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छोटी-छोटी बचत और नियति से मुठभेड़

तमिलनाडु के घने जंगलों में बसा है पुल्लूचेरी। हिन्दुस्तान के सुदूर इलाकों में बसे गांव-बस्ती की तरह पुल्लूचेरी तक पहुंचने से पहले ही तरक्की की सड़़क खत्म हो जाती थी। मदुरई से करीब 15 किलोमीटर दूर बसे इसी गांव की हैं चिन्ना पिल्लई। चिन्ना सिर्फ 12 साल की थीं, जब उनकी शादी कर दी गई और थोड़े दिनों बाद ही उन्हें अलागर कोविल गांव के खेतों में मजदूरी के लिए ले जाया गया। वहां के खेतों में काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक आस-पास की बस्तियों से आते थे। इनमें चिन्ना का गांव भी शामिल था।
एक के बाद एक चिन्ना दो बेटे और तीन बेटियों की मां बन गईं, और उनकी जिंदगी बेबस खेतिहर मजदूरों की तरह जमींदारों और साहूकारों की उधारी व कर्ज तले दबती चली गई। चिन्ना और पति पेरुमल जी-तोड़ खेतों में मेहनत करते, मगर कर्ज कम होने का नाम ही न लेता। साहूकार बेबस मजदूरों से तीन सौ गुना सूद वसूलते थे, मगर कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। खेत मालिक भी बहुत कम मजदूरी देते थे। चिन्ना को यह सब मंजूर न था। वह कहती हैं- ‘मैं अपने खेत मालिक से लगातार विनम्रता के साथ दोहराती रहती कि वह हम सबकी दिहाड़ी बढ़ा दें। कुछ इससे नाराज भी हो गए, मगर यह हमारा हक था और हम अपना हक ही तो मांग रहे थे।’
चिन्ना अपने जैसी महिला मजदूरों की टीम लीडर थीं, और उन सबकी स्थिति लगभग एक जैसी थी। क्योंकि वे सब असंगठित थीं, इसलिए वे खेत मालिकों पर कोई दबाव भी नहीं बना सकती थीं। चिन्ना ने इस नियति से मुठभेड़ का इरादा बांधा। उन्होंने 1990 में छोटी-छोटी बचत के जरिए अपने भविष्य को सुरक्षित करने की मुहिम शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपने समूह की महिलाओं को सबसे पहले भरोसे में लिया। 15 महिलाओं ने 20 रुपये महीना बचाना शुरू किया। जो पैसे जमा होते, वे समूह की किसी जरूरतमंद महिला को कर्ज के रूप में दिए जाते और उस महिला को उस पर 60 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होता। साहूकारों के 300 प्रतिशत के मुकाबले यह छोटी ब्याज दर थी।
चंद महीनों में ही यह स्वयं सहायता समूह ‘कलंजियम’ लोगों में अपना भरोसा बढ़ाता गया और चिन्ना की कोशिशों ने आहिस्ता-आहिस्ता उनके समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भर बना दिया। आलम यह था कि सदस्य न सिर्फ आपात स्थिति में कर्ज लेते, बल्कि छोटे-मोटे करोबार के लिए भी वे इसकी मदद लेने लगे। धन फाउंडेशन से जुड़ने के बाद इस स्वयं सहायता समूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगभग तीन दशक पहले चिन्ना पिल्लई ने पुल्लूचेरी की गरीब औरतों को सशक्त बनाने का जो बीज बोया था, वह अब 13 राज्यों के 12 लाख परिवारों का विशाल वृक्ष बन गया है।
शुरू-शुरू में तो महिलाओं के पति इस मुहिम का विरोध करते थे, क्योंकि उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा था, फिर इसकी बैठकों में भाग लेने के लिए कई बार वे खाना पकाने में देर कर देती थीं, इसलिए भी वे नाराज हो जाते, लेकिन फिर वे खुद उन्हें अपनी साइकिल पर बिठाकर लाने लगे। चिन्ना चाहती हैं कि महिलाएं इतनी सबल हों कि वे अपने परिवार और संतान का भविष्य संवार सकें। वह इसके लिए शिक्षा को बहुत अहम मानती हैं। उन्हें खुद तो पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला, लेकिन उनकी दूरदर्शिता ने उनके बच्चों को तालीम से महरूम नहीं होने दिया। वह कहती हैं- ‘बदलाव का सबसे बड़ा औजार है शिक्षा। मैं चाहती हूं कि हमारी अगली पीढ़ी इतनी सुशिक्षित और सशक्त हो कि कोई उसके भरोसे का फायदा न उठा सके। मैं चाहती हूं कि देश के किसी भी गरीब को अपनी आर्थिक बदहाली के कारण गरिमामय जिंदगी जीने से वंचित न रहना पड़े।’ 
चिन्ना को एक-एक लाख रुपये के तीन पुरस्कार मिले। उन्होंने उनकी आधी रकम अपने पास रखी और आधी अपने आंदोलन को दान में दे दी। इनमें से एक पुरस्कार उन्हें जनवरी 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों मिला था। वह पुरस्कार था- स्त्री शक्ति पुरस्कार। उनकी ख्याति से ईष्र्यालु लोगों ने परेशान करने का मौका तब भी नहीं छोड़ा। वह याद करती हैं कि उन्हें यह सम्मान लेने दिल्ली जाना था, तो कहा गया कि आप विमान से जाएंगी, तो आपको दिल का दौरा पड़ जाएगा और मुझे टे्रन से ले जाया गया। लेकिन इस पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री ने जो किया, उसने देश-दुनिया में चिन्ना को श्रद्धा के आसन पर बिठा दिया। दरअसल, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहते हुए चिन्ना के पैर छू लिए थे कि ‘मैं चिन्ना में शक्ति देखता हूं।’
चिन्ना की ख्याति ने उनके गांव और समुदाय को देश भर में नाम और सम्मान दिलाया है। उन्हें जानकी देवी बजाज पुरस्कार के अलावा तमिलनाडु सरकार के प्रतिष्ठित अवैयार अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। अभी हाल ही में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। सम्मान मिलने के बाद चिन्ना के अल्फाज थे- दुनिया में मशहूर तो मैं अटलजी के कारण ही हुई।
प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह    

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 5 may