DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी 

डी प्रकाश राव  पद्मश्री अवॉर्ड विजेता 

प्रकाश के पिता ने द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था। जब जंग खत्म हुई, तो वह अपने घर ओडिशा लौट आए। उनका परिवार कटक के बक्सी बाजार इलाके में रहता था। काम की तलाश में काफी भटकना पड़ा, मगर कहीं काम नहीं मिला। परिवार के पास खेती लायक जमीन भी नहीं थी। पूंजी के नाम पर उनके पास केवल पांच रुपये थे। कहीं काम नहीं मिला, तो उन्होंने चाय की छोटी सी दुकान खोल ली। 
दुकान से परिवार का खर्च चलने लगा। दुकान के करीब ही बस्ती में उन्होंने किराये पर एक छोटी सी झुग्गी ले ली। बस्ती में बच्चों को स्कूल भेजने का चलन न था। होश संभालते ही वे माता-पिता का हाथ बंटाने लगते थे, पर पिताजी ने प्रकाश को स्कूल भेजा। उनका पढ़ाई में खूब मन लगता था। वह किताबों में खोए रहते थे, इसलिए झुग्गी में उनका एक भी दोस्त नहीं बना। प्रकाश हरेक कक्षा में अव्वल आने लगे। पढ़ाई के अलावा उन्हें फुटबॉल खेलना पसंद था, पर उन दिनों खेल में करियर को लेकर  जागरूकता नहीं थी। इसलिए उन्होंने तय किया कि बडे़ होकर डॉक्टर बनूंगा। प्रकाश कहते हैं- मेरा सपना था कि डॉक्टर बनकर गरीबों का मुफ्त में इलाज करूं। कई बार पिताजी कहते कि दुकान में मेरी मदद करो, मगर मैं टाल जाता था। मुझे पढ़ने की धुन थी। कभी नहीं सोचा था कि पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी। 
जब प्रकाश ने 10वीं की परीक्षा पास की, तो पूरी बस्ती में उनकी चर्चा होने लगी। पिताजी भी बेटे की कामयाबी से खुश थे। अब वह मान चुके थे कि बेटा चाय नहीं बेचेगा। शायद उन्हें आने वाली मुसीबत का अंदेशा न था। यह 1976 की बात है। तब प्रकाश 11वीं कक्षा में थे। पिताजी अचानक बीमार पड़  गए। हफ्तों  चाय की दुकान बंद रही। घर में भुखमरी के हालात आ गए। इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे। कुछ दिनों बाद पिता चल बसे। अब परिवार पालने की जिम्मेदारी प्रकाश पर आ गई। पेट पालने के लिए उन्हें पिता की चाय की दुकान चलानी पड़ी। प्रकाश कहते हैं- एक बार चाय की दुकान चलाने लगा, तो फिर इसी काम में जुट गया। किताबों का साथ छूट गया। डॉक्टर बनने का ख्वाब अधूरा रह गया। 
प्रकाश अब चाय वाले बन चुके थे। कॉलेज जाना बंद हो गया। परिवार की तरफ से कमाने का दबाव था। पर मन में पढ़ाई छूटने की गहरी टीस थी। फिर उन्होंने तय कि मैं नहीं पढ़ पाया तो क्या हुआ, झुग्गी के बच्चों को तो पढ़ा सकता हूं। साल 2000 में अपने दो कमरे के घर में उन्होंने छोटे बच्चों की क्लास शुरू की। यहां वह नर्सरी से कक्षा तीन के बच्चों को पढ़ाने लगे। यह काम आसान नहीं था। सुबह चार बजे उठकर चाय की दुकान पर निकल जाते और 11 बजे दुकान बंद करके बच्चों को उनके घरों से बुला लाते। बस्ती वालों को उनका यह काम  पसंद नहीं आया। वे चाहते थे कि उनके बच्चे काम करके पैसे कमाएं। प्रकाश कहते हैं- मुझे झुग्गी वालों का भारी विरोध सहना पड़ा। वे कहते थे कि हमारे बच्चे जो भी कमाकर लाते हैं, उससे हमारा घर चलता है। पढ़ने से क्या होगा? बेकार में हमारे बच्चों को मत बिगाड़ो। मैं उनसे मिन्नतें करता था कि बच्चों को पढ़ने दो। 
तमाम विरोध के बावजूद प्रकाश ने अपना स्कूल नहीं बंद किया। अब चाय की दुकान भी अच्छी चलने लगी थी। वह अपनी कमाई का आधा हिस्सा बच्चों पर खर्च करने लगे। अपने पैसे से बच्चों के लिए कॉपी-किताब खरीदते। लेकिन कुछ बस्ती वाले कहते कि उनके पास बच्चों को खाना खिलाने के पैसे नहीं हैं। अगर तुम इनको पढ़ाते हो, तो इनके खाने का इंतजाम भी करो। प्रकाश ने यह चुनौती भी स्वीकार की। वह घर पर दाल, चावल और सब्जी मिलाकर एक पौष्टिक खिचड़ी बनाने लगे। धीरे-धीरे बस्ती में उनके प्रति नाराजगी दूर होने लगी। उन्होंने कई बच्चों का कक्षा तीन के बाद सरकारी स्कूल में दाखिला करा दिया। उनके स्कूल में बच्चे बढ़ते गए। उनकी शोहरत बढ़ने लगी। यह खबर मीडिया के जरिये पूरे कटक में फैल गई। प्रकाश कहते हैं- मेरे स्कूल से निकले तमाम बच्चे कॉलेज जाने लगे हैं। कुछ ने खेल में नाम कमाया है। अब बस्ती वाले खुश हैं मुझसे।  
आज भी प्रकाश बक्सी बाजार इलाके में चाय बेचते हैं। पर अब वह आम चाय वाले नहीं रहे। आसपास के इलाके में उनका बड़ा सम्मान है। साल 2015 में ओडिशा ह्यूमन राइट कमेटी ने उन्हें बस्ती के बच्चों की जिंदगी बदलने के लिए सम्मानित किया। उनके स्कूल के ऊपर डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है। पिछले साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात  में उनकी तारीफ करते हुए उन्हें बस्ती के बच्चों के लिए उम्मीद की एक नई किरण बताया था। इस साल केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। प्रकाश कहते हैं- आज जब मेरी बस्ती के बच्चे साइकिल पर सवार होकर कॉलेज जाते हैं, तो दिल को बड़ा सुकून मिलता है। मेरे कई बच्चे अब अच्छी नौकरी कर रहे हैं। मैं तो आज भी चाय बेच रहा हूं, पर उन्हें देखकर लगता है कि मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी हूं।

प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 3 february