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नहीं पता था क्या होगा मेरे साथ 

के सी नंदा करियप्पा  पूर्व युद्धबंदी 

नंदा करियप्पा ने बचपन से अपने परिवार में फौजी माहौल देखा। उनके पिता जनरल के एम करियप्पा भारतीय सेना में शीर्ष पद पर रहे। दुश्मन देश की सेनाएं उनके शौर्य से कांपती थीं। वह आजादी के बाद का दौर था। भारत-पाक विभाजन के बाद काफी खून-खराबा हुआ। नंदा देशभक्ति और शौर्य के किस्से सुनकर बडे़ हुए। उनके पिता जनरल करियप्पा ने 1947 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में अदम्य साहस का परिचय दिया था। उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने कई मोर्चों पर पाकिस्तानी सेना को हराया। जाहिर है, नंदा पर फौजी पिता की गहरी छाप पड़ी। 1949 में जनरल के एम करियप्पा भारतीय सेना में कमांडर-इन-चीफ बने। उन्होंने बेटे को कडे़ अनुशासन में पाला और उसे सैनिक बनकर देशसेवा करने की प्रेरणा दी। पिता की राह पर चलते हुए नंदा भी सेना में भर्ती हो गए। 1953 में उनके पिता रिटायर हो गए। इस बीच भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते चले गए। हालात इतने बिगडे़ कि 1965 में दोनों देशों के बीच जंग शुरू हो गई। 
जब भारत-पाकिस्तान के बीच जंग शुरू हुई, तब नंदा मात्र 26 साल के थे। पिता सेना से रिटायर हो चुके थे और अब बेटे की बारी थी देश की हिफाजत करने की। आदेश मिलते ही वह दुश्मन को सबक सिखाने चल पड़े। उन्हें एक खास मिशन के तहत लड़ाकू विमान के साथ पाकिस्तानी सीमा में भेजा गया। वह तीन सदस्यों वाले स्क्वॉड्रन का नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ दो और फौजी थे। इस दौरान दुश्मन देश की विमानभेदी तोपों ने उनके विमान पर हमला किया। इस हमले के दौरान उनका विमान धरती पर गिर गया और वह बुरी तरह घायल हो गए। वह तारीख थी 22 सितंबर, 1965। होश आया, तो पला चला कि वह पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तानी सैनिकों ने उनसे हाथ उठाने को कहा, लेकिन उनकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी थी। वह हाथ हिलाने में भी असमर्थ थे। 
इलाज के लिए उन्हें अस्पताल लाया गया। इस बीच रेडियो के जरिए भारत में नंदा करियप्पा के युद्धबंदी बनाए जाने की खबर फैल चुकी थी। पूरा देश चिंतित हो उठा। करियप्पा कहते हैं- मैं बेहोशी की हालत में था। पहले तो मुझे लगा कि मैं भारतीय सैनिकों के बीच हूं। तभी मुझे कुछ दूरी पर गोले फटने की आवाज सुनाई दी। पाकिस्तानी सेना के एक जवान ने कहा, ये तुम्हारी तोपें हैं, जो हमारे ऊपर आग उगल रही हैं। तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे कैद कर लिया गया है। मैं उनके सामने सहज रहा। 
करीब एक हफ्ते तक अस्पताल में उनका इलाज चला। इसके बाद उन्हें जेल के भीतर एकांत में रखा गया। करीब आठ हफ्ते तक उनका किसी से संपर्क नहीं हुआ। बहुत मुश्किल पल थे वे। वह नहीं जानते थे कि बाहर क्या हो रहा है? उन्हें किस जेल में रखा गया है? यह भी नहीं पता था कि भारत को उनके बारे में कोई जानकारी है या नहीं। पाकिस्तानी अधिकारी उन्हें भारत वापस भेजने का लालच देकर उनसे जानकारियां उगलवाने की कोशिश कीं, पर करियप्पा ने मुंह नहीं खोला। उन्हें  धमकी भी दी गई। कुछ दिनों तक पूरे एकांतवास में रखा गया। इसके बाद उन्हें दूसरे भारतीय युद्धबंदियों के पास रावर्लंपडी भेज दिया गया। वहां पहले से 57 भारतीय युद्धबंदी मौजूद थे।
 तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खां आजादी से पहले उनके पिता जनरल के एम करियप्पा के साथ काम कर चुके थे। करियप्पा उनसे सीनियर थे। लिहाजा अयूब खां ने उन्हें फोन करके बताया कि आपका बेटा हमारी कैद में है। आप चाहें, तो हम उसे रिहा कर सकते हैं। पर जनरल करियप्पा ने साफ-साफ कहा, नंदा सिर्फ मेरा बेटा नहीं, बल्कि पूरे देश का बेटा है। अन्य भारतीय सैनिक जो आपके कब्जे में हैं, वे भी मेरे बेटे हैं। लिहाजा आपको मेरे बेटे पर मेहरबानी करने की जरूरत नहीं है। 81 साल के करियप्पा कहते हैं- दुश्मन की कैद में बंदी से उसका नाम और सर्विस नंबर ही पूछा जाता है। मुझसे मेरे पिता का नाम पूछा गया। मुझे नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है? 
इस बीच भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धबंदियों को रिहा करने पर सहमति बन गई। सहमति के तहत उन्हें रिहा किया गया। जेल में कैद नंदा को इस बारे में कुछ पता नहीं था। एक दिन अचानक उनकी आंखों पर पट्टी बांधी गई और पेशावर ले जाया गया। वहां से उन्हें भारत रवाना किया गया। करियप्पा कहते हैं- शुरू के नौ हफ्ते बडे़ मुश्किल थे। मुझे अकेला रखा गया। चार महीने बाद हमें रिहा किया गया था।
स्वदेश लौटने के बाद काफी समय उनका इलाज चला, लेकिन बहादुरी का जज्बा हमेशा कायम रहा। जब 1971 की जंग शुरू हुई, तो वह दोबारा पूरे हौसले के साथ मैदान में लौटे। हालांकि इस बार रीढ़ की हड्डी में दिक्कत की वजह से उन्हें लड़ाकू विमान उड़ाने का मौका नहीं मिला। सत्तर के दशक में उन्होंने नंबर 8 स्क्वाड्रन की कमान संभाली। जंग के दौरान उन्होंने बहुत कुछ देखा और सीखा भी। जाहिर है, हर मुश्किल दौर में पिता ने उन्हें हौसला दिया। नंदा वायु सेना के एयर मार्शल पद से रिटायर हुए।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 3 march