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ड्रम बजाना मेरी आजादी का प्रतीक

कसीवा मुतुआ  ड्रम वादक, केन्या

कसीवा तब छह साल की थीं। संयुक्त परिवार था उनका। दादा-दादी, चाचा-चाची और उनके बच्चे सब संग रहते थे। दादी उन्हें कुछ ज्यादा ही लाड़ करती थीं। हर रोज रात में कहानी सुनाने के लिए वह उन्हें अपने कमरे में ले जातीं और अंदर से दरवाजा बंद कर लेती थीं। जब तक कहानी खत्म नहीं होती, दरवाजा नहीं खुलता। दादी की कहानियां अलग थीं। उन कहानियों में छिपे थे अनूठे अनुभव और संगीत के मोहक स्वर। ड्रम बजाकर वह कहानी को रोमांचक ढंग से पेश करतीं। जितनी देर कहानी चलती, नन्ही कसीवा एकटक सुनती रहती। दादी के किस्सों में ड्रम वादन का बेहद अहम रोल था।  लेकिन वह इस बात का पूरा ख्याल रखतीं कि इसकी आवाज कमरे के बाहर न जाए। कसीवा अक्सर पूछतीं, आप इतने धीमे क्यों बजाती हैं? तेज बजाओ। पर दादी हमेशा बात टाल जातीं। 
उन्होंने कभी खुलकर पोती को नहीं बताया कि उन्हें ड्रम बजाने की मनाही है। कसीवा कहती हैं, ड्रम बजाते समय दादी के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी होती थी। ड्रम पर उनकी उंगलियों की थाप सुनकर मैं नाचने लगती थी। उनके मन में कुछ था, जो उन्होंने मुझसे कभी नहीं कहा। असल में, ड्रम वादन दक्षिण अफ्रीकी देशों की संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। लेकिन परंपरा के मुताबिक, अफ्रीकी देश केन्या में महिलाओं को ड्रम बजाने की अनुमति नहीं थी। कसीवा भी दादी की तरह ड्रम बजाना चाहती थीं, पर उन्हें तो इसे हाथ लगाने की भी इजाजत नहीं थी। इसलिए वह थाली को चम्मच से बजाने लगीं। इस बीच जब भी मौका मिलता, वह चुपके से दादी के कमरे में जाकर ड्रम बजा लेतीं। ऐसा वह तब करतीं, जब घर के मर्द बाहर होते। मन में पकड़े जाने का डर बना रहता था।  
उन दिनों वह 12वीं कक्षा में थीं। स्कूल में म्यूजिक फेस्टिवल की तैयारियां चल रही थीं। उन्होंने हिम्मत करके कार्यक्रम में हिस्सा  लिया। स्कूल टीचर ने लड़कों के संग उन्हें भी ड्रम बजाने की इजाजत दे दी। जब घरवालों को खबर लगी, तो खूब डांट पड़ी। हिदायत दी गई कि दोबारा ड्रम को हाथ न लगाना। पर वह कहां मानने वाली थीं। एक बार की बात है। गांव में वार्षिक उत्सव का जश्न चल रहा था। गांव की तमाम औरतें और मर्द मौजूद थे। सामने मंच पर ड्रम सजे थे। अचानक कसीवा वहां पहुंचीं और बिना किसी की अनुमति लिए ड्रम बजाने लगीं। सारे लोग अचरज से उन्हें देखने लगे। सब एक दूसरे से पूछ रहे थे कि यह लड़की कौन है? तभी एक आदमी वहां दौड़ता हुआ आया। उसने ड्रम छीन लिया और डांटते हुए कहा, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इसे हाथ लगाने की? दोबारा यहां दिखाई मत देना। वह रोते हुए घर लौट आईं। घर में किसी ने सहानुभूति नहीं दिखाई। पूरा परिवार उनकी वजह से शर्मिंदा महसूस कर रहा था।   
जैसे-जैसे वह बड़ी होती गईं, मन में इस भेदभाव को लेकर उनकी बेचैनी बढ़ती गई। अब वह समझने लगी थीं कि भेदभाव खत्म करने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। स्कूल में अक्सर दोस्तों और टीचर से इस मुद्दे पर चर्चा होती थी। उन्हें लगा कि पत्रकार बनकर लोगों को जागरूक किया जा सकता है। इसलिए बुसोगा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में डिग्री हासिल की, पर बाद में मन बदल गया। कसीवा बताती हैं, ड्रम मेरा पहला प्यार था। मैं इसे करियर बनाना चाहती थी। इसलिए मैंने तय किया कि प्रोफेशनल ड्रमर बनूंगी। ड्रम बजाकर मैं खुद को आजाद महसूस करती हूं। 
उनके तेवर बगावती हो चुके थे। वह घर के लोगों से सवाल पूछने लगीं कि जब मर्द ड्रम बजा सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? ड्रम बजाने वाले मर्द कलाकारों को सम्मान मिलता है, तो औरतों को क्यों नहीं? कोई उनके सवालों का जवाब देने को तैयार नहीं था। फिर एक दिन उन्होंने बेबाकी से एलान कर दिया, मैं पत्रकार नहीं, ड्रम वादक बनूंगी। कसीवा कहती हैं, पहले मैं छिपकर ड्रम बजाती थी। बाद में सबके सामने बजाने लगीं। पर गाांववालों का मानना था कि ड्रम बजाने वाली लड़की गलत नजर से देखी जाती है। मैं उनकी धारणा बदलना चाहती थी।  
कसीवा ने 2013 में वन बीट प्रोग्राम में हिस्सा लिया। इस प्रोग्राम में उन्होंने सबके सामने ड्रम बजाया। दर्शक एक लड़की को इतना बेहतरीन ड्रम बजाते देखकर दंग थे। हर तरफ उनकी चर्चा होने लगी। 2014 में उन्होंने नील प्रोजेक्ट में हिस्सा लिया। अभियान का मकसद नील नदी के किनारे बसे अफ्रीकी कलाकारों के हुनर को पहचान दिलाना था। 2015 में उन्होंने आधुनिक और परंपरागत संगीत को बढ़ावा देने के लिए एक संस्था बनाई। अब वह गांव-गांव घूमकर लोगों को बेटियों की शिक्षा और अधिकार पर जागरूक करती हैं। कसीवा कहती हैं, मैं लोगों को समझाती हूं कि ड्रम वादन हमारी संस्कृति का हिस्सा है। बेटियों को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत संभालने और उसे आगे ले जाने का अधिकार है।
कसीवा के हजारों फैंस हैं। जागरूकता अभियान के दौरान वह ड्रम बजाकर अपनी कहानी सुनाती हैं। उन्हें देखकर केन्या की तमाम लड़कियां संगीत क्षेत्र में आगे आ रही हैं।

प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 30 december