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अब चुप न रहें लड़कियां  

तराना बुर्के मी-टू अभियान की संस्थापिका 

बरसों पहले तराना के पूर्वज अफ्रीका छोड़कर अमेरिका आए और यहीं बस गए। जाहिर है, शुरुआती दिन अच्छे नहीं रहे। अश्वेत होने के कारण नस्ली भेदभाव सहना पड़ा। मगर वे डटे रहे। यह वह दौर था, जब महान समाज सुधारक मार्टिन लूथर किंग नीग्रो समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे। तराना मार्टिन लूथर किंग के तमाम किस्से सुनकर बड़ी हुईं। उनका परिवार मध्यवर्गीय था। सामाजिक मुद्दों को लेकर मां बहुत जागरूक थीं। शायद बरसों बाद भी उनमें नस्ली भेदभाव को लेकर असुरक्षा की भावना गहरी थी। वह नहीं चाहती थीं कि उनके बच्चों को इससे जूझना पडे़। वह जानती थीं, असुरक्षा को दूर करने का एक ही जरिया है, वह है शिक्षा। 
तराना ने जब स्कूल जाना शुरू किया, तो मां को उनकी बहुत फिक्र थी। वह नहीं चाहती थीं कि श्वेत बच्चे उनकी अश्वेत बच्ची को चिढ़ाएं या परेशान करें। इसलिए उन्होंने बेटी को समझाया कि कोई कुछ भी कहे, तुम रोना मत। हमेशा डटकर खड़ी रहना। इस तरह जिंदगी बढ़ने लगी। तराना तब 12 साल की रही होंगी। एक दिन अचानक एक परिचित शख्स ने उन्हें अकेला पाकर जकड़ लिया। मासूम तराना कांपने लगीं। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। मन में डर था कि अगर शिकायत की, तो लोग उन्हें ही गलत समझेंगे। कई दिनों तक वह चुप रहीं। मगर वह उस शख्स को सजा दिलाना चाहती थीं। इसलिए मदद के लिए पड़ोस के हेल्प सेंटर पहुंचीं। यह सेंटर यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की मदद के लिए बना था। पर सेंटर ने मदद करने से इनकार करते हुए उन्हें पुलिस स्टेशन जाने की सलाह दी। तराना बताती हैं, मैं हेल्प सेंटर पहुंची। वहां एक श्वेत महिला बैठी थी। उसने मुझे अपने कमरे के अंदर आने तक की इजाजत नहीं दी। अंदर से ही कहा, हम पुलिस के रेफरेन्स के बिना केस नहीं लेते। 
अब तराना रोती हुई मां के पास पहुंचीं और पूरा वाकया सुनाया। मां नहीं चाहती थीं कि बेटी कमजोर पडे़। उन्होंने समझाया कि तुम अकेली नहीं हो। तमाम लड़कियां यह दर्द सहती हैं, पर  उन्हें न्याय नहीं मिल पाता। यह रोने का वक्त नहीं है। हमें अब यह सोचना है कि दूसरी लड़कियों की मदद कैसे की जाए? तराना बताती हैं, मां ने मुझे संभाला। उन्होंने मुझे संघर्ष करने को प्रेरित किया। मैं 18 साल की उम्र से ही सामाजिक अभियान से जुड़ गई।  
मां ने बड़ी समझदारी से बेटी को नई दिशा दे दी। इस बीच तराना अल्बामा स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगीं। कॉलेज के दिनों से ही वह नस्ली भेदभाव को खिलाफ सक्रिय रहीं। कॉलेज छात्रों के साथ मिलकर तमाम प्रदर्शन किए। जब कभी यूनिवर्सिटी में किसी लड़की के साथ कुछ गलत होता, तो तराना मदद के लिए तुरंत पहुंच जातीं। डिग्री हासिल करने के बाद उनका सामाजिक आंदोलन और तेज हो गया। 
मां ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। 2003 में उन्होंने ‘जस्ट-बी’ नाम की संस्था बनाई। यह संस्था 12 से 18 साल की अश्वेत लड़कियों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए काम करती है। इसी दौरान उनकी मुलाकात 13 साल की एक लड़की से हुई। तराना बताती हैं, उस बच्ची ने बताया कि उसका सौतेला पिता उसे गलत तरीके से छूता है। बच्ची की हिम्मत नहीं थी कि वह अपनी मां को यह बता पाए। उसे सुनकर लगा कि यह सब तो मेरे साथ भी हुआ है। मैं भावुक हो गई। बच्ची तो अपनी कहानी सुनाकर वापस चली गई। दोबारा उससे संपर्क नहीं हो पाया। पर मुलाकात के कई महीने बाद भी वह उसे भूल नहीं पाईं। एक दिन उसे याद करते हुए उन्होंने एक कागज का टुकड़ा हाथ में लिया और उस पर लिखा, मी-टू। यानी ऐसा मेरे साथ भी हुआ। इस तरह, 2006 में मी-टू अभियान की शुरुआत हुई। तराना बताती हैं, मी-टू का मकसद पीड़ित महिलाओं को हिम्मत देना है। उन्हें एहसास कराना है कि वह अकेली नहीं हैं। हमने ऑनलाइन अभियान शुरू किया। इसके तहत यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियां सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा करने लगीं।  
मी-टू अभियान ने तमाम लड़कियों को हिम्मत दी। अमेरिका में यह अभियान करीब दस साल तक चला, लेकिन 2017 में यह अचानक सुर्खियों में तब आया, जब कई हॉलीवुड अभिनेत्रियों ने मी-टू हैशटैग का इस्तेमाल करते हुए निर्माता-निर्देशक हार्वे वेंस्टीन पर अपने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। इसके बाद तो हॉलीवुड की तमाम अभिनेत्रियों ने खुलकर अपनी दास्तानें सुनाईं और कई हाई-प्रोफाइल मर्दों को बेनकाब किया। धीरे-धीरे यह अभियान पूरी दुनिया में फैल गया। तराना को  2017 में टाइम पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया। इस समय वह गल्र्स फॉर जेंडर इक्यूटी संस्था की निदेशक हैं। पिछले साल तराना को प्राइज ऑफ करेज अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। तराना कहती हैं, बलात्कार और छेड़छाड़ के ज्यादातर मामलों में लड़की खुद को दोषी मानने लगती है। मैं उसे बताना चाहती हूं कि गलती तुम्हारी नहीं है। गलत वह है, जिसने तुम्हारा उत्पीड़न किया। तुम्हें लजाने की जरूरत नहीं है। खुलकर दुनिया को बताओ कि तुम्हारे साथ किसने गलत किया?
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 6 january