DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मैं दुनिया की सबसे खुशनसीब महिला हूं

मलाथी 14 महीने की थीं, जब उन्हें तेज बुखार हुआ और गरदन के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। बेटी की हालत देखकर मम्मी-पापा के तो होश ही उड़ गए। तमाम डॉक्टरों को दिखाया, पर कुछ फायदा नहीं हुआ। पापा बेंगलुरु में एक छोटा सा होटल चलाते थे। मां घर संभालती थीं। मलाथी चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। डॉक्टरों ने इलेक्ट्रिक शॉक थिरेपी के जरिए इलाज की सलाह दी। करीब दो साल तक यह इलाज चला। इससे शरीर का ऊपरी हिस्सा तो काम करने लगा, लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा अब भी निष्क्रिय था। मलाथी कहती हैं, इलाज के लिए हमारे पास संसाधन नहीं थे। थिरेपी सेंटर घर से काफी दूर था। मम्मी मुझे गोद में लेकर कई बस बदलकर वहां ले जाती थीं। मेरे लिए उन्होंने कड़ी तपस्या की। 
शारीरिक दिक्कतों की वजह से मलाथी का बचपन खुशनुमा नहीं रहा। जब पड़ोस के बच्चे मैदान में खेल-कूद करते थे, वह मायूस होकर उन्हें देखा करती थी। मलाथी कहती हैं, अजीब लगता था। पड़ोस के बच्चे हमारे आंगन में गिरे आम बटोरने के लिए दौड़ते थे, पर मैं ललचाई आंखों से उन्हें देखती थी। मन कचोटता था मेरा। सोचती थी, काश मैं भी इनकी तरह दौड़ पाती! 
उन्हें लेकर पापा की चिंता बढ़ती जा रही थी। बड़ा बुरा लगता था, जब कोई उनकी बेटी को बेचारी कहता था। उन्होंने तय कर लिया कि वह बेटी को दया का पात्र नहीं बनने देंगे। उसे आत्मनिर्भर बनाएंगे, ताकि वह सम्मान से जी सके। तभी किसी ने उन्हें बताया कि चेन्नई के एक ऑर्थोपेडिक सेंटर में दिव्यांग बच्चों को फ्री में शिक्षा दी जाती है और उनका इलाज भी किया जाता है। उन्होंने मलाथी को वहां भर्ती करा दिया। बेटी को खुद से अलग करते हुए परिवार को बहुत बुरा लगा, पर और कोई रास्ता भी नहीं था उनके पास। हॉस्टल में छोड़ते समय पापा ने उन्हें समझाया कि यहां रहकर तुम्हारी जिंदगी बदल सकती है। मलाथी बताती हैं, मैं चेन्नई के सेंटर में करीब 15 साल रही। वह एक अलग दुनिया थी। सर्जरी और दर्द मेरे जीवन का अहम हिस्सा थे। मैं रोजाना व्यायाम करती थी। यही वह दौर था, जब मैंने खेल के बारे में सोचा। खेल का अभ्यास करना मेरे लिए दवा की तरह था।
चेन्नई के सेंटर में उनके पैर की हड्डी की कई बार सर्जरी हुई, पर सफलता नहीं मिली। अब यह तय हो चुका था कि मलाथी कभी अपने पांव पर खड़ी नहीं हो पाएंगी। पर पापा ने बेटी को हताश नहीं होने दिया। 12वीं के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए वह उन्हें बेंगलुरु ले आए। यहां उनका एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला हो गया। मलाथी कहती हैं, जब मैं बेंगलुरु के कॉलेज में पहुंची, तो मेरे सामने एक नई मुश्किल आ गई। वहां मेरी सारी क्लास ऊपर की मंजिल पर लगती थीं। मेरे लिए सीढ़ियां चढ़ना बहुत कठिन था। मैंने सोचा, यहां मैं नहीं पढ़ पाऊंगी। पर अगले दिन मैंने प्रिंसिपल से बात की और फिर मेरी क्लास ग्राउंड फलोर पर लगने लगीं। 
यहां उन्हें पैरा ओलंपिक के बारे में पता चला। उन्होंने शॉटपुट और व्हील चेयर रेस की ट्रेनिंग शुरू की। समय के साथ खेल में निखार आता गया। पहले स्थानीय स्तर और बाद में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का मौका मिला। कड़ी मेहनत और बुलंद हौसलों के साथ कामयाबी का सफर बढ़ चला। सियोल में उन्हें भारत की तरफ से पैरा ओलंपिक में खेलने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेल में भाग लेने के लिए उन्हें रेसिंग व्हील चेयर की जरूरत थी। शुरुआत में उनके पास व्हील चेयर खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, लिहाजा किराये पर इसकी व्यवस्था करनी पड़ी। 
मलाथी विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में अब तक 389 गोल्ड, 27 सिल्वर और पांच कांस्य पदक जीत चुकी हैं। वह कहती हैं, मैंने ये अवार्ड व्हील चेयर पर बैठकर हासिल किए। इसलिए मेरे लिए ये व्हील चेयर नहीं, बल्कि एक शानदार रथ हैं। वर्ष 1981 में उन्हें सिंडीकेट बैंक में मैनेजर पद की नौकरी मिली। इसके बाद आर्थिक हालात सुधरने लगे। आज वह प्रेरक वक्ता हैं और सामाजिक कार्यकर्ता भी।  
आजकल वह अपने भाषणों से लोगों को जिंदगी की मुश्किलों से लड़ने का हौसला दे रही हैं। मलाथी कहती हैं, सबसे बड़ी दिव्यांगता है, आपके अंदर की हीनभावना। जब आप अपने आपको दूसरों से कमतर आंकते हैं, तो आप मन से दिव्यांग हो जाते हैं। मेरे मन में कभी यह भाव नहीं आया कि मैं दूसरों से कम हूं। 
वर्ष 1995 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिला। इसी साल उन्हें वुमेन ऑफ द ईयर खिताब से नवाजा गया। साल 2001 में उन्हें पद्मश्री मिला। दिव्यांगों को बेहतर जिंदगी दिलाने के मकसद से उन्होंने बेंगलुरु में माथरू फाउंडेशन शुरू किया। इसका मकसद गरीब दिव्यांग बच्चों को पढ़ने और अपने हुनर को निखारने का मौका देना है, ताकि वे समाज में सम्मान के साथ जी सकें। मलाथी कहती हैं, हम समाज से बहुत सारी शिकायत करते हैं। क्या हमने कभी सोचा कि हम समाज को क्या दे सकते हैं? अपने साथ उन लोगों के बारे में भी आप सोचिए, जिन्हें आपकी जरूरत है। तभी यह दुनिया खूबसूरत बन पाएगी। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 31 march