौ वर्षों तक तलाक का मामला चलता रहा। उन दिनों को याद करते हुए जय की आवाज अब भी लड़खड़ा उठती है- 'मुझे कई बार स्कूल ने परीक्षा देने से रोक दिया, क्योंकि मेरी मां वक्त पर फीस नहीं भर पाती थीं। कैसे भरतीं, हम दोनों को कई बार एक बड़ा पाव में पूरा-पूरा दिन गुजारना पड़ता था। गैस ज्यादा न खर्च हो पाए, इसके लिए मां तीन-तीन दिनों की रोटियां एक साथ बना लिया करती थीं।'

ऐसे समय में स्थानीय मंदिर ट्रस्ट ने इनकी मदद की। वहां से इन्हें कुछ राशन और पहनने को किसी की उतरन मिल जाती। बेटा कम से कम 12वीं कर जाए, इसके लिए मां ने कई गैर-सरकारी संस्थाओं और ट्रस्टों से संपर्क साधा, मगर कई बार मदद की बजाय नसीहतें मिलतीं कि कहां उसे पढ़ाने-लिखाने में लगी हो, ड्राइवर बनाओ। जय बचपन से ही पढ़ने में बहुत जहीन थे। स्कूल में हमेशा आगे रहते, इसलिए मां का मन ऐसी बातें सुन तड़प उठता था, मगर वह उनसे क्या कह सकती थीं। उसी चॉल में उनके दूर के रिश्तेदार भी रहते थे, मगर किसी ने उनकी कभी कोई मदद नहीं की।

जय को टीवी देखने के लिए पड़ोसियों के घर जाना पड़ता था। वहीं डिस्कवरी  चैनल और स्पेस मूवी देखकर विज्ञान के प्रति उनकी दिलचस्पी जगी। घर की स्थितियां बहुुत कठिन थीं। मां की बेबसी और बेचैनी देख जय हमेशा दुखी रहते थे। महज 11 साल की उम्र में उन्होंने एक टीवी मरम्मत करने वाली दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। वहां से उन्हें महीने के 4,000 रुपये मिल जाते थे। जय ने कपडे़ की दुकान पर भी काम किया और अपने इलाके के बच्चों के असाइनमेंट भी किए, ताकि मां का बोझ कुछ हल्का कर सकें। इतने भीषण संघर्ष में भी आगे पढ़ने के अपने जज्बे को उन्होंने कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया और वह इस मामले में खुशकिस्मत थे कि बदहाली के बावजूद मां ने हमेशा उनका साथ दिया।

जय की मेहनत रंग लाई और उन्हें मुंबई में केजे सोमैया इंजीनिर्यंरग कॉलेज में दाखिला मिल गया। मां-बेटे की जिंदगी की एक बड़़ी 
साध पूरी हो गई। सुखद बात यह भी थी कि जय को स्कॉलरशिप मिल गई। और फिर मेस्को ट्रस्ट ने ब्याज मुक्त कर्ज मुहैया कराने में उनकी मदद कर दी, जिससे फीस की बाकी रकम चुकाने में आसानी हो गई। उन्होंने खूब मेहनत की और उनकी प्रतिभा को सम्मान भी मिला। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही जय को रोबोटिक्स के क्षेत्र में तीन राष्ट्रीय और चार राज्य स्तरीय पुरस्कारों से नवाजा गया। 

इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हें प्रतिष्ठित शोध संस्थान 'टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च' (टीआईएफआर) में बतौर रिसर्चर काम करने का मौका मिला। उन्हें 30,000 रुपये का मासिक वजीफा मिलता था। जय कहते हैं, 'हम दोनों के लिए यह काफी बड़ी रकम थी। हमने सबसे पहले खस्ताहाल कमरे की मरम्मत कराई।' जाहिर है, पैसे की कीमत जय जैसों से बेहतर भला कौन समझ सकता है। उन्होंने अमेरिका से मास्टर्स डिग्री के लिए 'जीआरई', 'टीओईएफएल' परीक्षाओं के वास्ते पैसे जोड़ने शुरू कर दिए। इसके लिए अच्छी-खासी रकम चाहिए थी। इस बीच उनके दो पेपर अंतरराष्ट्रीय साइंस जर्नल में भी प्रकाशित हो चुके थे। उन्होंने विदेशी लड़कों को ऑनलाइन कोचिंग देनी शुरू कर दी। साल 2017 में लंदन के प्रतिष्ठित इंपीरियल कॉलेज से उन्हें पहला ऑनलाइन छात्र मिला। बाद में छात्रों की संख्या बढ़ती गई। कोचिंग से हासिल पैसे से जय ने अपने सारे कर्ज चुका दिए हैं।

मजबूत इच्छाशक्ति की बदौलत जय ने हर उस मुकाम को हासिल किया, जिसे उन्होंने कभी चाहा था। अमेरिका की मशहूर वर्जीनिया यूनिवर्सिटी ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें पीएचडी का प्रस्ताव दिया। साथ ही, सालाना करीब 24,000 डॉलर (माह के एक लाख, 40 हजार रुपये से भी अधिक) की स्कॉलरशिप की सुविधा दी गई। कभी 10 रुपये के लिए तरसने वाला बालक आज हिन्दुस्तान के गुदड़ी के लालों के लिए एक नजीर बन गया है। नोबेल विजेता जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा था, 'खुद को पा लेने का नाम जीवन नहीं, अपने आप को गढ़ना ही जिंदगी है।' जयकुमार वैद्य ने इस कथन को चरितार्थ किया है।
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:The spirit of studying brought him to Virginia