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एक कामयाबी सपने जैसी

कौशर बिरकर फील्ड मेडल विजेता

बिरकर का बचपन ईरान र्के ंहसाग्रस्त मारीवान प्रांत में बीता। उनका घर ईरान-इराक सीमा के करीब था। यह कुर्द बहुल इलाका था। पिता किसान थे। छह भाई-बहनों वाले इस परिवार का गुजारा खेती पर निर्भर था।
बात 1980 की है। बिरकर तब दो साल के थे। ईरान में हुई इस्लामी क्रांति की वजह से पड़ोसी मुल्क इराक भारी तनाव में था। हालात बिगड़ते गए। चारों तरफ खौफ था। इसी  साल इराक ने ईरान पर धावा बोल दिया और जंग शुरू हो गई। पूरा मुल्क बम धमाकों से थर्रा उठा। लोग मारे जाने लगे। देखते-देखते दो देशों के बीच की यह दुश्मनी क्षेत्रीय संघर्ष में तब्दील हो गई। खाड़ी के तमाम देशों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। लाखों लोग बेघर हुए। हजारों मारे गए। आवागमन ठप हो गया। गांव हो या शहर, सब जगह खाने-पीने की चीजों का भारी संकट था।
आसपास के इलाकों में लोग पलायन कर रहे थे। बिरकर का परिवार भी सदमे में था। किसी को नहीं पता था कि क्या होने वाला है? अच्छी बात यह थी कि उनके खेत में चावल, सब्जी से लेकर कई और फसलें उगाई जाती थीं। लिहाजा संकट के इस भीषण दौर में भी पेट भरने की दिक्कत नहीं आई। घर में गाय भी पल रही थीं। इसलिए दूध-दही की कमी भी नहीं थी। बिरकर कहते हैं, हमारे सामने कभी भूखे रहने की नौबत नहीं आई। पिताजी खेत में चावल, गेहूं, फल, सब्जी उगाते थे। तमाम दुश्वारियों के बावजूद हमारा जीवन चलता रहा।
पापा ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। मां तो कभी स्कूल ही नहीं गईं। लेकिन उन्होंने तय किया कि बच्चे स्कूल जाएंगे। जंग के माहौल में भी उन्होंने बच्चों की पढ़ाई नहीं छूटने दी। वे जानते थे कि शिक्षा ही उनके बच्चों को अंधकार से बाहर निकलने का रास्ता दिखाएगी। बिरकर गांव के स्कूल में पढ़ने लगे। उन्हें बचपन से फुटबॉल खेलना पसंद था। मगर कक्षा पांच के बाद उन्हें गणित का ऐसा चस्का लगा कि वह खेल भूल गए। अब उन्हें आंकड़ों का खेल फुटबॉल से कहीं ज्यादा दिलचस्प लगने लगा।
शुरुआत में बड़े भाई हैदर उन्हें गणित में मदद किया करते थे। बाद में उनका दिमाग इतना तेज चलने लगा कि वह बिना किसी की मदद के मिनटों में कठिन से कठिन सवाल हल करने लगे। बड़े भाई हैदर बताते हैं, उसे गणित में बड़ा मजा आता था। मौका मिलते ही वह मेरी किताब लेकर गणित के सवाल हल करने लगता। कई बार तो मैं हैरान रह जाता था।
ईरान-इराक युद्ध करीब आठ साल तक चला। पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल था। जंग खत्म होने के बाद भी ईरान के हालात बदतर थे। अवाम तमाम दुश्वारियां झेलने को मजबूर था। मुल्क बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहा था। बिरकर कहते हैं, बचपन में मैंने लोगों को जंग की मुसीबतों से जूझते देखा। वे यादें डरावनी हैं। हमने जातीय संघर्ष का दर्द सहा है।
कुर्द आबादी ने जनमत संग्रह की मांग की, तो तनाव और बढ़ गया। कुर्द बिरादरी से ताल्लुक रखने वाला बिरकर परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। बिरकर कहते हैं,  मैं गणित में करियर बनाना चाहता था। उन दिनों कुर्दिस्तान जैसी जगह में रहने वाला कोई बच्चा बेहतर भविष्य की कल्पना भी नहीं कर सकता था। परिवार ने मेरा हौसला बढ़ाया। यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया।
बिरकर गणित की पढ़ाई के लिए तेहरान यूनिवर्सिटी पहुंचे। यहां आने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ गया। अपने प्रोफेसर से उन्हें दुनिया के महान गणितज्ञों के बारे में जानने का मौका मिला। लेकिन देश के हालात अब भी अच्छे नहीं थे। कुर्दों को लेकर तनाव जारी था। इसलिए बिरकर कई बार राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार बने। अब तेहरान में उनका मन नहीं लग रहा था। वह जानते थे कि गणित में बहुत कुछ करने के लिए है। शोध की नई संभावनाएं हैं। मगर मुल्क में रहकर यह सब करना असंभव था। मुल्क के हर कोने में हिंसा के निशान थे। उन्होंने परदेस जाने का मन बनाया।
ग्रेजुएशन के अंतिम साल में उन्होंने ब्रिटेन जाने का फैसला किया। परिवार और रिश्तेदारों ने मदद की। ब्रिटेन पहुंचकर सबसे बड़ा सवाल था नागरिकता का। उन्होंने ब्रिटेन सरकार से राजनीतिक शरण मांगी। उनकी अपील स्वीकार कर ली गई और ब्रिटेन में उन्हें शरणार्थी का दर्जा मिल गया। उन्होंने नर्ॉंटघम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। अब उनका पूरा फोकस पढ़ाई पर था। गणित में उन्होंने कई नए प्रयोग किए। साल 2000 में उन्हें छात्रों की अंतरराष्ट्रीय गणित प्रतियोगिता में तीसरा पुरस्कार मिला। पूरे ब्रिटेन में उनकी चर्चा थी। 2003 में उन्हें लंदन मैथेमेटिकल सोसाइटी अवॉर्ड मिला। 2004 में उनकी पीएचडी पूरी हुई। अब वह कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।
इस साल उन्हें फील्ड मेडल से सम्मानित किया गया। इस अवॉर्ड को गणित का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। बिरकर कहते हैं, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे यह मेडल मिलेगा। यह अवॉर्ड मेरे जैसे लाखों शरणार्थियों के चेहरे पर मुस्कान लाएगा। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 5 august