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नफरत से नहीं प्यार से चलती है दुनिया

जेसिंडा का जन्म एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। पिता सरकारी विभाग में लॉ एनफोर्समेंट ऑफिसर थे। बाद में वह निउ आईलैंड में कमिश्नर नियुक्त हो गए। इसी दौरान उनका परिवार दक्षिण-पूर्व ऑकलैंड में आकर रहने लगा। जेसिंडा ने शुरुआती पढ़ाई यहीं की। स्कूल के दिनों से ही उनके अंदर बुजुर्ग और बीमार लोगों के प्रति गहरी संवेदना थी। एक बार स्कूल से लौटते समय उन्होंने कुछ बच्चों को नंगे पांव सड़क पर जाते हुए देखा। उनके नन्हे दिमाग में ढेरों सवाल उठने लगे। आखिर इन बच्चों के हालात इतने खराब क्यों हैं? मम्मी-पापा से बात की, तो उन्हें गरीबी व भुखमरी जैसी समस्याओं के बारे में जानने का मौका मिला। पापा ने हमेशा उन्हें दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित किया। 
एक वाकया 1999 का है। जेसिंडा तब 17 साल की थीं। उन दिनों उनकी मौसी लेबर पार्टी के उम्मीदवार हैरी डूनहोवन के चुनाव अभियान में सक्रिय थीं। उनके पास बहुत काम था। मौसी ने उनसे पूछा, क्या चुनाव प्रचार के काम में तुम मेरी मदद करोगी? जेसिंडा तुरंत तैयार हो गईं, क्योंकि यह उनका मनपंसद काम था। 
चुनाव अभियान के दौरान उन्हें तमाम सियासी और सामाजिक मसलों को जानने का मौका मिला। यहीं से उनके अंदर सियासत को लेकर दिलचस्पीबढ़ने लगी। सामाजिक कार्य के साथ उनकी पढ़ाई भी जारी रही। वर्ष 2001 में उन्होंने वैकेटो यूनिवर्सिटी से कम्यूनिकेशन स्टडीज में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में बतौर शोधकर्ता काम करने लगीं। कुछ समय बाद उन्हें ब्रिटेन जाने का मौका मिला। वहां वह तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की नीति सलाहकार पैनल में रहीं। वर्ष 2008 में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ सोशलिस्ट यूथ की अध्यक्ष चुनी गईं। 
जेसिंडा तय कर चुकी थीं कि उन्हें सियासत में जाना है। उनका मानना था कि इसी रास्ते वह जन-समस्याओं का प्रभावी ढंग से हल कर पाएंगी। 2008 में वह लेबर पार्टी की तरफ से चुनाव में उतरीं और बड़ी जीत हासिल की। बतौर सांसद उन्होंने महिलाओं व बच्चों के लिए काफी काम किया। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और पार्टी में उनका कद भी बढ़ता गया। अगस्त 2017 में लेबर पार्टी ने उन्हें उपाध्यक्ष चुना। यह वह दौर था, जब न्यूजीलैंड में चुनाव होने वाले थे। जनता के बीच पार्टी की छवि खराब होती जा रही थी। ज्यादातर सर्वे में जनता की राय पार्टी के खिलाफ थी। मुश्किल दौर में जेसिंडा ने पार्टी की कमान संभाली और जमकर प्रचार किया। उनका पूरा फोकस सामाजिक समरसता और महिला विकास पर था।  
सितंबर 2017 में चुनाव हुए और लेबर पार्टी ने 46 सीटें जीतीं, जबकि द नेशनलिस्ट पार्टी को 56 सीटें मिलीं। किसी पार्टी के पास बहुमत नहीं था, लिहाजा गठबंधन सरकार बनी। सवाल था, प्रधानमंत्री कौन बनेगा? कई बड़े नेताओं के नाम सामने आए, पर ज्यादातर सांसदों ने जेसिंडा के नाम पर सहमति जताई। इस तरह 37 साल की उम्र में ही वह न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री बन गईं। उन्हें दुनिया की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री होने का रुतबा हासिल है। 
कम उम्र होने की वजह से उन पर सवाल उठे, पर उन्होंने सभी आशंकाओं को गलत साबित किया। जनवरी 2018 में उन्होंने एलान किया कि वह मां बनने वाली हैं। साथ ही यह वादा भी किया कि पारिवारिक दायित्व की वजह से वह प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियों से समझौता नहीं करेंगी। उन्होंने ऐसा किया भी। बेटी के जन्म के दौरान उन्होंने छह सप्ताह की छुट्टी ली और फिर अपनी जिम्मेदारी निभाने प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंच गईं। जेसिंडा कहती हैं, मां बनने के बाद महिला की ताकत बढ़ जाती है।  दुनिया भर में तमाम महिलाएं घर के साथ दफ्तर की जिम्मेदारी संभालती हैं। मैं भी उनमें से एक हूं। 
प्रधानमंत्री बनने के बाद जेसिंडा ने कभी वीआईपी की तरह व्यवहार नहीं किया। तमाम अहम मौके पर उन्होंने जनता के दुख-दर्द बांटे। पिछले महीने जब न्यूजीलैंड की मस्जिदों पर आतंकी हमला हुआ, तो उन्होंने दहशतगर्दों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि वह किसी धर्म विशेष के खिलाफ नफरत बर्दाश्त नहीं करेंगी। यही नहीं, अगले दिन वह अपने सिर को पल्लू से ढंककर पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचीं और उन्हें यकीन दिलाया कि उनकी सरकार हर समुदाय की सुरक्षा करने में सक्षम है। पूरी दुनिया में उनके इस कदम की तारीफ हुई। तिब्बतों के धार्मिक गुरु दलाई लामा ने उनकी तारीफ करते हुए कहा, जेसिंडा ने जिस समझदारी के साथ सौहार्द और शांति का संदेश दिया, वह काबिले तारीफ है। मैं उनका प्रशंसक हूं। 
हाल में एक और दिलचस्प वाकया सामने आया। जेसिंडा शॉपिंग मॉल में खरीदारी करने गई थीं। बिल अदा करने के लिए वह लाइन में खड़ी थीं। उनके आगे खड़ी महिला की जब बिल अदा करने की बारी आई, तो पता चला कि वह अपना पर्स घर भूल आई है। उसके साथ दो बच्चे भी थे। उसे परेशान देखकर जेसिंडा ने बिना कहे उसका बिल अदा कर दिया। बाद में सोशल मीडिया पर उनकी खूब तारीफ हुई।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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