फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैजंग के मैदान से शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा फलस्तीनी

जंग के मैदान से शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा फलस्तीनी

इजरायल के उस हवाई हमले में परिवार के 15 सदस्य मारे गए थे, मगर 107 दिनों तक  वह गाजा की जमीनी हकीकत दुनिया के सामने लाते रहे। इजरायली हमले की आलोचना करते हुए भी मोटाज ने इस बात का पूरा खयाल रखा कि उनके

जंग के मैदान से शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा फलस्तीनी
motata ajaija
Monika Minalमोटाज अजैजा, छाया पत्रकारSat, 20 Apr 2024 09:48 PM
ऐप पर पढ़ें

जब चारों तरफ अपनों की लाशें बिखरी हों; अपनी आखिरी सांसें गिनता हुआ खानदान का कोई बुजुर्ग मलबे के नीचे से बचा लेने की कातर पुकार लगा रहा हो और संज्ञा-शून्य नन्ही भांजी या भतीजी एक सवाल अपनी हिचकी में दबाए आपके हाथों में दम तोड़ देती हो कि मैंने तो दुनिया अभी देखी ही नहीं थी, तो आपकी मन:स्थिति कैसी होगी? इससे ज्यादा त्रासद मंजर कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, मगर युद्धग्रस्त इलाकों के बाशिंदों की नियति ऐसे दृश्यों से उनकी मुठभेड़ कराती रहती है। गजब यह हैकि इस कोहराम के बीच भी लोगों को जीना पड़ता है। ऐसे हालात में एक पत्रकार किस साहस से अपने फर्ज को अंजाम देता है, फलस्तीनी पत्रकार मोटाज अजैजा इसकी मिसाल हैं।
शांत इलाकों के नौजवान जिस उम्र में रोमानी दुनिया के हसीन ख्वाब बुना करते हैं, मोटाज ने अपनी जान जोखिम में डालकर फलस्तीन की जमींदोज होती बस्तियों और बमबारी के शिकार बने बेगुनाहों की तस्वीरों से एक तारीखी दस्तावेज तैयार की है। इस काम के लिए उन्हें दुनिया भर से सराहना मिल रही है और अब प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने 2024 की सौ प्रभावशाली शख्सियतों में उनको शुमार किया है।
गाजा पट्टी के दीर अल-बलाह शरणार्थी शिविर में नवंबर 1999 में मोटाज पैदा हुए। जब होश संभाला, तो अपने चारों तरफ तनाव ही पसरा पाया। सुकून और बेफिक्री से शायद फलस्तीनी और इजरायली बच्चों का कम ही साबका पड़ता है। मोटाज जब छह साल के थे, अपनी बस्ती की सड़कों पर उन्होंने इजरायली टैंकों को दौड़ते देखा, जब वह आठ साल के हुए, तो गाजा पट्टी पर अपना दबदबा कायम करने के लिए फलस्तीन के हमास और फतह गुटों के लड़ाकों को एक-दूसरे का खून बहाते देखा, और उसके बाद तो हर दूसरे साल इजरायल-हमास बाकाइदगी से लड़ते-भिड़ते रहे। इन भिड़तों ने ही वहां के बच्चों के भीतर से खौफ को खत्म कर दिया। 
इंसान होने की सिफत बस इतनी बची रही कि तनाव और हिंसा के बीच भी इन इलाकों के शिक्षकों ने अपना धर्म निभाना कभी नहीं छोड़ा और न ही डॉक्टरों ने इलाज करने की अपनी सेवा त्यागी। इसके कारण ही मोटाज जैसे बच्चों का मुस्तकबिल संवरता रहा। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वह गाजा की अल-अजहर यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां अंग्रेजी भाषा में दाखिला मिल गया। यहां पढ़ते हुए ही मोटाज अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन फलस्तीनी रेड क्रिसेंट सोसायटी से जुड़ गए, ताकि रेड क्रॉस के साये में वह बेबस लोगों की कुछ मदद कर सकें।  
साल 2018 की बात है। गाजा-इजरायल सीमा पर चल रहा विरोध-प्रदर्शन देखते-देखते लड़ाई में बदल गया था। मोटाज तब 19 साल के रहे होंगे। रेड क्रिसेंट सोसायटी के बैनर तले राहत कार्य करते समय एक इजरायली स्नाइपर उनकी जांघ को गोलियों से बुरी तरह जख्मी कर गया। मोटाज का जख्म तो कुछ हफ्तों में भर गया, मगर हिंसा मुसलसल जारी रही। उस दारूण अनुभव को उन्होंने इंस्टाग्राम पर साझा किया, जिस पर काफी प्रतिक्रियाएं आईं और इस तरह उनके अंदर एक पत्रकार पैदा हुआ। साल 2021 में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने के बाद मोटाज एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंपनी से जुड़ गए। मगर जल्द ही उनका नया ठिकाना एक अमेरिकी संगठन बना, जो फलस्तीनी शरणार्थियों की खातिर संयुक्त राष्ट्र राहत कोष के लिए धन इकट्ठा करता है।
मोटाज बहुत खुश थे। उन्हें इस संगठन में फोटो और वीडियो प्रोड्यूसर की नौकरी मिली थी। वह अपने गाजा के लिए कुछ करना चाहते थे। आखिर वह उनका घर है। वहां की जिंदगी के विविध रूपों और उसकी विदू्रपताओं को उन्होंने अपने कैमरे से बयां करना शुरू कर दिया। मगर दुर्योग से वह वहशी सुबह जल्द ही आ गई, जिसके प्रतिशोध ने गाजा को अब तक का सबसे बड़ा जख्म दे दिया है। 7 अक्तूबर, 2023 की सुबह इजरायल पर अपने बर्बर हमले से हमास ने असंख्य दुखों को न्योता दे दिया। हमास ने जब इजरायल पर रॉकेट दागे थे, तभी मोटाज को यह लग गया था कि इस बार जंग बहुत महंगी साबित होने वाली है। 
कुछ घंटे बाद ही इजरायली हमले शुरू हो गए थे, भयानक वेग और बर्बरता को समेटे हुए। मोटाज के कैमरे ने उनको फिल्माना शुरू कर दिया। आम फलस्तीनियों की पीड़ा, बेबसी और युद्ध की विडंबना उनकी तस्वीरों व वीडियो के जरिये पूरी दुनिया में पहुंचने लगी। मगर 12 अक्तूबर को उन्होंने जो वीडियो और तस्वीरें डालीं, वे लाखों लोगों को मर्माहत कर गईं। इजरायल के हवाई हमले में उनके परिवार के 15 सदस्य मारे गए थे। अगले 107 दिनों तक वह इसी तरह हकीकत तफसील के साथ दुनिया के सामने लाते रहे। मगर इजरायली हमले की आलोचना करते हुए भी मोटाज ने इस बात का पूरा खयाल रखा कि उनके किसी संदेश से नफरत की बू न आए! 
मगर इजरायली फौज को यह सब नागवार गुजर रहा था। मोटाज को अलग-अलग नंबरों से धमकियां मिलने लगी थीं। घर पर बमबारी का खतरा बढ़ने लगा। अक्तूबर से गाजा में 120 से अधिक पत्रकार मारे जा चुके हैं। ऐसे हालात में मोटाज के लिए एक-एक दिन जब भारी पड़ने लगा, तो उन्होंने मुल्क छोड़ने का फैसला किया। दोनों छोटे भाइयों और माता-पिता के साथ उन्हें गाजा से निकलने की इजाजत मिल गई। मगर 23 जनवरी को गाजा छोड़ते हुए वह काफी गमगीन और कुछ शर्मिंदा भी थे, क्योंकि उन्हें जो सहूलियत मिली, वह उनके देश के तमाम लोगों को हासिल नहीं है। 
मोटाज अभी दोहा में रह रहे हैं। उन्हें जब भी मनोचिकित्सकों से मिलने की सलाह दी जाती है, वह यही कहते हैं, अभी युद्ध-विराम कहां हुआ? वह इस युद्ध के खिलाफ दोहा से भी सक्रिय हैं। मोटाज की बहादुरी ने इंस्टाग्राम पर उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति से भी ज्यादा लोकप्रिय बना दिया है। 
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह