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आओ हम पुल बन जाएं

गिल हिक प्रेरक वक्ता

ऑस्ट्रेलिया में पली-बढ़ी गिल 1991 में उच्च शिक्षा के लिए लंदन आईं। करियर को लेकर उन्होंने बडे़-बड़े सपने देख रखे थे। वह एक सफल उद्यमी बनना चाहती थीं। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। 
पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें लंदन की ब्लूप्रिंट नामक प्रकाशन कंपनी में एक बड़ी जिम्मेदारी मिली। इसके बाद उन्होंने डेंजरस माइंड नामक प्रकाशन हाउस में नौकरी की। शानदार करियर था। पैसे के साथ शोहरत भी मिली। गिल अपनी जिम्मेदारियों को बड़े सुनियोजित ढंग से निभाती थीं। मसलन, उनके पास हमेशा अगले सप्ताह के कामों की सूची रहती थी। किसके साथ र्मींटग करनी है, अगले प्रोजेक्ट की डेडलाइन क्या है, आदि-आदि। ये सारी बातें वह एक डायरी में नोट करके छोटे से ब्रीफकेस में रखती थीं। दरअसल, यह उनका ऑफिस बैग था, जिसे वह रोजाना अपने संग लेकर चलती थीं। अचानक एक दिन सब बदल गया। 
रोजाना की तरह ही गिल उस दिन मेट्रो ट्रेन से ऑफिस जा रही थीं। तारीख थी 7 जुलाई, 2005। समय सुबह 8 बजकर, 50 मिनट। मेट्रो में हर कोई अपने मोबाइल या लैपटॉप में खोया था। हर किसी को अपने स्टेशन का इंतजार था। अचानक तेज आवाज हुई। मेट्रो के अंदर अंधेरा धुआं छा गया। किसी को कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ? लंदन में सीरियल धमाकों की खबर पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। उन धमाकों में करीब 700 लोग घायल हुए और 52 मारे गए थे। होश आया, तो सामने अंधेरा था। गिल बताती हैं, एक सेकंड में सब कुछ खत्म हो गया। चारों तरफ गहरा अंधेरा था। लोग चीख रहे थे।  
गिल ने हाथ से कुछ टटोला। उनका ऑफिस ब्रीफकेस वहां नहीं था, जिसमें उनकी डायरी रहती थी। वह खडे़ होकर चलना चाहती थीं, पर महसूस हुआ कि कमर के नीचे का हिस्सा बिल्कुल सुन्न है। थोड़ी देर में राहतकर्मी कोच में घुसे। उन्हें देखकर गिल चिल्लाईं- मैं यहां हूं। मैं जीवित हूं। मुझे बचाओ। राहतकर्मी अपनी जान खतरे में डालकर लोगों की मदद कर रहे थे। कुछ लोग रोते-बिलखते पीड़ितों को सांत्वना दे रहे थे। राहतकर्मी बड़ी सावधानी से गिल को उठाकर मेट्रो कोच से बाहर लाए। अस्पताल ले जाते समय उन्होंने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि उन्हें बिल्कुल धक्का न लगे। गिल बताती हैं- राहतकर्मी किसी घायल की मदद करने से पहले यह नहीं देखते कि वह गोरा है या काला। गरीब है या अमीर। उनके लिए हर घायल एक इंसान है। उनका सेवाभाव देखकर जिंदगी के प्रति मेरा नजरिया बदल गया।
अस्पताल पहुंचने तक हालत काफी खराब हो चुकी थी। वह डॉक्टर को अपना नाम भी नहीं बता सकीं। उन्हें अनाम महिला के रूप में भर्ती किया गया। बम धमाकों में दोनों पैर बुरी तरह जल चुके थे। इंफेक्शन शरीर में न पहुंचे, इसलिए तुरंत ऑपरेशन करना पड़ा। दोनों पैर कट गए। मुझे लगा, इससे बेहतर तो मर जाती। 
अस्पताल से लौटने के बाद गिल घोर निराशा में जी रही थीं। ऑफिस जाना बंद हो गया। लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया। गिल कहती हैं- मुझे लगता था कि भगवान ने मुझे अपाहिज क्यों बना दिया? एक दिन मैंने खुद से पूछा कि क्या रोने-चिल्लाने से मेरे पैर वापस आ जाएंगे? जवाब था नहीं, और मेरी नई जिंदगी शुरू हो गई। 
गिल अब उन लोगों के बारे में सोचने लगीं, जो हादसे के बाद बिना किसी स्वार्थ के घायलों की मदद कर रहे थे। वे किसी के रिश्तेदार नहीं थे, बस इंसानियत के नाते मदद कर रहे थे। इसलिए उन्होंने तय किया कि वह अपने गम भूलकर दुनिया भर में इंसानियत का पैगाम फैलाएंगी। पर समाज के लिए कुछ करने से पहले खुद को यह यकीन दिलाना जरूरी था कि बाकी महिलाओं की तरह वह भी एक सामान्य महिला हैं। अपाहिज होने का मतलब यह कतई नहीं कि जीवन खत्म हो गया। हादसे के पांच महीने बाद उन्होंने शादी की। 2008 में उन्होंने लंदन धमाकों पर किताब लिखी वन अननोन। 2011 में उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया।  
गिल अब पहले की तरह खुद के लिए नहीं जीना चाहती थीं। उनकी डायरी में अब एक नया एजेंडा था, इंसानियत का प्रचार। साल 2007 में उन्होंने एक गैर-सरकारी संस्था की नींव रखी। मकसद था सामाज में सौहार्द फैलाना। उनके प्रेरक भाषण लोकप्रिय होने लगे। इस बीच उन्होंने कई सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर शांति-सौहार्द के लिए काम किया। 2009 में उन्हें ऑस्ट्रेलियन वुमेन ऑफ द ईयर अवॉर्ड मिला। 2013 र्में ंकग्सटन यूनिवर्सिटी ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 
वर्ष 2015 में सिडनी के एक कैफे में धमाका हुआ। इस घटना ने उन्हें लंदन धमाकों की याद दिला दी। गिल ने इंटरनेट पर हैशटैग ‘बी द ब्रिज’ अभियान छेड़ा। इसका मकसद लोगों के बीच प्रेम और विश्वास को बढ़ाना था। इस अभियान को लोगों का अपार समर्थन मिला। 2014 में उन्हें साउथ ऑस्ट्रेलियन ऑफ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 9 december