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मेरी विरासत संभालकर रखना 

हिन्दुस्तान

वह आजादी के बाद का दौर था। आदिवासी इलाकों में बेटियों के स्कूल जाने का चलन नहीं के बराबर था। लेकिन केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के कल्लार के जंगल में रहने वाली नन्ही बच्ची लक्ष्मीकुट्टी ने जिद पकड़ ली कि उसे स्कूल जाना है। पिताजी परेशान थे। गांव की कोई लड़की स्कूल नहीं जाती थी। अकेली बेटी 10 किलोमीटर दूर अकेले कैसे जाएगी? कुछ समझ नहीं आ रहा था उन्हें।  
आखिरकार वह बेटी की जिद के आगे हार गए। यह 1950 की बात है। लक्ष्मीकुट्टी स्कूल जाने लगीं। केरल में स्कूल जाने वाली वह जनजातीय समुदाय की पहली लड़की थीं। गांव से सिर्फ तीन बच्चे स्कूल जाते थे- वह और दो लड़के। लक्ष्मीकुट्टी बताती हैं, मैंने पिताजी को मना लिया। वह खुद मेरा दाखिला कराने स्कूल गए। हैरान हूं, मैं यह सब कर पाई। पढ़ाई में उनका खूब मन लगता था। स्कूल में हमेशा अव्वल रहीं। हालांकि वह  आठवीं तक ही पढ़ पाईं, क्योंकि इससे आगे की पढ़ाई के लिए दूर-दूर तक स्कूल न था। पढ़ाई के अलावा उन्होंने घर में ही वन-औषधियों का ज्ञान हासिल किया।
उनकी मां गांव में दाई का काम करती थीं। वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर प्रसव को लेकर उनकी जानकारी अद्भुत थी। आस-पास के इलाकों में उन्होंने सैकड़ों गर्भवती महिलाओं का सफल प्रसव कराया। वह इलाके की सबसे पसंदीदा दाई थीं। मां को जंगल की जड़ी-बूटियों का ज्ञान भी था। वह तमाम बीमारियों का इलाज जानती थीं। लक्ष्मीकुट्टी जड़ी-बूटियों से दवाएं बनाने और मरीजों की देखभाल में मां की मदद करती थीं। धीरे-धीरे उन्हें भी तमाम औषधियों का ज्ञान हो गया। बाद में उन्होंने अपने शोध के आधार पर जड़ी-बूटियों से कई नई दवाएं बनाईं। मां ने इस काम उनकी बहुत मदद की। 
सोलह साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। पति रिश्ते में उनके चचेरे भाई लगते थे। उनके समाज में इस तरह की रिश्तेदारी में शादी का चलन था। लक्ष्मीकुट्टी बताती हैं, मैं अपने पति को शादी से पहले जानती थी। वह मेरे अच्छे दोस्त थे। उन्होंने हर फैसले में मेरा साथ दिया। वह कहते थे कि मैं एक मजबूत महिला हूं। लक्ष्मीकुट्टी  खुद 8वीं के बाद नहीं पढ़ पाईं, पर अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया। बच्चों ने भी मां की इच्छा के मुताबिक मन लगाकर पढ़ाई की, पर वे लंबे समय तक मां के संग नहीं रह पाए। लक्ष्मीकुट्टी बताती हैं, मेरे बड़े बेटे को जंगली हाथी ने कुचलकर मार दिया। वह मेरे जीवन का सबसे दुखद पल था। मैंने किसी तरह खुद को संभाला, लेकिन एक और हादसे में छोटा बेटा भी चला गया। इन घटनाओं ने मुझे बेबस कर दिया। बेटों के जाने के बाद लक्ष्मीकुट्टी उदास रहने लगीं। उस मुश्किल घड़ी में पति ने उन्हें संभाला और कविताएं लिखने को प्रेरित किया। वह व्यंग्य-कविताएं लिखने लगीं। उनकी लेखनी में आदिवासी संस्कृति और जंगल प्रेम की झलक मिलती है।
उन्होंने औषधि बनाने का सिलसिला जारी रखा। मां से सीखा ज्ञान उनके बहुत काम आया। सांप कांटने और जंगली कीड़े-मकौड़ों के जहर को खत्म करने के बेजोड़ नुस्खे थे उनके पास। दूर-दूर से लोग उनसे जहर उतरवाने आने लगे। इलाज के दौरान लक्ष्मीकुट्टी अपने रोगियों के साथ एक ट्रेंड नर्स की तरह व्यवहार करती हैं, जबकि उन्होंने कभी नर्स की ट्रेनिंग नहीं ली। यह गुण भी उन्होंने मां से सीखा। कुछ लोग प्यार से उन्हें ‘वनमुतशी’ बुलाते हैं। मलयालम में इसका मतलब है- जंगल की बड़ी मां।
पूरे केरल प्रांत में उनकी चर्चा होने लगी। तमाम संस्थाओं ने उनकी दवाओं को इलाज के पैमाने पर खरा पाया। लक्ष्मीकुट्टी कहती हैं, मैंने याददाश्त के आधार पर करीब 500 दवाएं तैयार की हैं। अच्छा होगा, इन औषधियों की जानकारी लिखित दर्ज हो, ताकि मेरे जाने के बाद यह ज्ञान खत्म न हो। वर्ष 1995 में उन्हें राज्य सरकार ने नट्टू वैद्य रत्न अवॉर्ड से सम्मानित किया। अवॉर्ड मिलने के बाद राज्य के बाहर भी वह मशहूर हो गईं। लक्ष्मीकट्टू कहती हैं, पहले मेरे पास सिर्फ मरीज आते थे, बाद में लोग मुझसे मिलने आने लगे। वे मुझसे वन-औषधियों के बारे में पूछते हैं। मुझे अच्छा लगता है कि लोग जागरूक हो रहे हैं। 
केरल से बाहर कई संस्थाओं ने उन्हें प्राकृतिक चिकित्सा पर भाषण देने के लिए  बुलाया। शुरुआत में उन्हें भीड़ के सामने बोलने में हिचक होती थी, पर बाद में वह धाराप्रवाह बोलने लगीं। लक्ष्मीकुट्टी बताती हैं, मेरा पूरा जीवन जंगल में बीता है, इसलिए मैं यहां के हर पौधे और जड़ी-बूटियों से परिचित हूं, पर बाहर को लोगों को वन-औषधि के बारे में जानकर अचरज होता है। मैं चाहती हूं कि लोगों को इस बात का एहसास हो कि जंगल हमारे जीवन के लिए कितने जरूरी हैं। केरल वन विभाग उनके औषधि ज्ञान को किताब में संकलित कर रहा है। साल 2016 में उन्हें भारतीय जैव विविधता कांग्रेस ने सम्मानित किया। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो प्रोग्राम मन की बात  में उनकी तारीफ की। इस साल उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है। 
प्रस्तुति : मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 6 may