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मुझे जबरन बालिका वधू बनाया गया 

जीना इसी का नाम है

यह कहानी हरियाणा के एक छोटे से गांव बेड़वा की है। यहां अक्सर स्थानीय पहलवानों के बीच दंगल हुआ करते थे। जब भी गांव या उसके आस-पास कहीं पहलवानी होती, तो बच्चों-बूढ़ों का हुजूम उमड़ पड़ता था उसे देखने। इस भीड़ में नन्ही नीतू भी शामिल रहती थीं। बड़ा मजा आता था इस खेल में। मन में सपना पनपने लगा कि मैं भी बड़ी होकर पहलवान बनूंगी। पर घरवालों ने कुछ और ही सोच रखा था। 
नीतू तब महज 13 साल की थीं, तभी  उनके अनपढ़ माता-पिता ने 45 साल के एक आदमी के साथ उनकी शादी तय कर दी। वह बहुत गिड़गिड़ाईं कि मुझे ससुराल मत भेजो, पर घरवाले नहीं माने। ससुराल के हालात भयावह थे। पति मानसिक रूप से अस्वस्थ भी था। एक पल भी चैन से नहीं गुजरा वहां। हर समय दहशत रहती थी मन में। नीतू के प्रति ससुराल के बाकी लोगों का रवैया भी अच्छा नहीं था। ससुर उसके दादा की उम्र के थे, लेकिन वह नीतू को गलत निगाह से देखते थे। नीतू उससे दूर रहा करतीं। 
शादी हुए मुश्किल से एक हफ्ता बीता था। वह घर में अकेली थीं। अचानक ससुर ने उनके साथ दुष्क र्म करने की कोशिश की। पता नहीं, उस पल उनके अंदर कहां से इतनी हिम्मत आ गई! खुद को ससुर के चंगुल से बचाकर भाग निकलीं। किसी तरह पिता के घर पहुंचीं। सोचा कि जब मां और पापा को इस घटना के बारे में पता चलेगा, तो वे उनका साथ देंगे। लेकिन घरवालों ने हमदर्दी जताने की बजाय उलटा डांट लगाई। नीतू कहती हैं, 13 साल में ही शादी कर दी गई। वह मेरे जीवन का सबसे खराब दिन था। एक हफ्ते बाद ही मैं वहां से भाग आई।
मां को एक ही चिंता थी कि जब गांव में यह खबर फैलेगी कि इनकी बेटी ससुराल से भाग आई, तो बड़ी बदनामी होगी। वह चाहती थीं कि किसी तरह बेटी को दोबारा ससुराल भेज दिया जाए, पर नीतू किसी हालत में पति के घर जाने को राजी नहीं हुईं। मायके में भी दिन अच्छे नहीं बीते। हर समय उन्हें टोका जाता। पिताजी किसी हालत में बेटी को घर पर बिठाने को राजी नहीं थे। इसलिए जल्द ही उनकी दूसरी शादी करा दी गई। अब नीतू के पास कोई रास्ता नहीं था। उन्हें अपने नए ससुराल जाना ही पड़ा।  
यहां भी हालात अच्छे नहीं थे। पति के पास नौकरी नहीं थी। घर का खर्च सास की पेंशन से चलता था। पर नीतू को कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि इस पति का व्यवहार उनके प्रति अच्छा था। वह उनके दर्द को समझता था। 14 साल की उम्र नीतू जुड़वा बच्चों की मां बन गईं। बच्चे होने के बाद घर का खर्च बढ़ गया। नीतू को सास से पैसे मांगना अच्छा नहीं लगता था। वह कुछ करना चाहती थीं। परिवार के पास न खेत थे और न जमीन। कुछ दिनों तक उन्होंने दूसरे के खेतों में मजदूरी की और फिर कपडे़ सिलकर गुजारा किया। पर इससे कुछ खास कमाई नहीं हो पाती थी। उनके मन में अजीब सी तड़प थी। वह घर के हालात बदलना चाहती थीं। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? 
एक दिन बातचीत में उन्होंने पति से कहा कि काश, मैं कुश्ती सीख पाती! मैं बचपन से पहलवान बनना चाहती थी, लेकिन मौका नहीं मिला। पति ने कहा कि अब भी देर नहीं हुई है। तुम अब भी अपना सपना पूरा कर सकती हो। हालांकि सास को पहलवान बनने का बहू का इरादा बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। पर नीतू तय कर चुकी थीं कि उन्हें कुश्ती की ट्रेनिंग लेनी है। यह 2011 की बात है। तब वह मात्र 17 साल की थीं और उनके बच्चे तीन साल के थे।  
गांव के अखाडे़ में पुरुषों का वर्चस्व था। इसलिए पहली बार जब वह वहां ट्रेनिंग के लिए पहुंचीं, तो उन्हें रोका गया। पर नीतू ने इन बातों को नजरअंदाज किया। अब पहली चुनौती थी, वजन कम करना और शरीर को मजबूत बनाना। उन्हें रोजाना दो घंटे दौड़ने की सलाह दी गई, पर मन में डर था कि गांव वालों ने उन्हें दौड़ते हुए देखा, तो वे मजाक उड़ाएंगे।
इसलिए वह रात के तीन बजे उठकर दौड़ती थीं और सुबह पांच बजे तक घर लौट आती थीं, ताकि कोई देख न पाए। नीतू कहती हैं, मुझे बचपन से ही कुश्ती का शौक था। मैं पहलवान बनना चाहती थी, पर मुझे बालिका-वधू बना दिया गया। मुझे पढ़ने का मौका भी नहीं मिला।
गांव में शुरुआती अभ्यास के बाद वह रोहतक एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए पहुंचीं। रोहतक उनके गांव से करीब 50 किलोमीटर दूर था। नीतू बताती हैं, मुझे करीब दो साल तक अपने बच्चों से दूर रहना पड़ा। पिता ने उनकी देखभाल की। जब भी ट्रेनिंग से फुरसत मिलती थी, मैं भागकर गांव चली जाती थी। 
दो साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें नेशनल गेम्स में खेलने का मौका मिला। पहली ही स्पद्र्धा में उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। इस कामयाबी के बाद नीतू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेल कोटे से सशस्त्र सीमा बल में नौकरी मिल गई। 2015 में नेशनल गेम्स में सिल्वर मेडल जीता। हाल में उन्होंने अंडर-23 नेशनल रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड जीता। अब वह नवंबर में होने वाली अंडर-23 वल्र्ड चैंपियनशिप की तैयारी में जुट गई हैं। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 7 october